सुप्रीम कोर्ट का केंद्र को निर्देश: नए विमानन नियमों को दो हफ्ते में सीलबंद लिफाफे में करें पेश

सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को केंद्र सरकार को निर्देश दिया कि वह भारतीय वायुयान अधिनियम, 2024 के तहत तैयार किए गए नए नियमों को दो हफ्तों के भीतर एक सीलबंद लिफाफे में अदालत के समक्ष पेश करे। जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की पीठ ने साफ किया कि इन नियमों को अदालत में पेश किया जाए, चाहे इन्हें अभी तक संसद के दोनों सदनों के सामने रखा गया हो या नहीं।

हवाई किराये में उतार-चढ़ाव पर कोर्ट सख्त

यह आदेश सामाजिक कार्यकर्ता एस. लक्ष्मीनारायणन द्वारा दायर एक जनहित याचिका पर सुनवाई के दौरान आया है। याचिका में देश के नागरिक विमानन क्षेत्र में पारदर्शिता और यात्री हितों की रक्षा के लिए एक मजबूत और स्वतंत्र रेगुलेटर के गठन की मांग की गई है। इसके साथ ही, याचिका में निजी एयरलाइनों द्वारा हवाई किराये और अन्य शुल्कों में की जाने वाली मनमानी बढ़ोतरी को नियंत्रित करने के लिए जरूरी दिशा-निर्देश तय करने की अपील की गई है। सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले की अगली सुनवाई के लिए 3 अगस्त की तारीख तय की है।

अनुवाद की प्रक्रिया में हैं नए नियम

सुनवाई के दौरान केंद्र सरकार के वकील ने अदालत को सूचित किया कि नए नियमों का ड्राफ्ट तैयार हो चुका है और फिलहाल इनका अनुवाद किया जा रहा है, जिसके बाद इन्हें संसद के समक्ष रखा जाएगा। वहीं, याचिकाकर्ता की ओर से पेश वरिष्ठ वकील रवींद्र श्रीवास्तव ने दलील दी कि जब तक नए नियम प्रभावी नहीं हो जाते, तब तक पुराने नियम ही लागू रहेंगे। उन्होंने जोर देकर कहा कि किराये में बेतहाशा बढ़ोतरी पर रोक लगाने के लिए एक स्वतंत्र और प्रभावी रेगुलेटरी सिस्टम का होना बेहद जरूरी है।

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पिछली सुनवाइयों में भी कोर्ट ने जताई थी चिंता

यह पहली बार नहीं है जब कोर्ट ने इस मुद्दे पर चिंता जताई है। इससे पहले 15 मई को हुई सुनवाई में सुप्रीम कोर्ट ने हवाई किरायों को तर्कसंगत बनाने और यात्रियों को राहत देने की बात कही थी। तब केंद्र की ओर से पेश सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने अदालत को बताया था कि नया कानून जनवरी 2025 में लागू हो चुका है और इसके तहत नियम बनाने की प्रक्रिया चल रही है।

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इससे पहले, पिछले साल 17 नवंबर को सुप्रीम कोर्ट ने लक्ष्मीनारायणन की याचिका पर केंद्र सरकार और अन्य पक्षों को नोटिस जारी कर जवाब मांगा था। इसके बाद 23 फरवरी को केंद्र ने अदालत को बताया था कि नागरिक विमानन मंत्रालय इस मामले पर सक्रियता से विचार कर रहा है।

जनवरी में सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने त्योहारों के मौसम में हवाई किरायों में होने वाली बेतहाशा बढ़ोतरी को “शोषण” करार दिया था और कहा था कि वह इस तरह के अनियंत्रित उतार-चढ़ाव के खिलाफ हस्तक्षेप करेगा। इसके बाद अदालत ने केंद्र सरकार और नागरिक विमानन महानिदेशालय (DGCA) से जवाब दाखिल करने को कहा था।

यात्रियों की शिकायतें और रेगुलेटरी सिस्टम की खामियां

याचिका में निजी एयरलाइंस द्वारा अपनाए गए कई विवादित फैसलों पर भी सवाल उठाए गए हैं। याचिकाकर्ता के अनुसार, निजी एयरलाइनों ने बिना किसी ठोस आधार के इकोनॉमी क्लास के यात्रियों के लिए मुफ्त चेक-इन सामान की सीमा को 25 किलोग्राम से घटाकर 15 किलोग्राम कर दिया है। याचिका में आरोप लगाया गया है कि यह कटौती यात्रियों की जेब पर अतिरिक्त बोझ डालने और मुनाफा कमाने का एक नया जरिया है।

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इसके अतिरिक्त, केवल एक बैग चेक-इन करने की अनिवार्यता और बिना चेक-इन सामान के यात्रा करने वाले यात्रियों को किसी भी तरह की छूट या मुआवजा न मिलने को भेदभावपूर्ण बताया गया है।

याचिका में दावा किया गया है कि वर्तमान में देश में ऐसी कोई अथॉरिटी सक्रिय नहीं है जिसके पास हवाई किरायों या सहायक शुल्कों की समीक्षा करने या उन पर अधिकतम सीमा तय करने की शक्ति हो। इसी ढिलाई का फायदा उठाकर एयरलाइंस त्योहारों या खराब मौसम के दौरान डायनामिक प्राइसिंग एल्गोरिदम और हिडन चार्ज के जरिए यात्रियों का शोषण करती हैं। याचिकाकर्ता का कहना है कि सरकार की इस निष्क्रियता के कारण नागरिकों के समानता, देश में कहीं भी आने-जाने और सम्मान के साथ जीने के मौलिक अधिकारों का हनन हो रहा है, जिसके लिए न्यायपालिका का तत्काल हस्तक्षेप आवश्यक है।

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