सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि सरकारी कर्मचारियों के पास निरस्त हो चुके पुराने नियमों के तहत पदोन्नति के लिए विचार किए जाने का कोई निहित अधिकार नहीं है। कोर्ट ने कहा कि पदोन्नति के मामलों का निर्धारण रिक्ति उत्पन्न होने के समय के बजाय उस समय लागू वैधानिक नियमों के आधार पर होना चाहिए जब पदोन्नति पर विचार किया जा रहा हो। जस्टिस पंकज मिथल और जस्टिस एस.वी.एन. भट्टी की डिवीजन बेंच ने कलकत्ता हाईकोर्ट के उस फैसले को रद्द कर दिया है, जिसमें अंडमान और निकोबार प्रशासन को सहायक उप-निरीक्षक-कार्यकारी (ASI-Executive) की पदोन्नति की रिक्तियों को पुराने, निरस्त हो चुके भर्ती नियमों के तहत भरने का निर्देश दिया गया था। सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि साल 2016 के संशोधित नियम, जिन्होंने लिखित परीक्षा और मैट्रिक की अनिवार्यता को समाप्त करके 100 प्रतिशत वरिष्ठता-सह-योग्यता (seniority-cum-fitness) आधारित पदोन्नति व्यवस्था को बहाल किया था, उन्हीं के तहत लंबित पदोन्नति की प्रक्रिया पूरी की जाएगी।
विवाद की पृष्ठभूमि
यह विवाद अंडमान और निकोबार पुलिस विभाग के कांस्टेबल कैडर से शुरू हुआ था, जो बाद में हेड कांस्टेबल के पद पर प्रमोट हुए थे। ऐतिहासिक रूप से, उनकी सेवा शर्तें अंडमान और निकोबार पुलिस मैनुअल, 1963 और 2 अगस्त 1999 के स्टैंडिंग ऑर्डर संख्या 5349 से संचालित होती थीं। इन नियमों के अनुसार, किसी हेड कांस्टेबल को एएसआई-एग्जीक्यूटिव के पद पर प्रमोट होने के लिए केवल पुलिस ट्रेनिंग कॉलेज (PTC) कोर्स को सफलतापूर्वक पूरा करना होता था, और यह वरिष्ठता-सह-योग्यता के आधार पर होता था।
हालांकि, 31 मार्च 2008 को प्रशासन ने अंडमान और निकोबार प्रशासन (पुलिस विभाग) ग्रुप ‘सी’ पोस्ट भर्ती नियम, 2008 अधिसूचित किए। इन नियमों ने एएसआई-एग्जीक्यूटिव के पद को “चयन पद” (selection post) श्रेणी में डाल दिया। इसके तहत नव-सृजित 66-2/3 प्रतिशत चयन कोटा (selection track) के लिए न्यूनतम शैक्षणिक योग्यता मैट्रिक (10वीं पास) निर्धारित कर दी गई, जिसे विभागीय पदोन्नति परीक्षा के माध्यम से भरा जाना था। शेष 33-1/3 प्रतिशत पद वरिष्ठता-सह-योग्यता श्रेणी के लिए आरक्षित रखे गए। इसके बाद, पुलिस महानिदेशक ने 4 अक्टूबर 2008 को स्टैंडिंग ऑर्डर संख्या 9091 जारी किया, जिसके तहत लिखित परीक्षा, आउटडोर ड्रिल, मस्केट्री, शारीरिक दक्षता, सर्विस रिकॉर्ड और साक्षात्कार को मिलाकर 200 अंकों की एक कठिन चयन परीक्षा लागू कर दी गई।
भर्ती नियमों में 28 जून 2010 को फिर से संशोधन किया गया। इसमें मैट्रिक की अनिवार्यता और 66-2/3 प्रतिशत बनाम 33-1/3 प्रतिशत के विभाजन को बरकरार रखा गया, लेकिन भर्ती के मुख्य स्रोत को “डेपुटेशन के अभाव में पदोन्नति” के बजाय हेड कांस्टेबलों में से “100 प्रतिशत पदोन्नति द्वारा” स्पष्ट किया गया।
6 जून 2014 को पुलिस महानिदेशक कार्यालय ने एक सर्कुलर जारी कर योग्य हेड कांस्टेबलों से 66-2/3 प्रतिशत कोटा के तहत चयन परीक्षा के लिए आवेदन आमंत्रित किए। इस सर्कुलर के बाद उन गैर-मैट्रिक हेड कांस्टेबलों ने आपत्ति जताई, जो 8वीं पास योग्यता के साथ सेवा में शामिल हुए थे। उन्होंने नियमों और इस सर्कुलर को सेंट्रल एडमिनिस्ट्रेटिव ट्रिब्यूनल (कैट), कोलकाता पीठ (पोर्ट ब्लेयर सर्किट पीठ) के समक्ष ओ.ए. संख्या 351/2014 दाखिल करके चुनौती दी।
