मद्रास हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया है कि किसी कंपनी के बंद होने (वाइंडिंग अप या लिक्विडेशन) से उसके निर्देशकों या प्राकृतिक व्यक्तियों की व्यक्तिगत आपराधिक देनदारी समाप्त नहीं होती है। जस्टिस जी.के. इलान्तिरायन ने सिनर्जी फाइनेंशियल एक्सचेंज लिमिटेड (SFEL) के निर्देशकों द्वारा दायर आपराधिक याचिकाओं को खारिज करते हुए कहा कि भले ही कॉर्पोरेट इकाई भंग हो चुकी हो, लेकिन धोखाधड़ी और हेराफेरी के जिम्मेदार व्यक्ति कानून के शिकंजे से नहीं बच सकते। हाईकोर्ट ने कंपनी के संस्थापक एस. वेंकटरमण और उनके सहयोगी पी. राजरथिनम की उन याचिकाओं को खारिज कर दिया, जिसमें उन्होंने केंद्रीय जांच ब्यूरो (CBI) द्वारा दर्ज 21 साल पुराने धोखाधड़ी के मामले को रद्द करने की मांग की थी।
मामले की पृष्ठभूमि
यह मामला साल 1999 में चेन्नई की सेंट्रल क्राइम ब्रांच में दर्ज आपराधिक शिकायतों से जुड़ा है। एक शिकायतकर्ता की वर्ष 1997-1998 के दौरान सिनर्जी फाइनेंशियल एक्सचेंज लिमिटेड (SFEL) में 30 लाख रुपये की फिक्स्ड डिपॉजिट राशि परिपक्व (mature) हुई थी, जिसके भुगतान के लिए कंपनी द्वारा जारी पोस्ट-डेटेड चेक बाउंस हो गए थे। शिकायतकर्ता का आरोप था कि कंपनी और उसके निदेशक पुनर्भुगतान को लेकर टालमटोल कर रहे थे। एक अन्य मामले में, पी.एस.बी. राजन और उनके परिवार ने आकर्षक विज्ञापनों से प्रभावित होकर कंपनी की फिक्स्ड डिपॉजिट योजनाओं में 9.25 लाख रुपये का निवेश किया था, जिसे कंपनी वापस करने में विफल रही।
जमाकर्ताओं रघुरामन और सीता द्वारा दायर वाइंडिंग-अप याचिका (CP.No.322 of 1999) पर सुनवाई करते हुए हाईकोर्ट ने कंपनी को बंद करने का आदेश दिया था और पुलिस को मामला दर्ज कर जांच शुरू करने का निर्देश दिया था। इसके बाद, केंद्रीय जांच ब्यूरो (CBI) की आर्थिक अपराध शाखा (EOW), चेन्नई ने 19 दिसंबर 2001 को मामले दर्ज किए।
जांच पूरी होने के बाद, CBI ने 14 मई 2004 को नौ आरोपियों के खिलाफ संयुक्त चार्जशीट दायर की। इसमें एस. वेंकटरमण को पहला आरोपी (A1) बनाया गया, जबकि पी. राजरथिनम (A5) को भगोड़ा घोषित किया गया था और उसके खिलाफ रेड कॉर्नर नोटिस जारी किया गया था। राजरथिनम का मामला बाद में मुख्य केस से अलग कर दिया गया था।
पक्षों की दलीलें
