सहमति से पारित आर्बिट्रल अवॉर्ड को सक्रिय रूप से लागू करने के बाद धारा 34 के तहत समय सीमा की आपत्ति नहीं उठाई जा सकती: दिल्ली हाईकोर्ट

दिल्ली हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया है कि जो पक्षकार किसी आपसी सहमति से बने मध्यस्थता पुरस्कार (आर्बिट्रल अवॉर्ड) को लागू करने में सक्रिय रूप से भाग लेता है और उससे लाभ प्राप्त करता है, वह बाद में मध्यस्थता और सुलह अधिनियम, 1996 की धारा 34 के तहत इसकी वैधता को चुनौती नहीं दे सकता, खासकर लंबे समय की देरी के बाद। जस्टिस हरीश वैजनाथ शंकर की पीठ ने एक अंतरिम आर्बिट्रल अवॉर्ड को चुनौती देने वाली आपत्ति याचिका (ऑब्जेक्शन पिटीशन) को समय सीमा (लिमिटेशन) के आधार पर खारिज कर दिया। इसके साथ ही, कोर्ट ने इस अवॉर्ड को लागू करने की मांग करने वाली निष्पादन याचिका (एक्जीक्यूशन पिटीशन) को स्वीकार करते हुए अवॉर्ड को तुरंत लागू करने का निर्देश दिया।

मामले की पृष्ठभूमि

यह विवाद एक ही परिवार के तीन सगे भाइयों के बीच का है, जिनके बीच पारिवारिक व्यवसाय और संपत्तियों के विभाजन को लेकर विवाद था। साल 2019 में, भाइयों ने संपत्तियों के बंटवारे को लेकर 27 फरवरी 2019 को एक समझौता ज्ञापन (MoU) निष्पादित किया था। हालांकि, बाद में इस पर अमल नहीं हो सका और उनके बीच नए विवाद खड़े हो गए।

इन विवादों को सुलझाने के लिए, तीनों भाइयों ने 13 जून 2021 को एक मध्यस्थता समझौता (आर्बिट्रेशन एग्रीमेंट) किया और मामला तीन सदस्यों वाले मध्यस्थता ट्रिब्यूनल को सौंप दिया। वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के माध्यम से सुनवाई के बाद, ट्रिब्यूनल ने 13 नवंबर 2021 को एक अंतरिम अवॉर्ड पारित किया। यह अवॉर्ड दो मुख्य संपत्तियों से संबंधित था – पहली गुरुग्राम (हरियाणा) की सुशांत लोक स्थित संपत्ति और दूसरी हावड़ा (पश्चिम बंगाल) की डॉबसन रोड स्थित संपत्ति।

अवॉर्ड पारित होने वाले दिन ही, ट्रिब्यूनल और परिवार के सदस्यों के एक संयुक्त व्हाट्सएप (WhatsApp) ग्रुप पर अवॉर्ड की एक बिना हस्ताक्षर वाली प्रति (अन्साइंड कॉपी) पोस्ट की गई थी। इसके बाद जनवरी 2024 में, याचिकाकर्ता भाई ने धारा 34 के तहत इस अवॉर्ड को रद्द करने के लिए हाईकोर्ट का रुख किया। याचिकाकर्ता का दावा था कि उसे हस्ताक्षरित प्रति (साइंड कॉपी) तब मिली जब अन्य भाइयों ने 2023 में इसके निष्पादन (एक्जीक्यूशन) की कार्यवाही शुरू की थी।

पक्षों की दलीलें

याचिकाकर्ता के वकील ने दलील दी कि यह अंतरिम अवॉर्ड अवैध और मनमाना है क्योंकि ट्रिब्यूनल ने अधिनियम के तहत उचित प्रक्रिया का पालन नहीं किया। उनके मुख्य तर्क इस प्रकार थे:

  • मध्यस्थों ने पक्षों से कोई औपचारिक दावा या जवाबी दावा (क्लेम या काउंटर-क्लेम) नहीं मांगा।
  • अवॉर्ड में कोई ठोस कारण नहीं दिया गया था, जो अधिनियम की धारा 31 का उल्लंघन है।
  • ट्रिब्यूनल ने अपने अधिकार क्षेत्र से बाहर जाकर गुरुग्राम की संपत्ति को ट्रांसफर करने का निर्देश दिया, जो कि परिवार की अन्य महिला सदस्यों के स्वामित्व में भी थी, जो इस मध्यस्थता समझौते का हिस्सा नहीं थीं।
  • अवॉर्ड पर तीन में से केवल दो मध्यस्थों के हस्ताक्षर थे और तीसरे मध्यस्थ के हस्ताक्षर न होने का कोई कारण नहीं बताया गया, जो धारा 31(1) और (2) का उल्लंघन है।
  • याचिकाकर्ता को अवॉर्ड की हस्ताक्षरित प्रति औपचारिक रूप से नहीं दी गई थी, इसलिए धारा 34(3) के तहत समय सीमा (लिमिटेशन) की अवधि शुरू ही नहीं हुई थी।
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दूसरी ओर, प्रतिवादी भाइयों के वकील ने याचिका की विचारणीयता (मेंटेनेबिलिटी) पर कड़ा विरोध किया और इसे समय सीमा से बाहर बताया। उनके मुख्य तर्क निम्नलिखित थे:

