मुस्लिम पर्सनल लॉ के तहत वैवाहिक घोषणाओं से जुड़े एक महत्वपूर्ण मामले में, इलाहाबाद हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया है कि जब दोनों पक्षों के बीच कोई विवाद न हो, तो फैमिली कोर्ट को अतिरिक्त-न्यायिक (extra-judicial) तलाक को औपचारिक रूप से मंजूरी देनी चाहिए। कोर्ट का मानना है कि ऐसा करना इसलिए जरूरी है ताकि लोगों के पास अपनी वैवाहिक स्थिति का एक स्पष्ट और निश्चित सार्वजनिक रिकॉर्ड हो। हाईकोर्ट की लखनऊ पीठ के जस्टिस आलोक माथुर और जस्टिस सैयद कमर हसन रिज़वी की डिवीजन बेंच ने लखनऊ की एक फैमिली कोर्ट के उस आदेश को रद्द कर दिया, जिसने पति के घोषणात्मक वाद (declaratory suit) को केवल इसलिए खारिज कर दिया था क्योंकि तलाक निर्विरोध था। हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि जब पति-पत्नी दोनों अतिरिक्त-न्यायिक तलाक जैसे कि तलाक-ए-हसन की वैधता को स्वीकार करते हैं, तो फैमिली कोर्ट को संक्षेप में मामले को दर्ज करना चाहिए और औपचारिक रूप से उनकी वैवाहिक स्थिति घोषित करनी चाहिए।
मामले की पृष्ठभूमि
दोनों पक्ष सुन्नी मुस्लिम संप्रदाय से संबंध रखते हैं। उनका निकाह 1 फरवरी, 2022 को मुस्लिम पर्सनल लॉ के तहत हुआ था। बाद में दोनों के बीच वैवाहिक विवाद उत्पन्न हो गए, जिसके परिणामस्वरूप वे 12 सितंबर, 2023 से अलग रहने लगे। जब आपसी मतभेदों को सुलझाने के सभी प्रयास विफल हो गए, तो पति ने लखनऊ के ऐशबाग स्थित दारुल कज़ा फरंगी महल के माध्यम से सुलह की कोशिश की। 22 मई, 2024 को हुई बैठक में पत्नी भी शामिल हुई, लेकिन उसने स्पष्ट रूप से तलाक की मांग की।
समझौते का कोई और रास्ता न देख पति ने शरिया के अनुसार तलाक-ए-हसन का तरीका अपनाया। इसके तहत उन्होंने पत्नी को एक-एक महीने के अंतराल पर तीन लिखित नोटिस भेजे। पहला नोटिस 22 जुलाई, 2024 को, दूसरा 22 अगस्त, 2024 को और आखिरी नोटिस 25 सितंबर, 2024 को पंजीकृत डाक के जरिए भेजा गया। ये सभी नोटिस पत्नी को मिले, लेकिन उन्होंने इस दौरान कोई आपत्ति दर्ज नहीं कराई और न ही कोई जवाब दिया।
इसके बाद पति ने निकाह में तय की गई 1,00,000 रुपये की मेहर राशि भी पत्नी को अदा कर दी। पति ने इस तलाक के संबंध में प्रसिद्ध इस्लामी संस्थान दारुल उलूम नदवतुल उलेमा से धार्मिक राय (फतवा) भी मांगी। संस्थान ने 7 अक्टूबर, 2024 को अपनी राय देते हुए कहा: “वर्तमान मामले में, वैवाहिक बंधन पहले ही समाप्त हो चुका है और समझौते या निकाह को फिर से शुरू करने की कोई संभावना नहीं है। बस इतना ही।”
