इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक पारिवारिक अदालत (फैमिली कोर्ट) के भरण-पोषण (मेंटेनेंस) आदेश को आंशिक रूप से बदलते हुए पत्नी के पक्ष में दिए गए फैसले को रद्द कर दिया है। कोर्ट ने यह कदम पत्नी के बैंक खाते में एक अज्ञात तीसरे व्यक्ति द्वारा नियमित रूप से किए जा रहे बैंक ट्रांसफर की कोई स्पष्ट वजह न बता पाने के कारण उठाया। जस्टिस लक्ष्मी कांत शुक्ला की पीठ ने स्पष्ट किया कि यद्यपि पत्नी पति से मेंटेनेंस प्राप्त करने की हकदार नहीं रह गई है, लेकिन दंपति के नाबालिग बेटे को दिया जाने वाला भरण-पोषण पूरी तरह वैध रहेगा और उसमें कोई बदलाव नहीं किया जाएगा।
मामले की पृष्ठभूमि
मामले के अनुसार, याचिकाकर्ता (पति) ने आगरा की फैमिली कोर्ट नंबर 2 के एडिशनल प्रिंसिपल जज द्वारा 6 दिसंबर, 2024 को पारित आदेश को हाईकोर्ट में चुनौती दी थी। ट्रायल कोर्ट ने आपराधिक प्रक्रिया संहिता (सीआरपीसी) की धारा 125 के तहत दायर याचिका को स्वीकार करते हुए पत्नी को 15,000 रुपये और नाबालिग बेटे को 10,000 रुपये प्रति माह मेंटेनेंस देने का निर्देश दिया था। पति ने इस आदेश को हाईकोर्ट में चुनौती देते हुए तर्क दिया कि ट्रायल कोर्ट ने बिना न्यायिक विवेक का इस्तेमाल किए, मनमाने और यांत्रिक तरीके से अनुमानों के आधार पर यह आदेश पारित किया है।
दोनों पक्षों की दलीलें
याचिकाकर्ता (पति) के वकील ने कोर्ट के सामने दो मुख्य आधार रखे। पहला, ट्रायल कोर्ट ने पति की उस दलील पर विचार ही नहीं किया, जिसमें सीआरपीसी की धारा 125(4) के तहत पत्नी पर व्यभिचार (एडल्ट्री) में रहने का आरोप लगाया गया था। वकील ने दलील दी कि क्रॉस-एग्जामिनेशन के दौरान पत्नी ने खुद स्वीकार किया था कि उसे ललित मोहन पांडेय नामक एक तीसरे व्यक्ति से नियमित रूप से हर महीने 10,000 रुपये का बैंक ट्रांसफर मिल रहा था। हालांकि, पत्नी ने किसी भी गलत संबंध से इनकार किया और दावा किया कि वह इस व्यक्ति को व्यक्तिगत रूप से नहीं जानती, कभी उससे मिली नहीं है और न ही उसका पता जानती है, लेकिन उसने यह जरूर माना कि पति से अलग होने के बाद भी ये बैंक ट्रांसफर लगातार जारी रहे। पति के वकील का कहना था कि बिना किसी स्पष्ट वजह के नियमित रूप से मिल रहे ये पैसे या तो एडल्ट्री की ओर इशारा करते हैं या फिर यह दर्शाते हैं कि पत्नी के पास आय का स्वतंत्र स्रोत है और वह अपना भरण-पोषण करने में सक्षम है। इन दोनों ही स्थितियों में वह कानूनन पति से मेंटेनेंस पाने की हकदार नहीं रह जाती। इसके अलावा, पति ने दावा किया कि पत्नी की शिकायत के कारण उसकी जूता बनाने वाली कंपनी की नौकरी चली गई, जिससे उसकी मासिक आय 27,000-28,000 रुपये से घटकर केवल 22,000 रुपये रह गई है।
