एचडी रेवन्ना को राहत देने वाले हाईकोर्ट के फैसले की सुप्रीम कोर्ट करेगा समीक्षा, कर्नाटक सरकार की याचिका पर भेजा नोटिस

सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को जेडी(एस) नेता और विधायक एचडी रेवन्ना को राहत देने वाले हाईकोर्ट के एक फैसले के खिलाफ कर्नाटक सरकार की याचिका पर सुनवाई करने पर सहमति दे दी है। जस्टिस जेबी पारदीवाला और जस्टिस के विनोद चंद्रन की पीठ ने इस मामले में एचडी रेवन्ना को नोटिस जारी कर उनके वकील से एक जवाबी हलफनामा दाखिल करने को कहा है। हाईकोर्ट ने पिछले साल रेवन्ना के खिलाफ दर्ज महिला की गरिमा को ठेस पहुंचाने (आईपीसी की धारा 354) के गंभीर आरोपों को निरस्त कर दिया था, जिसे राज्य सरकार ने चुनौती दी है।

सुप्रीम कोर्ट ने राज्य सरकार की देरी पर उठाए सवाल

सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट की पीठ ने कर्नाटक सरकार की कार्यप्रणाली और समय-सीमा को लेकर सवाल उठाए। पीठ ने पूछा कि जब हाईकोर्ट ने आईपीसी की धारा 354 के तहत आरोपों को हटा दिया था, तब राज्य सरकार ने इसे तुरंत चुनौती क्यों नहीं दी? कोर्ट ने राज्य सरकार को न्यायिक अनुशासन बनाए रखने को भी कहा। इसके साथ ही पीठ ने उल्लेख किया कि पीड़ित घरेलू सहायिका ने पिता और पुत्र (एचडी रेवन्ना और प्रज्वल रेवन्ना) दोनों के खिलाफ अलग-अलग तरह के आरोप लगाए हैं।

हाईकोर्ट का फैसला और निचली अदालत से मिली राहत

यह मामला पिछले साल 19 नवंबर को आए हाईकोर्ट के एक फैसले से जुड़ा है। हाईकोर्ट ने रेवन्ना के खिलाफ दर्ज महिला की गरिमा को ठेस पहुंचाने के आरोप (धारा 354) को खारिज कर दिया था, लेकिन यौन उत्पीड़न के हल्के आरोप (धारा 354ए) को बरकरार रखा था। अदालत ने इसके बाद मामले को निचली अदालत (ट्रायल कोर्ट) के पास भेज दिया था ताकि वह यह जांच कर सके कि दंड प्रक्रिया संहिता (सीआरपीसी) की धारा 468 के तहत शिकायत दर्ज करने में हुई देरी को माफ किया जा सकता है या नहीं।

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चूंकि धारा 354ए के तहत अधिकतम सजा तीन साल की जेल है, इसलिए हाईकोर्ट ने माना था कि यह शिकायत पहली नजर में कानूनन निर्धारित समय-सीमा (लिमिटेशन पीरियड) के बाद दर्ज की गई थी। हाईकोर्ट के इसी निर्देश के आधार पर, पिछले साल 29 दिसंबर को हसन जिले के होलेनारसीपुर शहर थाने से जुड़े इस मामले में अतिरिक्त मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट ने एचडी रेवन्ना को यौन उत्पीड़न के केस से आरोपमुक्त कर दिया था।

शिकायत और कानूनी समय-सीमा का विवाद

यह पूरा मामला रेवन्ना के घर काम करने वाली एक पूर्व घरेलू सहायिका की शिकायत पर दर्ज हुआ था। रेवन्ना ने एफआईआर को निरस्त कराने के लिए हाईकोर्ट का रुख किया था। उनका तर्क था कि शिकायत तीन साल की उस वैधानिक समय-सीमा के बीत जाने के बाद दर्ज की गई है, जो अधिकतम तीन साल की सजा वाले अपराधों पर लागू होती है। इसके विपरीत, सरकारी वकील का कहना था कि यह याचिका अब निष्प्रभावी हो चुकी है क्योंकि पुलिस पहले ही मामले में आरोपपत्र (चार्जशीट) दाखिल कर चुकी है और निचली अदालत ने उस पर संज्ञान भी ले लिया है।

हाईकोर्ट ने अपने फैसले में पीड़िता के शुरुआती बयान और बाद की पुलिस रिपोर्ट के बीच बड़े अंतर का जिक्र किया था, विशेषकर प्रज्वल रेवन्ना के खिलाफ लगाए गए आरोपों के संबंध में, जिन्हें मुख्य आरोपी बनाया गया है। अदालत ने स्पष्ट किया था कि रेवन्ना के खिलाफ आरोप पूरी तरह से पीड़िता के शुरुआती बयान के आधार पर ही तय किए जाने चाहिए, जिससे केवल धारा 354ए का ही मामला बनता है, न कि गंभीर धारा 354 का।

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रेवन्ना परिवार से जुड़े अन्य कानूनी विवाद

एचडी रेवन्ना पूर्व प्रधानमंत्री एचडी देवेगौड़ा के बेटे, केंद्रीय मंत्री एचडी कुमारस्वामी के बड़े भाई और जेल में बंद पूर्व सांसद प्रज्वल रेवन्ना के पिता हैं। रेवन्ना पर यौन उत्पीड़न के ये आरोप तब सामने आए थे जब उनके बेटे प्रज्वल रेवन्ना के खिलाफ बलात्कार और यौन शोषण के कई मामले दर्ज किए गए थे। इस मामले की शिकायतकर्ता भी प्रज्वल के खिलाफ शिकायत दर्ज कराने वाली महिलाओं में से एक है। प्रज्वल रेवन्ना के खिलाफ ये मामले लोकसभा चुनाव से ठीक पहले 26 अप्रैल 2024 को हसन में कथित तौर पर अश्लील वीडियो वाली पेन-ड्राइव बांटे जाने के बाद सामने आए थे। प्रज्वल को उनके खिलाफ दर्ज चार मामलों में से एक में पहले ही दोषी ठहराया जा चुका है।

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