जब यह मामला लंबित था, तब विभागीय पदोन्नति समिति (DPC) की बैठक 12 नवंबर 2014 को हुई और उसने 13 नवंबर 2014 को “लिस्ट बी” प्रकाशित की, जिसके तहत 44 हेड कांस्टेबलों को तदर्थ (ad-hoc) आधार पर एएसआई-एग्जीक्यूटिव के पद पर प्रमोट कर दिया गया।
21 मार्च 2016 को प्रशासन ने 2016 के संशोधित भर्ती नियम अधिसूचित किए। इन नियमों ने चयन परीक्षा और मैट्रिक की अनिवार्यता को समाप्त कर दिया और पदोन्नति पद्धति को फिर से 100 प्रतिशत वरिष्ठता-सह-योग्यता में बदल दिया। इससे 31 मार्च 2008 से पहले की स्थिति प्रभावी रूप से बहाल हो गई।
नतीजतन, 19 अप्रैल 2016 को ट्रिब्यूनल ने ओ.ए. संख्या 351/2014 को निष्प्रभावी मानते हुए खारिज कर दिया, क्योंकि 2016 के नियमों ने मूल आवेदकों की शिकायतों का पूरी तरह से समाधान कर दिया था। हालांकि, 2010 के नियमों के तहत प्रमोट हुए तदर्थ कर्मचारियों (प्रतिवादी संख्या 1 से 28) ने ट्रिब्यूनल के फैसले को कलकत्ता हाईकोर्ट में चुनौती दी।
10 अगस्त 2016 को हाईकोर्ट ने ट्रिब्यूनल के आदेश को रद्द करते हुए निर्णय दिया कि उत्पन्न हुई रिक्तियों को उसी समय के नियमों (2010 के नियम) के अनुसार भरा जाना चाहिए जब वे उत्पन्न हुई थीं। हाईकोर्ट ने इसके लिए सुप्रीम कोर्ट के ‘मरीपति नागराजा’ मामले के फैसले पर भरोसा किया था।
पक्षों की दलीलें
अपीलकर्ताओं (ट्रिब्यूनल के समक्ष मूल आवेदक) के तर्क: अपीलकर्ताओं की ओर से पेश वकील पी.सी. दास ने निम्नलिखित तर्क दिए:
- वर्ष 2008 के नियमों में मैट्रिक की योग्यता लागू करना अनुचित था, क्योंकि विभाग ने सेवाकाल के दौरान उन्हें कभी भी शैक्षणिक योग्यता बढ़ाने की सलाह नहीं दी थी।
- अंडमान प्रशासन आमतौर पर दिल्ली पुलिस के समान लाभ प्रदान करता है। दिल्ली पुलिस मैनुअल के अनुसार, एएसआई के पद पर पदोन्नति बिना किसी परीक्षा या उच्च शैक्षणिक योग्यता के, पांच साल की सेवा और पुलिस प्रशिक्षण पाठ्यक्रम पूरा करने के बाद पूरी तरह से 100 प्रतिशत वरिष्ठता-सह-योग्यता पर आधारित है।
- सक्षम प्राधिकारी ने 2008 और 2010 के नियमों को अधिसूचित करने से पहले संघ लोक सेवा आयोग (UPSC) और कार्मिक एवं प्रशिक्षण विभाग (DoPT) से परामर्श नहीं किया था, जो भर्ती नियमों को तैयार करने के सामान्य दिशानिर्देशों का उल्लंघन है।
- 66-2/3 प्रतिशत चयन कोटे के कारण वरिष्ठ गैर-मैट्रिक अधिकारियों को अपने से कनिष्ठ (जूनियर) अधिकारियों के अधीन काम करना पड़ रहा था, जिससे उनके आत्मसम्मान को ठेस पहुंच रही थी।
- सुप्रीम कोर्ट की तीन जजों की पीठ द्वारा ‘हिमाचल प्रदेश राज्य बनाम राज कुमार’ मामले में दिए गए फैसले का हवाला देते हुए उन्होंने दलील दी कि पदोन्नति पूरी तरह से उस समय लागू नियमों से संचालित होनी चाहिए जब विचार किया जाता है, न कि तब से जब रिक्तियां उत्पन्न हुई थीं। चूंकि 2016 के नियम पहले से ही प्रभावी हैं और उन्हें चुनौती नहीं दी गई है, इसलिए वे ही नियमित पदोन्नति का एकमात्र कानूनी आधार होने चाहिए।
प्रतिवादियों (तदर्थ पदोन्नत कर्मचारी) के तर्क: प्रतिवादियों की ओर से पेश वरिष्ठ वकील देबाज्योति बसु और एएसजी विक्रमजीत बनर्जी ने तर्क दिया:
- वर्ष 2016 के नियम, जिन्होंने 2010 के नियमों का स्थान लिया था, भविष्य प्रभावी रूप से लागू होते हैं और वे पूर्व में “पूर्ण और बंद” हो चुके लेन-देन को प्रभावित नहीं कर सकते।
- वर्ष 2014 की चयन प्रक्रिया एक “पूर्ण और बंद” प्रक्रिया थी, क्योंकि डीपीसी की बैठक हो चुकी थी और 13 नवंबर 2014 को “लिस्ट बी” को अंतिम रूप दे दिया गया था, जो कि 2016 के संशोधन के लागू होने से 16 महीने पहले की बात है।