याचिकाकर्ता एस. वेंकटरमण (A1) के वकील ने दलील दी कि CBI की अंतिम रिपोर्ट में मुख्य कंपनी (SFEL) को आरोपी नहीं बनाया गया है। उन्होंने तर्क दिया कि भारतीय दंड संहिता (IPC) के तहत बिना कंपनी को मुख्य आरोपी बनाए, निर्देशकों पर प्रतिनिधि दायित्व (vicarious liability) के तहत मुकदमा नहीं चलाया जा सकता। अपनी दलीलों के समर्थन में उन्होंने सुप्रीम कोर्ट के एस.के. अलघ बनाम उत्तर प्रदेश राज्य (2008) और मद्रास हाईकोर्ट के बी. जगदीशन बनाम पुलिस उपाधीक्षक, Namakkal (2011) के फैसलों का हवाला दिया, जिसमें यह माना गया था कि स्पष्ट दंडात्मक प्रावधानों के अभाव में निर्देशकों पर आईपीसी अपराधों के लिए प्रतिनिधि दायित्व नहीं डाला जा सकता।
वहीं, दूसरे याचिकाकर्ता पी. राजरथिनम (A5) का तर्क था कि उनकी फर्म ‘एम/एस पी. राजरथिनम एसोसिएट्स’ ने 26 फरवरी 1999 को कंपनी के अधिग्रहण के लिए एक समझौता ज्ञापन (MoU) किया था, लेकिन वह खुद इस समझौते के व्यक्तिगत हस्ताक्षरकर्ता नहीं थे, इसलिए उन पर इसकी कोई देनदारी नहीं डाली जा सकती।
CBI के विशेष लोक अभियोजक बी. मोहन ने इन याचिकाओं का कड़ा विरोध किया। उन्होंने कहा कि आरोपी पूर्णकालिक निदेशक और अधिकृत हस्ताक्षरकर्ता थे, जिन्होंने 18% से 24% वार्षिक ब्याज का लालच देकर जनता से 14.73 करोड़ रुपये जुटाए। CBI का आरोप था कि आरोपियों ने एक डमी कंपनी (9वां आरोपी) बनाई और जमाकर्ताओं के पैसे को अपने निजी खातों और उस डमी कंपनी में ट्रांसफर कर दिया, जिससे वित्तीय संकट पैदा हो गया।
पी. राजरथिनम के संबंध में अभियोजन पक्ष ने विस्तार से बताया कि अधिग्रहण समझौते के तहत उनकी फर्म ने निवेशकों के हितों की पूरी रक्षा करने का वादा किया था। इसके बजाय, राजरथिनम ने कंपनी के देनदारों से 23.04 लाख रुपये की वसूली की और उसे कंपनी के खाते में जमा करने के बजाय अपने व्यक्तिगत उपयोग के लिए अपनी सहयोगी कंपनियों में ट्रांसफर कर दिया। CBI ने यह भी रेखांकित किया कि राजरथिनम वर्षों से इंग्लैंड में छिपा हुआ था और उसके खिलाफ गैर-जमानती वारंट और रेड कॉर्नर नोटिस अब भी सक्रिय हैं।
हाईकोर्ट का विश्लेषण
कंपनी को आरोपी न बनाए जाने की वेंकटरमण की दलील पर हाईकोर्ट ने कहा कि कंपनी पहले ही बंद हो चुकी है और उसकी संपत्तियां ऑफिशियल लिक्विडेटर के पास हैं।
जस्टिस इलान्तिरायन ने सुप्रीम कोर्ट की तीन जजों की पीठ द्वारा अजय कुमार राधेश्याम गोयनका बनाम टूरिज्म फाइनेंस कॉर्पोरेशन ऑफ इंडिया लिमिटेड (2023) मामले में दिए गए फैसले का हवाला दिया, जिसमें कॉर्पोरेट विघटन के बाद प्राकृतिक व्यक्तियों की आपराधिक देनदारी पर विचार किया गया था। हाईकोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट की इस टिप्पणी को रेखांकित किया:
“जो बंद हुआ है वह केवल कंपनी है, आरोपियों की व्यक्तिगत आपराधिक देनदारी नहीं…”
