उत्तर प्रदेश में ग्राम पंचायतों का कार्यकाल समाप्त होने के बाद पूर्व ग्राम प्रधानों को ही प्रशासक नियुक्त किए जाने की नीति पर इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कड़ा रुख अपनाया है। हाईकोर्ट की लखनऊ बेंच ने इस नीति की संवैधानिक वैधता पर गंभीर सवाल उठाते हुए पंचायती राज विभाग के अपर मुख्य सचिव को 10 जुलाई को वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिए कोर्ट में पेश होने का निर्देश दिया है। कोर्ट ने राज्य सरकार से पूछा है कि इस व्यवस्था को जारी रखने का उनके पास क्या कानूनी और संवैधानिक आधार है।
यह निर्देश जस्टिस राजन रॉय और जस्टिस मंजीव शुक्ला की खंडपीठ ने संजय कुमार शर्मा द्वारा दायर एक जनहित याचिका पर सुनवाई के दौरान दिया। इस याचिका में उत्तर प्रदेश पंचायती राज अधिनियम की धारा 12(3ए) को चुनौती दी गई है, जिसके तहत कार्यकाल समाप्त होने के बाद भी पूर्व प्रधानों को प्रशासक के रूप में नियुक्त करने का प्रावधान है।
उठे गंभीर संवैधानिक सवाल
मामले की सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने इस बात की जांच करने की आवश्यकता बताई कि क्या किसी निवर्तमान ग्राम प्रधान को प्रशासक नियुक्त करना, वास्तव में उनके निर्वाचित कार्यकाल को पिछले दरवाजे से बढ़ाने जैसा है। कोर्ट इस पहलू पर भी विचार कर रहा है कि क्या सरकार का यह कदम तय समय पर पंचायत चुनाव कराने के राज्य चुनाव आयोग के संवैधानिक अधिकारों में हस्तक्षेप करता है।
साल 2000 के अदालती फैसले का हवाला
हाईकोर्ट ने सुनवाई के दौरान वर्ष 2000 के ‘प्रेम लाल पटेल बनाम उत्तर प्रदेश राज्य’ मामले का भी उल्लेख किया। उस समय हाईकोर्ट की एक समकक्ष पीठ ने ऐसे ही एक कानूनी प्रावधान को असंवैधानिक घोषित कर दिया था। कोर्ट ने माना था कि यह व्यवस्था संविधान के अनुच्छेद 243ई और 243के के खिलाफ है और पंचायतों के तय कार्यकाल व राज्य चुनाव आयोग की स्वतंत्र शक्तियों से मेल नहीं खाती।
हालांकि, बाद में इस फैसले के खिलाफ की गई अपील पर सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने मामले का निपटारा तो कर दिया था, लेकिन कानून से जुड़े इस बुनियादी संवैधानिक सवाल को भविष्य में किसी उपयुक्त मामले में तय करने के लिए खुला छोड़ दिया था।
एक साथ होगी सभी याचिकाओं की सुनवाई
इन मुद्दों की गंभीरता को देखते हुए, हाईकोर्ट ने निर्देश दिया है कि इस जनहित याचिका को इसी विषय पर दायर अन्य लंबित याचिकाओं के साथ सूचीबद्ध किया जाए ताकि सभी पर एक साथ सुनवाई हो सके।