इस तलाक को कानूनी रूप से प्रमाणित कराने के लिए पति ने फैमिली कोर्ट्स एक्ट, 1984 की धारा 7 के तहत लखनऊ के फैमिली कोर्ट के प्रिंसिपल जज के समक्ष एक घोषणात्मक वाद दायर किया। पत्नी ने 24 जनवरी, 2025 को दाखिल अपने लिखित बयान और 26 मार्च, 2025 को साक्ष्य के तौर पर दिए गए अपने हलफनामे में पति के सभी कथनों को स्वीकार किया। उन्होंने मेहर राशि मिलने की पुष्टि की और कहा कि उन्हें भी तलाक की डिक्री की आवश्यकता है।
हालांकि, 20 मई, 2025 को लखनऊ फैमिली कोर्ट के एडिशनल प्रिंसिपल जज ने इस वाद को खारिज कर दिया। निचली अदालत का तर्क था कि चूंकि पत्नी या किसी अन्य व्यक्ति ने इस तलाक का विरोध नहीं किया है, और पति ने यह नहीं बताया कि उसे इस कानूनी घोषणा की आवश्यकता क्यों है, इसलिए यह वाद विशिष्ट अनुतोष अधिनियम (Specific Relief Act) की धारा 34 और सिविल प्रक्रिया संहिता (CPC) की धारा 20 के तहत बाधित होने के कारण खारिज किए जाने योग्य है।
पक्षों की दलीलें
फैमिली कोर्ट के इस फैसले को हाईकोर्ट में चुनौती देते हुए पति के वकील ने तर्क दिया कि निचली अदालत ने विशिष्ट अनुतोष अधिनियम की धारा 34 और सीपीसी की धारा 20 के प्रावधानों को पूरी तरह से गलत तरीके से लागू किया है। वकील का कहना था कि यह वाद स्पष्ट रूप से फैमिली कोर्ट्स एक्ट, 1984 की धारा 7 के तहत वैवाहिक स्थिति की घोषणा के लिए लाया गया था, इसलिए क्षेत्राधिकार या वाद-कारण (cause of action) के अभाव का कोई सवाल ही नहीं था। इसके अलावा, वकील ने इस बात पर जोर दिया कि फैमिली कोर्ट दोनों पक्षों द्वारा अदालत में दिए गए उन स्पष्ट बयानों को समझने में विफल रही, जिसमें दोनों ने आपसी सहमति से तलाक को स्वीकार किया था और औपचारिक डिक्री की मांग की थी।
यद्यपि पत्नी की ओर से भी वकील के माध्यम से वकालतनामा पेश किया गया था, लेकिन उनकी तरफ से अपील का विरोध करने के लिए कोई औपचारिक आपत्ति या जवाब दाखिल नहीं किया गया, जो तलाक को स्वीकार करने के उनके लगातार रुख को दर्शाता है।
हाईकोर्ट का विश्लेषण
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने मुस्लिम विवाहों को नियंत्रित करने वाले कानूनी ढांचे की समीक्षा करते हुए अपने विश्लेषण की शुरुआत की। कोर्ट ने ध्यान दिलाया कि मुस्लिम पर्सनल लॉ (शरिया) एप्लीकेशन एक्ट, 1937 की धारा 2 यह स्पष्ट करती है कि विवाह और उसके विघटन (जिसमें तलाक भी शामिल है) से जुड़े मामलों में शरिया ही “निर्णय का नियम” होगा।
हाईकोर्ट ने इस बात को रेखांकित किया कि मुस्लिम महिला (विवाह पर अधिकारों का संरक्षण) अधिनियम, 2019 ने तात्कालिक और अपरिवर्तनीय तीन तलाक (तलाक-ए-बिद्दत) को अवैध और दंडनीय घोषित किया है, लेकिन तलाक के अन्य पारंपरिक तरीके जैसे कि तलाक-ए-हसन (जिसमें तीन महीनों के अंतराल पर तीन बार घोषणा की जाती है) व्यक्तिगत कानून के तहत आज भी वैध और स्वीकार्य हैं।
