पटना हाईकोर्ट ने यौन उत्पीड़न के आरोपी किशोर को दी जमानत, कहा- बच्चों को सजा देना समाज के लिए आत्मघाती

पटना हाईकोर्ट ने यौन उत्पीड़न के आरोपी एक किशोर को जमानत दे दी है। कोर्ट ने अपने फैसले में साफ किया कि हमारी न्याय प्रणाली का उद्देश्य बच्चों को सजा देना नहीं, बल्कि कानून से संघर्ष कर रहे नाबालिगों के जीवन में सुधार करना और उन्हें समाज की मुख्यधारा में वापस लाना होना चाहिए।

बीते 7 जुलाई को जारी अपने आदेश में जस्टिस जितेंद्र कुमार ने बच्चों की अदालत (चिल्ड्रन्स कोर्ट) के उस फैसले को खारिज कर दिया, जिसमें आरोपी किशोर को जमानत देने से मना कर दिया गया था। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि किशोर न्याय अधिनियम (जेजे एक्ट) का आधार ही सुधार और पुनर्वास है। ऐसे में बच्चों के प्रति कठोर रवैया अपनाना समाज के लिए नुकसानदेह साबित होगा।

अदालत ने पाया कि आरोपी किशोर एक बेहद गरीब परिवार से संबंध रखता है और उसने केवल आठवीं कक्षा तक पढ़ाई की है। वह अगस्त 2025 से बाल सुधार गृह (ऑब्जर्वेशन होम) में बंद था। सुनवाई के दौरान कोर्ट ने इस बात को भी रेखांकित किया कि आरोपी का कोई आपराधिक इतिहास नहीं रहा है और न ही वह पहले कभी किसी असामाजिक गतिविधि में शामिल रहा है।

जमानत का अनिवार्य कानूनी अधिकार

हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि किशोर न्याय अधिनियम, 2015 की धारा 12 के तहत जमानत देने का एक अनिवार्य कानूनी अनुमान निहित है। यह नियम उन मामलों में भी समान रूप से लागू होता है जहाँ आरोपी की उम्र 16 वर्ष या उससे अधिक हो और उस पर गंभीर या जघन्य अपराधों के आरोप हों। कोर्ट ने कहा कि आरोपी की उम्र या कथित अपराध की गंभीरता किसी भी नाबालिग की जमानत याचिका खारिज करने का कानूनी आधार नहीं बन सकती।

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जस्टिस कुमार ने अपने आदेश में कहा कि किसी बच्चे को सुधार गृह में रखना केवल तभी सही ठहराया जा सकता है जब यह सीधे तौर पर उसके विकास, संरक्षण या पुनर्वास के लिए जरूरी हो। उन्होंने परिवार को बच्चे की देखभाल और सुधार का सबसे पहला और सर्वोत्तम माध्यम बताया। कोर्ट का कहना था कि हर बच्चे को जल्द से जल्द अपने परिवार से दोबारा मिलने का अधिकार है और उसे किसी संस्थान में रखना केवल अंतिम विकल्प होना चाहिए।

आपसी रिश्ते को लेकर दोनों पक्षों के अलग-अलग दावे

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यह पूरा कानूनी मामला अलग जाति की एक नाबालिग लड़की के यौन उत्पीड़न के आरोपों से जुड़ा है। अभियोजन पक्ष का दावा था कि लड़की की मां ने आरोपी लड़के को अपनी बेटी के कमरे में रंगे हाथ पकड़ा था, जिसके बाद लड़के ने शादी करने से इनकार कर दिया। विशेष लोक अभियोजक उषा कुमारी ने निचली अदालत के आदेश का बचाव करते हुए तर्क दिया कि जमानत नामंजूर करने के फैसले में कोई कानूनी खामी नहीं थी।

दूसरी तरफ, बचाव पक्ष ने आरोपों को निराधार बताते हुए अलग कहानी पेश की। किशोर का प्रतिनिधित्व कर रहे अधिवक्ता प्रमोद कुमार यादव ने दलील दी कि दोनों नाबालिग आपस में प्रेम संबंध में थे और लगातार एक-दूसरे के संपर्क में थे। उनके अनुसार, लड़की के परिजन लड़के पर शादी का दबाव बना रहे थे और जब उसने इससे मना कर दिया, तो उस पर मुकदमा दर्ज करा दिया गया।

बचाव पक्ष ने कोर्ट का ध्यान इस ओर भी दिलाया कि कथित पीड़िता और उसकी मां, दोनों ने ही किसी भी तरह की मेडिकल जांच कराने से साफ इनकार कर दिया था। अधिवक्ता का कहना था कि पूरा मामला सिर्फ लड़की के बयानों पर आधारित है, जो किशोर को लंबे समय तक हिरासत में रखने के लिए काफी नहीं है।

पुनर्वास के लिए जिलाधिकारी को निर्देश

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किशोर के पुनर्वास और उसे समाज की मुख्यधारा से जोड़ने के लिए हाईकोर्ट ने स्थानीय जिलाधिकारी को एक अहम जिम्मेदारी दी है। कोर्ट ने जिलाधिकारी को निर्देश दिया है कि वे उन सरकारी कल्याणकारी योजनाओं की पहचान करें जिनके माध्यम से आरोपी किशोर और उसके परिवार को जरूरी सहायता और संरक्षण दिया जा सके।

हाईकोर्ट ने अपने आदेश के अंत में किशोर न्याय बोर्ड और अदालतों से बच्चों से जुड़े मामलों में अधिक संवेदनशील और जिम्मेदार रुख अपनाने की अपील की। कोर्ट के अनुसार, इन संस्थाओं का प्राथमिक उद्देश्य युवाओं का मार्गदर्शन करना और उन्हें समाज का एक जिम्मेदार नागरिक बनाना होना चाहिए।

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