व्यावसायिक समझौतों की शर्तों को खुद नहीं बदल सकतीं अदालतें, ‘नो-इंटरेस्ट’ क्लॉज वैध: सुप्रीम कोर्ट

सुप्रीम कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में स्पष्ट किया है कि अदालतें सुरक्षा जमा (सिक्योरिटी डिपॉजिट) पर ब्याज देने के लिए किसी व्यावसायिक अनुबंध (कमर्शियल कॉन्ट्रैक्ट) की शर्तों को अपनी मर्जी से नहीं बदल सकतीं, खासकर तब जब समझौते में स्पष्ट रूप से ब्याज न देने का प्रावधान हो। चीफ जस्टिस सूर्यकांत और जस्टिस वी. मोहाना की पीठ ने हरियाणा सरकार द्वारा दायर अपीलों को आंशिक रूप से स्वीकार करते हुए पंजाब और हरियाणा हाईकोर्ट के उस निर्देश को खारिज कर दिया, जिसमें सुरक्षा जमा पर ब्याज न देने वाले क्लॉज को गैर-कानूनी घोषित किया गया था। सुप्रीम कोर्ट ने साफ किया कि अनुबंध अवधि और उसकी समाप्ति के तीन महीने बाद तक कोई ब्याज देय नहीं होगा, लेकिन यदि सरकार इस अवधि के बाद भी जमा राशि को रोके रखती है, तो उसे ब्याज देना होगा।

मामले की पृष्ठभूमि

यह विवाद ‘पंजाब माइनर मिनरल्स कंसेशन रूल्स, 1964’ के तहत माइनिंग कॉन्ट्रैक्ट से जुड़ा है। नियमों के तहत, सफल बोलीदाता को एक महीने के भीतर ‘फॉर्म-एल’ के तहत समझौता करना अनिवार्य होता है। 26 मार्च 1998 को हरियाणा सरकार ने यमुना रेत खनन के लिए नीलामी का नोटिस जारी किया था। मेसर्स जय दुर्गा फिनवेस्ट प्राइवेट लिमिटेड (प्रतिवादी) ने 1.48 करोड़ रुपये प्रति वर्ष की दर से तीन साल के खनन ठेके के लिए सबसे ऊंची बोली लगाई। दोनों पक्षों के बीच 30 नवंबर 1998 को फॉर्म-एल के तहत समझौता हुआ।

समझौते के क्लॉज 1 के तहत प्रतिवादी को हर महीने अग्रिम भुगतान करना था। क्लॉज 2 के अनुसार, भुगतान में देरी होने पर ठेकेदार को 24 प्रतिशत प्रति वर्ष की दर से ब्याज देना होगा। क्लॉज 16 में नियमों के उल्लंघन पर अनुबंध समाप्त करने और सुरक्षा जमा जब्त करने का अधिकार था। वहीं, समझौते के क्लॉज 19 में स्पष्ट लिखा था कि सुरक्षा जमा पर कोई ब्याज नहीं मिलेगा और इसे अनुबंध समाप्त होने के तीन महीने के भीतर ठेकेदार को लौटा दिया जाएगा।

प्रतिवादी ने सितंबर 1999 से मासिक किस्तों के भुगतान में चूक करना शुरू कर दिया, जिसके बाद 9 मार्च 2000 को खान एवं भूविज्ञान निदेशक ने अनुबंध समाप्त कर ठेकेदार की 37 लाख रुपये की सुरक्षा जमा राशि जब्त कर ली। ठेकेदार ने इस फैसले के खिलाफ अपील की, जहां विभाग ने उसे बकाया राशि चुकाने की शर्त पर सुरक्षा राशि को समायोजित करने की अनुमति दी। प्रतिवादी ने 26 लाख रुपये जमा किए, लेकिन शेष राशि चुकाने में विफल रहा और पंजाब और हरियाणा हाईकोर्ट का रुख किया।

हाईकोर्ट के सिंगल जज ने पहले इस याचिका को खारिज किया, लेकिन सुप्रीम कोर्ट द्वारा 2004 में मामला वापस भेजे जाने के बाद, दोबारा सुनवाई में सिंगल जज ने माना कि ठेके के गैर-निष्पादन के लिए ठेकेदार ही जिम्मेदार था। हालांकि, सिंगल जज ने समझौते के क्लॉज 19 को “कानूनन अमान्य” मानते हुए राज्य को निर्देश दिया कि वह 37 लाख रुपये की सुरक्षा जमा राशि को जमा करने की तारीख से 9 प्रतिशत प्रति वर्ष के ब्याज के साथ वापस करे। हाईकोर्ट की डिवीजन बेंच ने भी इस फैसले को बरकरार रखा, जिसके खिलाफ हरियाणा सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में अपील की।

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पक्षों की दलीलें

अपीलकर्ता (हरियाणा राज्य) ने तर्क दिया कि हाईकोर्ट किसी ऐसे स्पष्ट अनुबंध को फिर से नहीं लिख सकता जो दोनों पक्षों ने व्यावसायिक निविदा (कमर्शियल टेंडर) में अपनी सहमति से स्वीकार किया था। राज्य ने यह भी स्पष्ट किया कि सुरक्षा जमा राशि को बिना ब्याज वाले ट्रेजरी हेड (8443-सिविल डिपॉजिट एंड एडवांसेज) में रखा जाता है और विभाग इस पर कोई ब्याज नहीं कमाता है।