हाईकोर्ट ने कहा कि जब कंपनी के विघटन के कारण मुकदमा चलाना असंभव हो जाता है, तो कानून का प्रसिद्ध लैटिन सिद्धांत ‘लेक्स नॉन कोजिट एड इमपॉसिबिलिया’ लागू होता है। सुप्रीम कोर्ट के हवाले से हाईकोर्ट ने टिप्पणी की:
“ऐसी स्थिति में लैटिन कहावत ‘लेक्स नॉन कोजिट एड इमपॉसिबिलिया’ लागू होती है, जिसका अर्थ है कि कानून किसी व्यक्ति को ऐसा काम करने के लिए मजबूर नहीं करता जो वह संभवतः नहीं कर सकता।”
इसके अलावा, हाईकोर्ट ने पाया कि वेंकटरमण पर केवल इसलिए मुकदमा नहीं चलाया जा रहा है क्योंकि वह निदेशक थे, बल्कि इसलिए चलाया जा रहा है क्योंकि साजिश और धोखाधड़ी में उनकी सक्रिय और व्यक्तिगत भूमिका थी। हाईकोर्ट ने कहा:
“इसलिए, भले ही कंपनी को आरोपी नहीं बनाया गया है क्योंकि वह पहले ही बंद हो चुकी है, फिर भी याचिकाकर्ता और अन्य निर्देशकों पर उनकी व्यक्तिगत क्षमता में इन अपराधों के लिए मुकदमा चलाया जा सकता है।”
पी. राजरथिनम (A5) के संबंध में कोर्ट ने पाया कि वर्ष 2005 में डिवीजन बेंच ने इस शर्त पर उनके गिरफ्तारी वारंट पर रोक लगाई थी कि वह जांच एजेंसियों और निचली अदालत के सामने पेश होंगे, लेकिन वे पेश नहीं हुए। कोर्ट ने माना कि सक्रिय गैर-जमानती वारंट और रेड कॉर्नर नोटिस के चलते वह भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) की धारा 528 के तहत किसी राहत के हकदार नहीं हैं।
हाईकोर्ट ने धारा 482 (CrPC) के तहत अपनी शक्तियों की सीमाओं का उल्लेख करते हुए सुप्रीम कोर्ट के तीन प्रमुख फैसलों का संदर्भ दिया:
- देवेंद्र प्रसाद सिंह बनाम बिहार राज्य (2019) – जिसमें यह स्पष्ट किया गया कि हाईकोर्ट याचिका खारिज करने के चरण में गवाहों के बयानों का मूल्यांकन नहीं कर सकता।
- केंद्रीय जांच ब्यूरो बनाम अरविंद खन्ना (2019) – जिसमें स्पष्ट किया गया कि हाईकोर्ट विवादित तथ्यों पर निर्णय नहीं दे सकता, जिनका परीक्षण मुकदमे के दौरान होना चाहिए।
- एम. जयंती बनाम के.आर. मीनाक्षी (2019) – जिसमें यह कहा गया कि कोर्ट को केवल यह देखना चाहिए कि क्या शिकायत में लगाए गए आरोप संबंधित अपराध के आवश्यक तत्वों को पूरा करते हैं या नहीं।
कोर्ट का निर्णय
दोनों याचिकाकर्ताओं के खिलाफ व्यक्तिगत क्षमता में प्रथम दृष्टया (prima facie) मजबूत मामला पाते हुए हाईकोर्ट ने आपराधिक कार्यवाही को रद्द करने का कोई आधार नहीं माना। जस्टिस इलान्तिरायन ने दोनों याचिकाएं खारिज कर दीं और निचली अदालत में ट्रायल का रास्ता साफ कर दिया।
मामले का विवरण
मामले का शीर्षक: एस. वेंकटरमण बनाम एडिशनल सुपरिंटेंडेंट ऑफ पुलिस
वाद संख्या: क्रिमिनल ओरिजिनल पिटीशन संख्या 8077 ऑफ 2025 एवं 1190 ऑफ 2026
पीठ: जस्टिस जी.के. इलान्तिरायन
निर्णय की तिथि: 01.07.2026

