मॉर्फ्ड फोटो मामला: राजस्थान हाईकोर्ट ने आरोपी को दी जमानत, लेकिन तीन साल तक सोशल मीडिया इस्तेमाल करने पर लगाई रोक

राजस्थान हाईकोर्ट ने एक नाबालिग लड़की की मॉर्फ्ड (छेड़छाड़ की गई) तस्वीर सोशल मीडिया पर पोस्ट करने के आरोपी युवक को जमानत दे दी है। हालांकि, हाईकोर्ट ने आरोपी की जमानत के साथ एक अनोखी शर्त जोड़ी है, जिसके तहत वह अगले तीन साल तक किसी भी सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म का इस्तेमाल नहीं कर सकेगा। जस्टिस अशोक कुमार जैन ने 6 जुलाई को यह आदेश जारी करते हुए कहा कि आरोपी को यह सबक सिखाना जरूरी है कि वह ऑनलाइन प्लेटफॉर्म का दुरुपयोग न करे।

अदालत ने माना कि चूंकि पुलिस की जांच पूरी हो चुकी है और निचली अदालत (ट्रायल कोर्ट) में पीड़िता व उसकी मां जैसे मुख्य गवाहों के बयान दर्ज किए जा चुके हैं, इसलिए आरोपी को जमानत दी जा सकती है। मुख्य गवाहों की गवाही पहले ही पूरी होने के कारण आरोपी द्वारा गवाहों को प्रभावित करने की आशंका अब बहुत कम हो गई है।

जमानत के लिए अदालत की सख्त शर्तें

आरोपी को अपनी रिहाई के लिए 50,000 रुपये का निजी मुचलका और इतनी ही राशि के दो जमानतदार पेश करने होंगे। इसके साथ ही, उसे ट्रायल कोर्ट के समक्ष एक औपचारिक शपथ पत्र (हलफनामा) देना होगा कि वह अगले तीन साल तक फेसबुक, इंस्टाग्राम, थ्रेड्स और स्नैपचैट सहित किसी भी सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म का उपयोग नहीं करेगा।

अदालत के आदेश के अनुसार, यदि आरोपी अपने असली नाम या किसी फर्जी आईडी से सोशल मीडिया का इस्तेमाल करते हुए पाया जाता है, तो ट्रायल कोर्ट को उसकी जमानत तत्काल रद्द करने का अधिकार होगा। इसके अलावा, आपराधिक कार्यवाही पूरी होने तक आरोपी को पीड़िता या उसके परिवार के सदस्यों से प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से संपर्क करने पर पूरी तरह प्रतिबंधित किया गया है। उसे सबूतों के साथ छेड़छाड़ न करने और किसी भी अन्य आपराधिक गतिविधि में शामिल न होने के निर्देश दिए गए हैं।

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मामले की पृष्ठभूमि और पुलिस की कार्रवाई

यह मामला नाबालिग लड़की की मां द्वारा 11 फरवरी 2026 को दर्ज कराई गई शिकायत से शुरू हुआ था, जिसके बाद अगले ही दिन 12 फरवरी को पुलिस ने एफआईआर (FIR) दर्ज की। अभियोजन पक्ष का आरोप है कि आरोपी ने लड़की की फोटो के साथ छेड़छाड़ की और उसे बदनाम करने के उद्देश्य से 18 सितंबर 2025 से 16 अक्टूबर 2025 के बीच सोशल मीडिया पर अपलोड कर दिया।

जांच पूरी होने के बाद पुलिस ने आरोपी के खिलाफ चार्जशीट दाखिल की। इसमें भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धारा 77 (महिला की निजता का उल्लंघन), बाल यौन अपराध संरक्षण (पॉक्सो) अधिनियम की धारा 11 (यौन उत्पीड़न) व धारा 12 (सजा), और सूचना प्रौद्योगिकी (आईटी) अधिनियम की धारा 67ए (यौन रूप से स्पष्ट सामग्री का प्रकाशन) के तहत आरोप लगाए गए हैं।

अदालत में दोनों पक्षों की दलीलें

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सुनवाई के दौरान सरकारी वकील और पीड़िता के कानूनी प्रतिनिधि ने जमानत याचिका का कड़ा विरोध किया। उन्होंने दलील दी कि पीड़िता पहले ही अपने बयान दर्ज करा चुकी है और मामला गंभीर है।

दूसरी तरफ, बचाव पक्ष के वकील ने तर्क दिया कि उनके मुवक्किल को इस मामले में झूठा फंसाया गया है। चूंकि जांच पहले ही पूरी हो चुकी है, इसलिए आरोपी को हिरासत में रखकर पूछताछ करने की कोई आवश्यकता नहीं है। वकील ने कहा कि आरोपी के फरार होने या मुकदमे में बाधा डालने की कोई आशंका नहीं है। बचाव पक्ष ने आरोपी को एक युवा बताते हुए कहा कि पीड़िता के साथ उसकी पहले दोस्ती थी। वह 2 अप्रैल 2026 से हिरासत में है, इसलिए उसे खुद में सुधार करने और कानूनी कार्यवाही में सहयोग करने का एक मौका दिया जाना चाहिए। बचाव पक्ष ने यह भी कहा कि आरोपी सोशल मीडिया पाबंदी की शर्त का पालन करने के लिए पूरी तरह तैयार है।

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जमानत मंजूर करते हुए जस्टिस जैन ने आरोपी की हिरासत की अवधि और मुकदमे के पूरा होने में लगने वाले संभावित समय को ध्यान में रखा। हाईकोर्ट ने साफ किया कि जमानत देने के इस फैसले को मामले के गुण-दोष पर अदालत की अंतिम राय नहीं माना जाना चाहिए।

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