पश्चिम बंगाल: मदरसा कर्मचारियों को सुप्रीम कोर्ट से झटका, नियमितीकरण और वेतन की मांग वाली याचिकाएं खारिज

सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को पश्चिम बंगाल के 350 से अधिक मदरसा शिक्षकों और गैर-शिक्षण कर्मचारियों को बड़ी राहत देने से इनकार करते हुए उनकी याचिकाओं को खारिज कर दिया। याचिकाकर्ताओं ने राज्य सरकार की सहायता प्राप्त (ग्रांट-इन-एड) योजना के तहत अपनी नियुक्तियों को नियमित करने और बकाया वेतन व भत्तों के भुगतान की मांग की थी।

जस्टिस दीपांकर दत्ता और जस्टिस ए. जी. मसीह की पीठ ने इस मामले की सुनवाई की। अदालत ने स्पष्ट निर्णय लेने के लिए कुल याचिकाओं में से 13 प्रतिनिधि मामलों को छांटकर उनकी गहन जांच की। पीठ का कहना था कि यदि इन 13 नमूनों में से एक भी मामला ठोस या तर्कसंगत पाया जाता, तो अदालत बाकी बचे सभी मामलों पर भी विचार करने के लिए तैयार थी। हालांकि, जांच में इन 13 मामलों में से कोई भी याचिकाकर्ता अपनी दावेदारी साबित नहीं कर सका, जिसके बाद पीठ ने सभी याचिकाओं को आधारहीन बताते हुए खारिज कर दिया।

पीठ ने अपने आदेश में स्पष्ट किया कि पूर्व निर्देश के तहत 350 से अधिक याचिकाकर्ताओं में से छानबीन के बाद 13 के विवरण अदालत के समक्ष रखे गए थे। अदालत इस दृष्टिकोण के साथ आगे बढ़ी थी कि यदि इनमें से कोई एक भी अपनी बात साबित कर पाता, तो अन्य मामलों के दावों पर विचार किया जाता। लेकिन दुर्भाग्य से, 13 मामलों में से कोई भी याचिकाकर्ता अदालत को संतुष्ट नहीं कर सका, इसलिए सभी रिट याचिकाएं योग्यताहीन होने के कारण खारिज की जाती हैं।

विवाद की पृष्ठभूमि

इस कानूनी विवाद की शुरुआत साल 2008 के पश्चिम बंगाल मदरसा सेवा आयोग अधिनियम (वेस्ट बंगाल मदरसा सर्विस कमीशन एक्ट) से हुई थी। इस कानून के जरिए राज्य सरकार ने सहायता प्राप्त मदरसों में शिक्षकों की नियुक्ति की सिफारिश करने के लिए एक वैधानिक आयोग का गठन किया था। इस नए कानून ने स्थानीय मदरसा प्रबंधन समितियों के उस पारंपरिक अधिकार को समाप्त कर दिया था, जिसके तहत वे स्वतंत्र रूप से शिक्षकों और अन्य कर्मचारियों की नियुक्तियां करती थीं।

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अदालती फैसलों का सफर

इस कानून को लेकर लंबे समय तक न्यायिक असमंजस की स्थिति बनी रही। साल 2014 में कलकत्ता हाईकोर्ट की एकल पीठ ने इस अधिनियम को असंवैधानिक घोषित कर दिया था। इसके ठीक एक साल बाद, यानी 2015 में हाईकोर्ट की एक खंडपीठ ने भी इस फैसले को सही ठहराया। हाईकोर्ट का रुख था कि यह कानून संविधान के अनुच्छेद 30 का उल्लंघन करता है, जो सभी धार्मिक और भाषाई अल्पसंख्यकों को अपनी पसंद के शैक्षणिक संस्थान स्थापित करने और उनका संचालन करने का मौलिक अधिकार देता है।

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हालांकि, जनवरी 2020 में इस मामले ने नया मोड़ लिया जब सुप्रीम कोर्ट ने 2008 के इस अधिनियम की संवैधानिक वैधता को पूरी तरह से सही ठहराया।

इसके बाद, सुप्रीम कोर्ट ने फरवरी 2023 में एक विशेष जांच समिति का गठन किया। इस समिति को यह जांचने का जिम्मा सौंपा गया था कि हाईकोर्ट के 2015 के फैसले (जिसने कानून को रद्द किया था) और सुप्रीम कोर्ट के जनवरी 2020 के फैसले (जिसने कानून को वैध ठहराया) के बीच की अनिश्चितता वाली अवधि में की गई नियुक्तियां वैध हैं या नहीं।

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जांच समिति ने अपनी रिपोर्ट में पाया कि इस कानूनी उथल-पुथल की अवधि के दौरान आयोग की निर्धारित प्रक्रिया से बाहर जाकर की गई नियुक्तियां पूरी तरह से अवैध थीं। इसी निष्कर्ष के बाद प्रभावित शिक्षकों और गैर-शिक्षण कर्मचारियों ने सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी थी, जहां सोमवार को उनकी याचिकाएं खारिज हो गईं।

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