दूसरी ओर, राज्य सरकार का प्रतिनिधित्व कर रहे एडिशनल गवर्नमेंट एडवोकेट (ए.जी.ए.) ने इस याचिका का कड़ा विरोध किया। ए.जी.ए. ने दलील दी कि पत्नी को बैंक के जरिए मिल रहे पैसे चिकित्सा उपचार के लिए दी जाने वाली वित्तीय सहायता थी, इसलिए इसके आधार पर पत्नी के खिलाफ कोई भी प्रतिकूल धारणा नहीं बनाई जानी चाहिए। साथ ही, उन्होंने कहा कि पति की नौकरी जाने और आय कम होने के दावों के समर्थन में कोई भी दस्तावेजी सबूत पेश नहीं किया गया है।
हाईकोर्ट का विश्लेषण और निष्कर्ष
रिकॉर्ड और सबूतों की समीक्षा करने के बाद, हाईकोर्ट ने बिना किसी स्पष्टीकरण के मिल रहे बैंक ट्रांसफर को लेकर पति के तर्कों में दम पाया। अजनबी व्यक्ति से पैसे मिलने के संबंध में पत्नी की गवाही पर टिप्पणी करते हुए जस्टिस लक्ष्मी कांत शुक्ला ने कहा:
“ये बयान संदेह से परे नहीं हैं और ट्रायल कोर्ट के समक्ष विपक्षी संख्या 2 द्वारा इन मौद्रिक हस्तांतरणों से संबंधित परिस्थितियों को संतोषजनक ढंग से स्पष्ट नहीं किया गया है।”
हाईकोर्ट ने माना कि ट्रायल कोर्ट इस महत्वपूर्ण पहलू पर गंभीरता से विचार करने में विफल रहा। कोर्ट ने टिप्पणी की:
“विपक्षी संख्या 2 द्वारा किसी तीसरे व्यक्ति से नियमित रूप से और बिना किसी स्पष्टीकरण के पैसे प्राप्त करना एक प्रासंगिक परिस्थिति थी, जिस पर ट्रायल कोर्ट को धारा 125(4) सीआरपीसी के तहत याचिकाकर्ता की दलील पर विचार करते समय उचित ध्यान देना चाहिए था।”
जहां तक पति द्वारा एडल्ट्री के सबूत के तौर पर पेश की गई तस्वीरों का सवाल है, हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि यद्यपि ट्रायल कोर्ट द्वारा तस्वीरों को खारिज करने का आधार (चेहरा साफ न दिखना) कानूनी रूप से सही नहीं था, फिर भी वे तस्वीरें सबूत के तौर पर स्वीकार्य नहीं थीं क्योंकि उन्हें कानून के अनुसार अदालत में साबित नहीं किया गया था।
इसके साथ ही, हाईकोर्ट ने ए.जी.ए. की इस दलील से सहमति जताई कि पति की आय कम होने के दावे के समर्थन में कोई पुख्ता दस्तावेजी प्रमाण नहीं है। हालांकि, नाबालिग बेटे के संबंध में कोर्ट ने माना कि उसे मिलने वाले भरण-पोषण पर पति को कोई आपत्ति नहीं है और वह कानूनी रूप से पूरी तरह सही है।
कोर्ट का फैसला
इन निष्कर्षों के आधार पर हाईकोर्ट ने माना कि पत्नी अपने पति से मेंटेनेंस प्राप्त करने की हकदार नहीं है। कोर्ट ने ट्रायल कोर्ट के उस आदेश को रद्द कर दिया जिसके तहत पत्नी को मेंटेनेंस देने का निर्देश दिया गया था। हालांकि, नाबालिग बेटे को 10,000 रुपये प्रति माह देने के निर्देश को बरकरार रखा गया। इस प्रकार, हाईकोर्ट ने क्रिमिनल रिवीजन याचिका को आंशिक रूप से स्वीकार कर लिया।
मामले का विवरण
मामले का शीर्षक: देवेंद्र सारस्वत बनाम उत्तर प्रदेश राज्य और 2 अन्य
वाद संख्या: क्रिमिनल रिवीजन संख्या 408/2025
पीठ: जस्टिस लक्ष्मी कांत शुक्ला
निर्णय की तिथि: 6 जुलाई, 2026

