मद्रास हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण निर्णय में स्पष्ट किया है कि शादी से पहले किसी हादसे में हुई शारीरिक विकलांगता को विवाह विच्छेद का आधार नहीं बनाया जा सकता। अदालत ने कहा कि शारीरिक रूप से अक्षम व्यक्ति वैवाहिक जीवन के लिए अयोग्य नहीं होता और केवल विकलांगता के आधार पर किसी के साथ भेदभाव करना संवैधानिक अधिकारों और मानवीय गरिमा का हनन है।
जस्टिस एन आनंद वेंकटेश और जस्टिस के के रामकृष्णन की पीठ ने 28 जुलाई 2026 को दिए अपने फैसले में पति की अपील खारिज कर दी। अदालत ने 15 सितंबर 2020 के फैमिली कोर्ट के उस निर्णय की पुष्टि की, जिसमें पति की तलाक की याचिका को निरस्त कर दिया गया था।
अदालत की सख्त टिप्पणी
सुनवाई के दौरान पीठ ने टिप्पणी की कि इस मामले में असल विकलांगता पति की वह सोच है, जिसकी वजह से वह अपनी पत्नी के सकारात्मक गुणों को देखने में असमर्थ रहा। हाईकोर्ट ने कहा कि किसी दुर्घटना का शिकार हुए जीवनसाथी के प्रति सहानुभूति और करुणा दिखाने के बजाय उसे केवल शारीरिक अक्षमता के कारण छोड़ना संवेदनहीनता को दर्शाता है और यह कानूनी रूप से स्वीकार्य नहीं है।
अदालत ने रेखांकित किया कि भारतीय संविधान के साथ-साथ संयुक्त राष्ट्र के अंतर्राष्ट्रीय समझौते और देश के कानून दिव्यांग व्यक्तियों को समानता, गरिमा और गैर-भेदभाव की पूर्ण गारंटी देते हैं।
मामले की पृष्ठभूमि और आरोप
इस जोड़े का विवाह 24 जून 2010 को हुआ था और जुलाई 2011 में उनके घर बेटे का जन्म हुआ। अगस्त 2013 से दोनों अलग रह रहे हैं। पति ने हिंदू विवाह अधिनियम, 1955 की धारा 13(1)(i-a) के तहत मानसिक क्रूरता का दावा करते हुए विवाह को समाप्त करने की मांग की थी।
पति का आरोप था कि शादी से पहले पत्नी एक सड़क हादसे में गंभीर रूप से घायल हो गई थी, जिससे उसके कूल्हे में स्थायी विकलांगता आ गई थी। उसका दावा था कि पत्नी और उसके परिवार ने इस शारीरिक अक्षमता तथा उसके डिप्रेशन के इलाज की जानकारी छिपाई। इसके अतिरिक्त, पति ने आरोप लगाया कि पत्नी घरेलू कार्य नहीं करती थी, विवाद करती थी और आत्महत्या की धमकी देकर उसे मानसिक प्रताड़ना देती थी।
पत्नी का रुख और सबूतों की स्थिति
दूसरी ओर, पत्नी ने किसी भी जानकारी को छिपाने के दावे का खंडन करते हुए कहा कि उसके पति को विवाह से पूर्व ही उसकी चोटों के बारे में पूरी जानकारी थी। उसने स्पष्ट किया कि उनका वैवाहिक जीवन सामान्य रहा, उन्होंने संतान को जन्म दिया और वह आज भी साथ रहने के लिए तत्पर है।
मामले के तथ्यों का विश्लेषण करते हुए हाईकोर्ट ने पाया कि दोनों पक्षों ने एक साथ जीवन बिताया था, उनका एक बेटा है और पत्नी दूसरी बार भी गर्भवती हुई थी (जिसे बाद में चिकित्सीय कारणों से समाप्त कराना पड़ा था)। पीठ ने पाया कि ऐसा कोई साक्ष्य मौजूद नहीं है जिससे यह सिद्ध हो कि पत्नी की शारीरिक स्थिति उसके वैवाहिक दायित्वों को निभाने में बाधक बनी।
फैमिली कोर्ट का फैसला बरकरार
हाईकोर्ट ने यह भी पाया कि पति की ओर से पत्नी के डिप्रेशन में होने या आत्महत्या की धमकियां देने से जुड़ा कोई मेडिकल साक्ष्य पेश नहीं किया गया। पीठ ने निष्कर्ष निकाला कि पति मानसिक क्रूरता या तथ्यों को छिपाने के आरोपों को साबित करने में विफल रहा है। इसके साथ ही अदालत ने अपील खारिज करते हुए पत्नी द्वारा अतिरिक्त दस्तावेज प्रस्तुत करने के आवेदन को भी अनावश्यक मानकर समाप्त कर दिया।