  • यह याचिका धारा 34(3) के तहत निर्धारित समय सीमा के बाद दायर की गई है क्योंकि अवॉर्ड 13 नवंबर 2021 को पारित हुआ था और आपत्ति याचिका तीन साल से अधिक समय बाद जनवरी 2024 में बिना किसी देरी माफी के आवेदन के दायर की गई।
  • याचिकाकर्ता को अवॉर्ड की पूरी जानकारी थी, क्योंकि जिस दिन इसे व्हाट्सएप ग्रुप पर डाला गया था, उसने उसी दिन “नोटेड थैंक्स” लिखकर अपनी सहमति दी थी।
  • दोनों पक्षों ने अवॉर्ड को लागू करने के लिए सक्रिय कदम उठाए थे। इसमें ट्रांसफर और गिफ्ट डीड के ड्राफ्ट का आदान-प्रदान करना, पर्सनल गारंटी से बाहर निकलने के लिए डॉयचे बैंक से एनओसी पर बातचीत करना और गुरुग्राम की संपत्ति से घरेलू सामान हटाना शामिल था।
  • कानून के ‘एप्रोबेट और रेप्रोबेट’ (एक साथ पक्ष और विपक्ष में न जाना) के सिद्धांत के अनुसार, याचिकाकर्ता अवॉर्ड के लाभ लेने के बाद उसे चुनौती नहीं दे सकता।

कोर्ट का विश्लेषण

कोर्ट ने अपना पूरा ध्यान इस बात पर केंद्रित किया कि क्या यह आपत्ति याचिका धारा 34(3) के तहत तय समय सीमा से बाहर थी। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि धारा 34(3) आपत्ति दर्ज करने के लिए केवल तीन महीने का समय देती है, जिसे पर्याप्त कारण दिखाने पर अधिकतम 30 दिनों के लिए बढ़ाया जा सकता है, लेकिन उसके बाद बिल्कुल नहीं।

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कोर्ट ने कहा कि धारा 34(3) की भाषा अनिवार्य है और यह अतिरिक्त 30 दिनों के बाद की देरी को माफ करने पर पूरी तरह रोक लगाती है। कोर्ट ने इस संबंध में सुप्रीम कोर्ट के यूनियन ऑफ इंडिया बनाम पॉपुलर कंस्ट्रक्शन कंपनी और सिम्प्लेक्स इंफ्रास्ट्रक्चर लिमिटेड बनाम यूनियन ऑफ इंडिया मामलों का उल्लेख किया, जिसमें स्पष्ट किया गया है कि तय समय सीमा के बाद दायर याचिकाओं पर विचार नहीं किया जा सकता।

याचिकाकर्ता के इस तर्क पर कि हस्ताक्षरित प्रति न मिलने से समय सीमा शुरू नहीं हुई, कोर्ट ने व्हाट्सएप संदेशों और पक्षों के आचरण का बारीक विश्लेषण किया। कोर्ट ने पाया कि याचिकाकर्ता लगातार ट्रांसफर डीड के मसौदे तैयार करने, शर्तें तय करने और बैंक एनओसी लेने की प्रक्रिया में शामिल रहा था।

अवॉर्ड की प्रकृति पर टिप्पणी करते हुए कोर्ट ने कहा: “चुनौती दिया गया अवॉर्ड किसी विवादित न्यायिक प्रक्रिया का परिणाम नहीं था, बल्कि यह पक्षों के बीच आपसी सहमति और समझ के आधार पर दिया गया था।”

