हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट ने अपने एक महत्वपूर्ण फैसले में कहा है कि अपराध चाहे कितना भी गंभीर क्यों न हो, किसी भी विचाराधीन कैदी को अनिश्चितकाल तक सलाखों के पीछे नहीं रखा जा सकता। जस्टिस संदीप शर्मा की एकल पीठ ने उस व्यक्ति को जमानत दे दी है, जिस पर अपनी गर्भवती पत्नी की हत्या करने वाले सेना के जवान भतीजे को फरार होने में मदद करने का आरोप है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि त्वरित सुनवाई (स्पीड ट्रायल) का अधिकार संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत हर नागरिक का मौलिक अधिकार है और राज्य मशीनरी की कमियों के कारण किसी की व्यक्तिगत स्वतंत्रता को बाधित नहीं किया जा सकता।
हाईकोर्ट ने याचिकाकर्ता को 2 लाख रुपये के निजी मुचलके और इतनी ही राशि की दो स्थानीय जमानतें पेश करने पर रिहा करने का आदेश दिया। याचिकाकर्ता 25 सितंबर 2025 से न्यायिक हिरासत में है। सुनवाई के दौरान जस्टिस संदीप शर्मा ने मानवीय दृष्टिकोण अपनाते हुए टिप्पणी की, “अपराधी जन्मजात नहीं होते, बल्कि परिस्थितियों के कारण बनते हैं। हर मनुष्य के भीतर अच्छाई की संभावना होती है, इसलिए किसी भी अपराधी को पूरी तरह से सुधार की उम्मीद से बाहर नहीं मानना चाहिए। अक्सर यह भूल जाते हैं कि हर संत का एक अतीत होता है और हर पापी का एक भविष्य होता है।”
साजिश का कोई सबूत नहीं
अभियोजन पक्ष का आरोप था कि याचिकाकर्ता ने अपने 24 वर्षीय भतीजे की पत्नी की हत्या की बात जानने के बाद उसे पुलिस के हवाले करने के बजाय पठानकोट छोड़ने में मदद की, ताकि वह जम्मू में अपनी सैन्य यूनिट में वापस जा सके। हालांकि, हाईकोर्ट ने पाया कि याचिकाकर्ता को हत्या की किसी भी पूर्व योजना की जानकारी होने का कोई सबूत नहीं है। कोर्ट ने कहा कि केवल विवाह का विरोध करना किसी आपराधिक साजिश में शामिल होने का आधार नहीं बन सकता। यदि आरोपी ने घटना के बाद पुलिस को सूचना नहीं भी दी, तो भी इसे हत्या की पूर्व साजिश या अपराध के लिए उकसाने का प्रमाण नहीं माना जा सकता।
विवाह और गर्भधारण को लेकर था विवाद
यह मामला एक गुप्त विवाह से जुड़ा है जो मृतका और मुख्य आरोपी भतीजे के बीच हुआ था। जब महिला के परिवार को शादी और उसकी गर्भावस्था का पता चला, तो उन्होंने 24 सितंबर 2025 को रीति-रिवाजों के अनुसार विवाह संपन्न कराने और विदाई की तैयारी की थी। लेकिन 23 सितंबर 2025 को महिला संदिग्ध परिस्थितियों में लापता हो गई। बाद में ऊना जिले के बरिया के पास एक जंगल में वन रक्षक को उसकी आधी जली हुई लाश मिली। जांच में सामने आया कि गर्भावस्था और आर्थिक तंगहाली को लेकर पति-पत्नी के बीच विवाद हुआ था, जिसके बाद यह हत्या की गई। मृतका की मां ने शुरुआत में दोनों पर हत्या का आरोप लगाया था, लेकिन बाद में अभियोजन की जांच में पाया गया कि हत्या केवल पति ने ही की थी।
त्वरित सुनवाई के अभाव में जमानत का विरोध अनुचित
जमानत याचिका मंजूर करते हुए हाईकोर्ट ने चिंता जताई कि इस मामले में अभियोजन पक्ष ने 53 गवाहों की सूची तैयार की है, लेकिन अब तक एक भी गवाह का बयान दर्ज नहीं हुआ है। इससे साफ है कि मुकदमे की सुनवाई पूरी होने में काफी समय लगेगा। जस्टिस शर्मा ने कहा कि यदि राज्य या उसकी जांच एजेंसियों के पास आरोपी को त्वरित सुनवाई का अधिकार प्रदान करने के साधन नहीं हैं, तो केवल अपराध की गंभीरता का हवाला देकर जमानत का विरोध नहीं किया जा सकता। उन्होंने कहा कि मुकदमे के दौरान किसी को लंबे समय तक जेल में रखना सजा पूर्व दोषसिद्धि (प्री-ट्रायल कन्विक्शन) जैसा है, जो सीधे तौर पर संविधान के अनुच्छेद 21 का उल्लंघन है।