इस सिद्धांत की पुष्टि के लिए कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के ऐतिहासिक फैसले शायरा बानो बनाम यूनियन ऑफ इंडिया (2017) 9 SCC 1 का हवाला दिया। कोर्ट ने कहा कि अतिरिक्त-न्यायिक तलाक शरिया के अनुसार घोषित किए जाने के तुरंत बाद ही पूरे हो जाते हैं और कानूनी रूप से प्रभावी होने के लिए उन्हें अदालत की मुहर की अनिवार्य आवश्यकता नहीं होती है।
फैमिली कोर्ट की भूमिका को स्पष्ट करने के लिए हाईकोर्ट ने केरल हाईकोर्ट के ऐतिहासिक फैसले अस्बी के.एन. बनाम हाशिम एम.यू. (2021 SCC OnLine Ker 3945) में दिए गए दिशा-निर्देशों का सहारा लिया। केरल हाईकोर्ट ने कहा था:
“फैमिली कोर्ट द्वारा धारा 7(डी) के तहत अतिरिक्त-न्यायिक तलाक को मंजूरी देना और उसके परिणामस्वरूप पक्षों की स्थिति की घोषणा करना केवल अतिरिक्त-न्यायिक तलाक का एक सार्वजनिक रिकॉर्ड रखने के उद्देश्य से है। इसलिए, अतिरिक्त-न्यायिक तलाक को मंजूरी देने और वैवाहिक स्थिति घोषित करने के लिए किसी भी पक्ष द्वारा शुरू की गई कार्यवाही में विस्तृत जांच न तो आवश्यक है और न ही वांछनीय है।”
इन सिद्धांतों को लागू करते हुए इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा कि चूंकि पत्नी ने हलफनामा दायर कर मेहर और नोटिस प्राप्ति की बात खुद स्वीकार की थी, इसलिए इस मामले में कोई आपसी विवाद बचा ही नहीं था। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि अदालती कार्यवाही और बयानों में दी गई स्वीकारोक्ति ही किसी भी तथ्य का सबसे बड़ा और पुख्ता सबूत होती है।
हाईकोर्ट ने फैमिली कोर्ट के संकीर्ण दृष्टिकोण की आलोचना की और कहा कि एक नागरिक के लिए अपने जीवन में आगे बढ़ने के लिए वैवाहिक स्थिति का स्पष्ट कानूनी रिकॉर्ड होना बेहद महत्वपूर्ण है। समाज पर इसके व्यापक प्रभाव का जिक्र करते हुए कोर्ट ने टिप्पणी की:
“सभ्य समाज के प्रत्येक सदस्य को एक स्पष्ट और निश्चित वैवाहिक स्थिति का अधिकार है, विशेष रूप से तब जब ऐसी स्थिति लागू व्यक्तिगत कानूनों या मान्यता प्राप्त और स्वीकृत प्रथागत तौर-तरीकों से उत्पन्न होती है।”
हाईकोर्ट ने निष्कर्ष निकाला कि लखनऊ की फैमिली कोर्ट ने पूरी तरह से गलत और अनुचित आधारों पर इस वाद को खारिज किया था, इसलिए 20 मई, 2025 का वह आदेश पूरी तरह से त्रुटिपूर्ण और कानूनन टिकने योग्य नहीं है।
कोर्ट का निर्णय
अपील को स्वीकार करते हुए हाईकोर्ट की डिवीजन बेंच ने लखनऊ फैमिली कोर्ट के 20 मई, 2025 के आदेश को निरस्त कर दिया। इसके साथ ही कोर्ट ने पति द्वारा दायर घोषणात्मक वाद को डिक्री करते हुए दोनों पक्षों की वैवाहिक स्थिति को औपचारिक रूप से ‘तलाकशुदा’ घोषित कर दिया।
मामले का विवरण
मामले का शीर्षक: सैयद मोहम्मद मोमिन अख्तर बनाम साइमा फारूकी
वाद संख्या: फर्स्ट अपील संख्या 119/2025
पीठ: जस्टिस आलोक माथुर, जस्टिस सैयद कमर हसन रिज़वी
निर्णय की तिथि: 03 जुलाई, 2026