कोर्ट ने माना कि अवॉर्ड को लागू करने में याचिकाकर्ता की सक्रिय भागीदारी उसके बाद की कानूनी चुनौती के बिल्कुल विपरीत थी। एस्टोपेल (विबंध) और चुनाव के सिद्धांत का हवाला देते हुए कोर्ट ने टिप्पणी की: “यह सिद्धांत कि कोई पक्षकार एक साथ पक्ष और विपक्ष में तर्क नहीं दे सकता, इस बुनियादी नियम पर आधारित है कि जो व्यक्ति किसी लेनदेन से मिलने वाले लाभों को जानबूझकर स्वीकार करता है, वह बाद में उसी लेनदेन की वैधता को चुनौती नहीं दे सकता।”

भारतीय अनुबंध अधिनियम, 1872 की धाराओं का हवाला देते हुए और दिल्ली हाईकोर्ट के ही मिडपॉइंट कॉमोडियल प्राइवेट लिमिटेड बनाम फिडाटोसिटी होम्स प्राइवेट लिमिटेड व अन्य मामले के सिद्धांतों को लागू करते हुए कोर्ट ने माना कि पक्षों के बीच आपसी सहमति (कॉन्सेन्सस एड इडम) थी और उन्होंने अवॉर्ड की शर्तों को स्वीकार किया था।

इसके अलावा, कोर्ट ने ओपीजी पावर जनरेशन (पी) लिमिटेड बनाम एनेक्सियो पावर कूलिंग सॉल्यूशंस (इंडिया) (पी) लिमिटेड मामले के तहत पेटेंट अवैधता (पेटेंट इल्लीगैलिटी) और सार्वजनिक नीति (पब्लिक पॉलिसी) के सिद्धांतों को भी रेखांकित किया।

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कोर्ट ने परिवार की अन्य महिला सदस्यों के अधिकारों से संबंधित याचिकाकर्ता की दलील को भी खारिज कर दिया। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि संबंधित सदस्य ने खुद अवॉर्ड को चुनौती नहीं दी है और याचिकाकर्ता किसी तीसरे पक्ष की ओर से अवॉर्ड को चुनौती नहीं दे सकता।

तीसरे मध्यस्थ के हस्ताक्षर न होने की तकनीकी आपत्ति को भी खारिज कर दिया गया क्योंकि याचिकाकर्ता ने दो साल से अधिक समय तक बिना किसी विरोध के अवॉर्ड को स्वीकार किया और उसे लागू करने की प्रक्रिया में लगातार भाग लिया था।

देरी और लिमिटेशन के मुद्दे पर निर्णय देते हुए कोर्ट ने कहा: “यह याचिका, जो केवल निष्पादन (एक्जीक्यूशन) कार्यवाही शुरू होने के बाद दायर की गई है और जिसमें देरी को माफ करने के लिए कोई आवेदन या लंबे समय तक निष्क्रिय रहने का कोई संतोषजनक स्पष्टीकरण नहीं दिया गया है, मध्यस्थता अधिनियम की धारा 34(3) के तहत समय सीमा (लिमिटेशन) से पूरी तरह बाधित है।”

कोर्ट का निर्णय

दिल्ली हाईकोर्ट ने आपत्ति याचिका (O.M.P. 3/2024) और इससे जुड़े सभी आवेदनों को समय सीमा से बाहर पाते हुए खारिज कर दिया और याचिकाकर्ता के अन्य आधारों पर विचार करने से पूरी तरह इनकार कर दिया।

वहीं, निष्पादन याचिका (EX.P. 82/2023) पर सुनवाई करते हुए कोर्ट को अंतरिम अवॉर्ड को लागू करने में कोई कानूनी बाधा नहीं मिली। इसके परिणामस्वरूप, कोर्ट ने याचिकाकर्ता भाई (जजमेंट डेटर) को निर्देश दिया कि वह गुरुग्राम स्थित सुशांत लोक, फेज-1 की संपत्ति को छह सप्ताह के भीतर अंतरिम अवॉर्ड में तय की गई प्रक्रिया के तहत डिक्री होल्डर्स (प्रतिवादी भाइयों) के पक्ष में ट्रांसफर करे।

कोर्ट ने इस आदेश के अनुपालन की निगरानी के लिए मामले को 20 अगस्त 2026 को रोस्टर बेंच के समक्ष सूचीबद्ध करने का निर्देश दिया।

मामले का विवरण

मामले का शीर्षक: विनय मावंडिया बनाम बिमल मावंडिया एवं अन्य
वाद संख्या: ओ.एम.पी. 3/2024 एवं आई.ए. 3246/2024 तथा एक्जीक्यूशन पिटीशन 82/2023 एवं एक्जीक्यूशन एप्लीकेशन (ओएस) 1564/2023
पीठ: जस्टिस हरीश वैजनाथ शंकर
निर्णय की तिथि: 6 जुलाई 2026

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