झारखंड हाईकोर्ट का बड़ा आदेश: बर्खास्त सिपाही को बहाल करने का निर्देश, कहा – एडल्ट्री अब अपराध नहीं

झारखंड हाईकोर्ट ने राज्य सशस्त्र पुलिस (जेएपी) के एक सिपाही की बर्खास्तगी को रद्द करते हुए उसे नौकरी पर बहाल करने का निर्देश दिया है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि एडल्ट्री (व्यभिचार) अब कोई आपराधिक अपराध नहीं है और विभाग द्वारा की गई कार्रवाई मनमानी व संवैधानिक अधिकारों का हनन थी।

जस्टिस दीपक रोशन की एकल पीठ ने आदेश दिया कि सिपाही भारत पाठक को तत्काल सेवा में वापस लिया जाए और उन्हें बकाया वेतन (बैक वेजेस) समेत सभी सेवा लाभ दिए जाएं। हालांकि, हाईकोर्ट ने साफ किया कि यह राहत केवल विभागीय कार्रवाई के मामले में दी गई है। पाठक के खिलाफ ट्रायल कोर्ट में चल रहे आपराधिक मुकदमे पर इसका कोई असर नहीं पड़ेगा और वह मामला स्वतंत्र रूप से चलता रहेगा।

जांच में भारी विसंगतियां और प्राकृतिक न्याय का उल्लंघन

कोर्ट ने विभागीय जांच के रिकॉर्ड का विश्लेषण करने के बाद पाया कि सिपाही के खिलाफ कार्रवाई में गंभीर प्रक्रियात्मक खामियां थीं। प्रारंभिक जांच केवल शिकायतकर्ता महिला के बयानों पर आधारित थी, जिसके समर्थन में कोई ठोस सबूत नहीं थे। जिरह के दौरान जांच अधिकारियों ने खुद स्वीकार किया कि कथित शादी का कोई दस्तावेजी प्रमाण नहीं था। इसके अलावा, जिस किराए के मकान में दोनों के रहने का दावा किया गया था, वहां के मकान मालिक का कोई बयान नहीं लिया गया और न ही किसी होटल की सीसीटीवी फुटेज कोर्ट में पेश की गई।

हाईकोर्ट ने इस बात पर भी कड़ा ऐतराज जताया कि विभाग ने सिपाही को उस आधार पर बर्खास्त कर दिया जो आरोप पत्र (चार्जशीट) का हिस्सा ही नहीं था। विभाग ने बर्खास्तगी के आदेश में दर्ज कराई गई रेप की एफआईआर का हवाला दिया था, जबकि विभागीय जांच के दौरान इस संबंध में कोई औपचारिक आरोप नहीं तय किए गए थे। कोर्ट के अनुसार, बिना आरोप तय किए सजा सुनाना पूरी तरह से अवैध है और यह प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों के खिलाफ है।

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सुप्रीम कोर्ट के ऐतिहासिक फैसले और साक्ष्यों की अनदेखी

अपने फैसले में जस्टिस रोशन ने सुप्रीम कोर्ट के ऐतिहासिक ‘जोसेफ शाइन’ मामले का विशेष रूप से जिक्र किया। उन्होंने कहा कि सुप्रीम कोर्ट पहले ही एडल्ट्री को अपराध की श्रेणी से बाहर कर चुका है। हाईकोर्ट ने माना कि विभागीय और अपीलीय अधिकारी सबूतों के बजाय केवल आरोपों की गंभीरता से प्रभावित हो गए थे।

अदालत ने पाया कि किसी भी अधिकारी ने अपने आदेश में यह स्पष्ट नहीं किया कि पुख्ता सबूतों की अनुपस्थिति में आरोपों को कैसे सही मान लिया गया। इसे मनमाना, असंगत और संविधान के अनुच्छेद 14 और 21 का उल्लंघन बताते हुए कोर्ट ने बर्खास्तगी और अपील खारिज करने के विभागीय आदेशों को पूरी तरह से रद्द कर दिया।

क्या था पूरा मामला

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यह मामला भारत पाठक नाम के सिपाही से जुड़ा है, जो साल 2007 में झारखंड सशस्त्र पुलिस में शामिल हुए थे। साल 2023 में एक शादीशुदा महिला ने रांची के जेएपी-10 के कमांडेंट से शिकायत की थी। महिला का आरोप था कि दोनों के विवाहित होने और बच्चे होने के बावजूद पाठक ने उससे शादी की और अक्टूबर 2019 से अप्रैल 2023 तक पति-पत्नी की तरह साथ रहे। महिला ने दावा किया कि सिपाही ने उसके साथ शारीरिक संबंध बनाए और बाद में रिश्ता स्वीकार करने से मुकर गया।

इस शिकायत के बाद पाठक के खिलाफ रांची में धोखाधड़ी (धारा 417) और बलात्कार (धारा 376(2)(n)) के तहत एफआईआर दर्ज की गई थी। इसके साथ ही विभागीय जांच भी शुरू हुई। पाठक को सितंबर 2023 में निलंबित कर दिया गया था और दिसंबर 2024 में सेवा से बर्खास्त कर दिया गया था। विभागीय अपील खारिज होने के बाद पाठक ने हाईकोर्ट का रुख किया था। हाईकोर्ट ने पिछले महीने इस मामले में अपना फैसला सुनाया था, जिसका विस्तृत आदेश इस महीने की शुरुआत में ऑनलाइन अपलोड किया गया।

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