दूसरी ओर, प्रतिवादी-ठेकेदार ने दलील दी कि यह अनुबंध पूरी तरह से एकतरफा और अन्यायपूर्ण था, जो ठेकेदार से तो देरी पर भारी ब्याज वसूलता था लेकिन उसकी जमा राशि पर कोई ब्याज नहीं देता था। उन्होंने तर्क दिया कि हाईकोर्ट का फैसला न्याय और समानता पर आधारित था और राज्य द्वारा जमीन उपलब्ध न कराने के कारण अनुबंध का पालन असंभव हो गया था।

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सुप्रीम कोर्ट का विश्लेषण

सुप्रीम कोर्ट ने अनुबंध से जुड़े मामलों में न्यायिक हस्तक्षेप की सीमाओं को रेखांकित किया और व्यावसायिक समझौतों में पक्षों की स्वायत्तता का सम्मान करने पर बल दिया। पीठ ने टिप्पणी की:

“यह सुस्थापित है कि पक्षों के बीच अनुबंध के मामलों में अदालत का काम उन शर्तों की व्याख्या करना और उन्हें लागू करना है जिन पर पक्षों के बीच सहमति बनी है। अदालत शर्तों को फिर से नहीं लिखेगी, चाहे बदली हुई शर्त कितनी भी उचित क्यों न प्रतीत हो।”

अदालत ने कहा कि प्रतिवादी ने सभी नियमों और क्लॉज 19 को अच्छी तरह से जानने के बाद ही नीलामी में भाग लिया था। पीठ ने माना:

“एक बार जब पक्ष बिना किसी विरोध के अपनी खुली आंखों से और अपनी स्वतंत्र इच्छा से अनुबंध की कुछ शर्तों को स्वीकार कर लेते हैं, तो उन्हें बाद में केवल इस आधार पर उससे पीछे हटने की अनुमति नहीं दी जा सकती कि बाद में वह शर्त बोझिल साबित हो रही है।”

सुप्रीम कोर्ट ने लोक नीति (पब्लिक पॉलिसी) के आधार पर क्लॉज 19 को अमान्य ठहराने के हाईकोर्ट के फैसले को गलत ठहराते हुए कहा:

“सुरक्षा जमा पर ब्याज को स्पष्ट रूप से खारिज करने वाले व्यावसायिक अनुबंध को निष्प्रभावी करने के लिए लोक नीति का सहारा नहीं लिया जा सकता है। ऐसी शर्त न तो अनैतिक है, न ही गैर-कानूनी है और न ही इसे कानूनी रूप से गैर-टिकाऊ वर्गीकृत किया जा सकता है।”

अदालत ने ब्याज में समानता न होने के हाईकोर्ट के तर्क को खारिज करते हुए कहा:

“क्लॉज 2 और क्लॉज 19 की शर्तें अलग-अलग क्षेत्रों में काम करती हैं और अलग-अलग उद्देश्यों को पूरा करती हैं।”

हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि क्लॉज 19 को पूरी तरह से पढ़ा जाना चाहिए, जिसके दो हिस्से हैं—ब्याज न देना और तीन महीने के भीतर राशि लौटाना। अदालत ने कहा:

“इस क्लॉज की सही व्याख्या का मतलब यह होगा कि प्रतिवादी की जमा राशि पर कोई ब्याज नहीं मिलेगा और अनुबंध के समाप्त होने या अनुबंध की समाप्ति के तीन महीने के भीतर इसे प्रतिवादी को वापस कर दिया जाएगा।”

पीठ ने माना कि सरकार इस राशि को अनिश्चितकाल के लिए रोककर नहीं रख सकती:

“यदि राज्य तीन महीने से अधिक समय तक सुरक्षा जमा को अपने पास रखता है, तो प्रतिवादी-ठेकेदार ब्याज का हकदार है, जो क्लॉज 19 को ठीक से पढ़ने से बिल्कुल स्पष्ट है।”

सुप्रीम कोर्ट का निर्णय

सुप्रीम कोर्ट ने हरियाणा सरकार की अपीलों को आंशिक रूप से स्वीकार किया। अदालत ने क्लॉज 19 को पूरी तरह से वैध और बाध्यकारी घोषित किया और हाईकोर्ट के उस निर्देश को रद्द कर दिया जिसके तहत सुरक्षा जमा करने की तारीख से ब्याज देने को कहा गया था।

पीठ ने निर्देश दिया कि ठेका समाप्त होने के तीन महीने बाद तक (यानी 9 जून 2000 तक) सुरक्षा जमा पर कोई ब्याज नहीं दिया जाएगा। लेकिन चूंकि अनुबंध 9 मार्च 2000 को समाप्त हो गया था और तीन महीने की अवधि 9 जून 2000 को पूरी हो चुकी थी, इसलिए प्रतिवादी को 9 जून 2000 से लेकर वास्तविक भुगतान या समायोजन की तिथि तक 9 प्रतिशत प्रति वर्ष की दर से साधारण ब्याज पाने का अधिकार होगा। इस मामले में कोर्ट ने किसी भी पक्ष पर अदालती खर्च का कोई बोझ नहीं डाला।

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मामले का विवरण

मामले का शीर्षक: हरियाणा राज्य और अन्य बनाम मेसर्स जय दुर्गा फिनवेस्ट प्राइवेट लिमिटेड
वाद संख्या: सिविल अपील संख्या 3145-3146/2012
पीठ: चीफ जस्टिस सूर्यकांत, जस्टिस वी. मोहाना
निर्णय की तिथि: 13 जुलाई, 2026

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