कामकाजी पत्नी की आय गुजारा भत्ता खारिज करने का आधार नहीं; गुजारा भत्ता केवल जीवित रहने के लिए नहीं बल्कि सम्मानजनक जीवन के लिए: झारखंड हाईकोर्ट

झारखंड हाईकोर्ट ने एक पति द्वारा दायर प्रथम अपील को खारिज करते हुए फैमिली कोर्ट के उस डिक्री को बरकरार रखा है, जिसमें क्रूरता के आधार पर विवाह विच्छेद (तलाक) और गुजारा भत्ता देने का आदेश दिया गया था। जस्टिस सुजित नारायण प्रसाद और जस्टिस संजय प्रसाद की खंडपीठ ने स्पष्ट किया कि पति का अपनी भाभी के साथ अवैध संबंध और पत्नी के साथ शारीरिक मारपीट करना गंभीर वैवाहिक क्रूरता की श्रेणी में आता है। हाईकोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि पत्नी का कामकाजी होना या उसकी स्वतंत्र आय होना उसे स्थायी गुजारा भत्ता (Alimony) प्राप्त करने से वंचित नहीं करता है।

यह अपील धनबाद के प्रिंसिपल जज, फैमिली कोर्ट द्वारा पारित आदेश और डिक्री के खिलाफ दायर की गई थी। निचली अदालत ने हिंदू विवाह अधिनियम, 1955 की धारा 13(1)(i-a) के तहत पत्नी की याचिका को स्वीकार करते हुए विवाह विच्छेद का आदेश दिया था और पति को 6 लाख रुपये गुजारा भत्ता देने का निर्देश दिया था। हाईकोर्ट ने साक्ष्यों और पक्षों की वित्तीय स्थिति का मूल्यांकन करने के बाद निचली अदालत के फैसले को सही पाया और इसमें हस्तक्षेप करने से इनकार कर दिया।

मामले की पृष्ठभूमि

दोनों पक्षों का विवाह अप्रैल 2021 में हिंदू रीति-रिवाजों के अनुसार हुआ था। पत्नी के साक्ष्यों के अनुसार, शादी के महज एक हफ्ते बाद ही उसे दहेज, विशेषकर चार पहिया वाहन की मांग को लेकर शारीरिक और मानसिक रूप से प्रताड़ित किया जाने लगा।

मामले का मुख्य पहलू पत्नी का वह आरोप था जिसमें उसने पति को उसकी भाभी के साथ आपत्तिजनक स्थिति में देखने का दावा किया था। पत्नी का कहना था कि जब उसने इस अवैध संबंध का विरोध किया, तो उसे कमरे में बंद कर दिया गया और उसके साथ मारपीट की गई। पत्नी ने यह भी आरोप लगाया कि एक पूर्व आपराधिक मामले में समझौते के बाद भी पति ने प्रताड़ना जारी रखी, जिसके कारण मारपीट की वजह से उसका गर्भपात हो गया। अंततः मई 2024 में उसे ससुराल से निकाल दिया गया।

दूसरी ओर, पति ने इन सभी आरोपों से इनकार करते हुए दावा किया कि यह प्रेम विवाह था और इसमें कोई दहेज नहीं लिया गया था। उसका तर्क था कि पत्नी उस पर अपने परिवार से संबंध तोड़ने का दबाव बनाती थी और उसने उसकी जानकारी के बिना गर्भपात कराया।

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पक्षों के तर्क

अपीलकर्ता पति ने तर्क दिया कि क्रूरता के आरोप निराधार हैं और उनके समर्थन में कोई ठोस सबूत नहीं है। उसने यह भी तर्क दिया कि चूंकि पत्नी एक निजी स्कूल में शिक्षिका है और उसकी अपनी आय है, इसलिए 6 लाख रुपये का गुजारा भत्ता अनुचित है। पति का यह भी कहना था कि अदालत ने हिंदू विवाह अधिनियम की धारा 23(2) के तहत सुलह की संभावनाओं पर विचार नहीं किया।

प्रतिवादी पत्नी ने अपने साक्ष्यों को दोहराते हुए कहा कि शारीरिक हिंसा और पति के अवैध संबंधों के कारण उनके बीच साथ रहना असंभव हो गया है। सुनवाई के दौरान अदालत को यह भी सूचित किया गया कि अपील की समय सीमा समाप्त होने के बाद पत्नी ने दूसरा विवाह कर लिया है और वह वर्तमान में गर्भवती है।

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हाईकोर्ट का विश्लेषण और टिप्पणियाँ

क्रूरता के संबंध में

हाईकोर्ट ने क्रूरता की परिभाषा पर विचार करते हुए डॉ. एन.जी. दस्तने बनाम श्रीमती एस. दस्तने (1975) और जयदीप मजूमदार बनाम भारती जायसवाल मजूमदार (2021) जैसे मामलों का संदर्भ दिया। कोर्ट ने कहा कि क्रूरता का अर्थ ऐसा आचरण है जो जीवनसाथी के लिए साथ रहना असुरक्षित या अनुचित बना दे।

हाईकोर्ट ने अवलोकन किया:

“पत्नी की गवाही सुसंगत और विस्तृत है, जिसमें क्रूरता, कैद और मारपीट की विशिष्ट घटनाओं का वर्णन किया गया है। अवैध संबंधों, शारीरिक हिंसा और मारपीट के कारण गर्भपात होने के आरोप गंभीर प्रकृति के हैं।”

अदालत ने पाया कि पति इन गवाहियों को झुठलाने के लिए कोई ठोस सबूत पेश नहीं कर सका।

गुजारा भत्ता और पत्नी की आय पर

कामकाजी पत्नी को गुजारा भत्ता देने के पति के विरोध पर हाईकोर्ट ने हिंदू विवाह अधिनियम की धारा 25 और शैलजा बनाम खोबन्ना (2018) एवं सुनीता कछवाहा बनाम अनिल कछवाहा (2014) के फैसलों का हवाला दिया।

हाईकोर्ट ने कहा:

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“कानून की यह स्थापित स्थिति है कि पत्नी द्वारा कुछ आय अर्जित करना, अपने आप में उसके भरण-पोषण के दावे को खारिज करने या कम करने का आधार नहीं हो सकता।”

हाईकोर्ट ने इस बात पर जोर दिया कि गुजारा भत्ता (Sustenance) का अर्थ केवल ‘जीवित रहना’ नहीं है, बल्कि पत्नी को उसी जीवन स्तर और सुख-सुविधाओं के साथ रहने का अधिकार है, जैसा उसे अपने ससुराल में प्राप्त था।

अंतिम निर्णय

हाईकोर्ट ने निष्कर्ष निकाला कि पति के आचरण के कारण वैवाहिक बंधन पूरी तरह टूट चुका था और फैमिली कोर्ट के आदेश में हस्तक्षेप करने का कोई कानूनी आधार नहीं है।

अदालत ने कहा:

“यह हाईकोर्ट इस विचार का है कि धनबाद के फैमिली कोर्ट द्वारा पारित फैसले में किसी हस्तक्षेप की आवश्यकता नहीं है। तदनुसार, यह अपील विफल होती है और इसे खारिज किया जाता है।”

मामले का विवरण

  • मामले का शीर्षक: राहुल कुमार बनाम दीपिका गुप्ता
  • केस संख्या: एफ.ए. संख्या 233/2025
  • पीठ: जस्टिस सुजित नारायण प्रसाद और जस्टिस संजय प्रसाद
  • दिनांक: 4 मई, 2026

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