छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने यह स्पष्ट किया है कि रियल एस्टेट (रेगुलेशन एंड डेवलपमेंट) एक्ट, 2016 (RERA) की धारा 31(1) के तहत दायर शिकायतों पर परिसीमा अधिनियम, 1963 (Limitation Act) के अनुच्छेद 137 के प्रावधान लागू नहीं होते हैं। जस्टिस बिभु दत्त गुरु की एकल पीठ ने छत्तीसगढ़ रियल एस्टेट अपीलीय न्यायाधिकरण (Tribunal) के उस आदेश को रद्द कर दिया है, जिसमें न्यायाधिकरण ने स्वतः संज्ञान (suo-moto) लेते हुए शिकायत को समय-बाधित (time-barred) बताकर खारिज कर दिया था।
मामले की पृष्ठभूमि
अपीलकर्ता, श्रीमती निधि साव (आवंटी), ने 26 मई 2012 को दुर्ग स्थित “ग्रीन अर्थ सिटी” परियोजना में एक फ्लैट खरीदने के लिए प्रतिवादी, ग्रीनअर्थ इंफ्रावेंचर्स प्राइवेट लिमिटेड (प्रमोटर) के साथ समझौता किया था। आवंटी ने बाद में रेरा (RERA) प्राधिकरण के समक्ष शिकायत दर्ज कराई, जिसमें निर्माण की गुणवत्ता खराब होने और समझौते में तय समय सीमा के भीतर फ्लैट न मिलने का आरोप लगाया गया था।
22 नवंबर 2018 को, रेरा प्राधिकरण ने शिकायत को खारिज कर दिया था लेकिन प्रमोटर को काम पूरा कर कब्जा सौंपने का निर्देश दिया था। इस आदेश के खिलाफ आवंटी ने अपीलीय न्यायाधिकरण का दरवाजा खटखटाया। हालांकि, न्यायाधिकरण ने खुद ही समय-सीमा के बिंदु पर संज्ञान लिया और 15 सितंबर 2023 को अपील यह कहते हुए खारिज कर दी कि मूल शिकायत कानूनन समय-बाधित थी।
पक्षों के तर्क
अपीलकर्ता के वकील ने तर्क दिया कि रेरा अधिनियम में शिकायतों को दर्ज करने के लिए किसी विशिष्ट परिसीमा अवधि (Limitation Period) का उल्लेख नहीं है। यह तर्क दिया गया कि परिसीमा अधिनियम केवल “अदालतों” (Courts) पर लागू होता है और इसे रेरा जैसे विशेष नियामक निकायों पर तब तक लागू नहीं किया जा सकता जब तक कि कानून में इसका स्पष्ट उल्लेख न हो। अपीलकर्ता ने सुप्रीम कोर्ट के गणेशन बनाम कमिश्नर, तमिलनाडु हिंदू रिलिजियस एंड चैरिटेबल एंडोमेंट्स बोर्ड (2019) के फैसले का सहारा लिया।
दूसरी ओर, प्रतिवादी के वकील ने न्यायाधिकरण के आदेश का समर्थन किया और तर्क दिया कि शिकायत दर्ज करने का आधार 2015 में ही बन गया था, जबकि शिकायत 2018 में दर्ज की गई थी।
हाईकोर्ट का विश्लेषण और टिप्पणियां
हाईकोर्ट ने मुख्य रूप से इस बात की जांच की कि क्या अनुच्छेद 137 के सिद्धांतों को रेरा की कार्यवाही में शामिल किया जा सकता है। अदालत ने पाया कि रेरा अधिनियम की धारा 31(1) शिकायत दर्ज करने की समय-सीमा पर पूरी तरह “मौन” है।
सुप्रीम कोर्ट के गणेशन मामले का संदर्भ देते हुए हाईकोर्ट ने कहा:
“परिसीमा अधिनियम के प्रावधान मुख्य रूप से तब आकर्षित होते हैं जब ऐसी कार्यवाही कानून की अदालत के समक्ष शुरू की जाती है, जब तक कि उनकी प्रयोज्यता किसी विशेष या स्थानीय कानून के तहत स्पष्ट रूप से विस्तारित न की गई हो।”
हाईकोर्ट ने आगे यह भी गौर किया कि रेरा एक विशेष नियामक निकाय है और यह परिसीमा अधिनियम के दायरे में आने वाली “अदालत” की श्रेणी में नहीं आता है। विधायिका की मंशा पर टिप्पणी करते हुए अदालत ने कहा:
“परिसीमा अधिनियम के जिन प्रावधानों को विधायिका ने 2016 के अधिनियम में शामिल नहीं किया है, उन्हें सादृश्य (Analogy) के आधार पर आयात नहीं किया जा सकता है… यदि विधायिका जानबूझकर किसी कानून में कुछ शामिल नहीं करती है, तो अदालत व्याख्या के नाम पर उस कमी को पूरा करने के लिए सक्षम नहीं है।”
हाईकोर्ट ने न्यायाधिकरण द्वारा अपनाई गई प्रक्रिया पर भी सवाल उठाए। अदालत ने नोट किया कि प्रमोटर ने रेरा प्राधिकरण के समक्ष समय-सीमा का कोई मुद्दा नहीं उठाया था। न्यायाधिकरण द्वारा पहली बार अपील के स्तर पर इसे आधार बनाना प्रक्रियात्मक अनियमितता है।
अदालत का निर्णय
हाईकोर्ट ने अपील स्वीकार करते हुए अपीलीय न्यायाधिकरण के 15 सितंबर 2023 के आदेश को रद्द कर दिया। अदालत ने स्पष्ट किया कि न्यायाधिकरण ने परिसीमा अधिनियम के अनुच्छेद 137 को लागू करने में गंभीर कानूनी गलती की है।
अदालत ने मामले को वापस छत्तीसगढ़ रियल एस्टेट अपीलीय न्यायाधिकरण को भेज (Remand) दिया है और निर्देश दिया है कि अपील पर गुण-दोष (merits) के आधार पर नए सिरे से सुनवाई की जाए।
मामले का विवरण:
- केस का शीर्षक: श्रीमती निधि साव बनाम ग्रीनअर्थ इंफ्रावेंचर्स प्राइवेट लिमिटेड
- केस संख्या: एम.ए. संख्या 173/2023
- पीठ: जस्टिस बिभु दत्त गुरु
- दिनांक: 16/04/2026