- साधारण खंड अधिनियम, 1897 की धारा 6 किसी निरस्त प्रावधान के तहत अर्जित अधिकारों और शुरू की गई कार्यवाही को सुरक्षा प्रदान करती है, जब तक कि कानून में कोई विपरीत मंशा न हो।
- “विचार-तिथि परीक्षण” (consideration-date test) के तहत चयन प्रक्रिया को उस तिथि पर लागू नियमों से ही संचालित किया जाना चाहिए जिस दिन विचार किया गया था। चूंकि चयन प्रक्रिया 2010 के नियमों के लागू रहने के दौरान पूरी हुई थी, इसलिए बाद के संशोधनों को पीछे ले जाकर पहले से हो चुके फैसलों को नहीं पलटा जा सकता।
कोर्ट का विश्लेषण
सुप्रीम कोर्ट ने इस मुख्य कानूनी प्रश्न पर विचार किया कि क्या पदोन्नति रिक्तियां उत्पन्न होने के समय के नियमों से संचालित होनी चाहिए या पदोन्नति पर वास्तविक विचार के समय लागू नियमों से।
1. वाई.वी. रंगैया सिद्धांत को खारिज करना
पीठ ने रेखांकित किया कि हाईकोर्ट का फैसला ‘मरीपति नागराजा और अन्य बनाम आंध्र प्रदेश सरकार’ मामले पर आधारित था, जिसमें ‘वाई.वी. रंगैया और अन्य बनाम जे. श्रीनिवास राव’ के सिद्धांत (कि पुरानी रिक्तियों को उसी समय के नियमों से भरा जाना चाहिए जब वे उत्पन्न हुईं) को लागू किया गया था।
जस्टिस भट्टी ने पीठ के लिए फैसला लिखते हुए स्पष्ट किया कि सुप्रीम कोर्ट की तीन जजों की पीठ ने ‘हिमाचल प्रदेश राज्य और अन्य बनाम राज कुमार और अन्य’ मामले में इस कानूनी स्थिति की विस्तृत समीक्षा की थी और ‘रंगैया’ सिद्धांत को स्पष्ट रूप से खारिज (ओवररूल) कर दिया था। कोर्ट ने ‘राज कुमार’ मामले से निम्नलिखित अंश उद्धृत किया:
“वाई.वी. रंगैया का यह कथन कि “संशोधित नियमों से पहले की रिक्तियां पुराने नियमों से संचालित होंगी न कि संशोधित नियमों से”, संविधान के भाग XIV के तहत संघ और राज्यों के अधीन सेवाओं से जुड़े कानून का सही सिद्धांत नहीं दर्शाता है। इसे इसके द्वारा खारिज (ओवररूल) किया जाता है।”
कोर्ट ने इसके अलावा अपनी डिवीजन बेंच के फैसले ‘ओडिशा राज्य और अन्य बनाम श्रीपति रंजन दाश’ का भी उल्लेख किया, जिसमें दोहराया गया था कि:
- ऐसा कोई सार्वभौमिक नियम नहीं है कि रिक्तियों को अनिवार्य रूप से उन्हीं नियमों के अनुसार भरा जाए जो रिक्ति उत्पन्न होने की तिथि पर लागू थे।
- किसी कर्मचारी के पास केवल उस वैधानिक नियम के आधार पर पदोन्नति के लिए विचार किए जाने का अधिकार होता है जो वास्तविक विचार किए जाने की तिथि पर लागू हो, न कि पिछली तिथियों से।
इस संबंध में पीठ ने टिप्पणी की:
“इस मुद्दे पर मिसालों के आलोक में, हमारा मानना है कि मरीपति नागराजा (उपरोक्त) का हवाला देकर दिए गए आक्षेपित फैसले का आधार गलत है और इसमें हस्तक्षेप करने व इसे खारिज करने की आवश्यकता है।”
2. 2014 की तदर्थ (एड-हॉक) पदोन्नति की स्थिति
सुप्रीम कोर्ट ने प्रतिवादियों के इस दावे की समीक्षा की कि उनकी 2014 की पदोन्नति एक “पूर्ण हो चुका कार्य” थी और इसे 2016 के नियमों द्वारा प्रभावित नहीं किया जा सकता था। कोर्ट ने 13 नवंबर 2014 के पदोन्नति आदेश की भाषा का परीक्षण किया और पाया कि इसमें स्पष्ट रूप से लिखा था कि ये पदोन्नतियां विशुद्ध रूप से तदर्थ (एड-हॉक) हैं, उन्हें किसी भी समय हेड कांस्टेबल के मूल पद पर वापस भेजा जा सकता है, इससे वरिष्ठता का कोई अधिकार नहीं मिलता है, और यह स्पष्ट रूप से “ओ.ए. संख्या 351/00078/AN/2014 के अंतिम निर्णय के अधीन” है।
पीठ ने इस संबंध में माना:
“इसलिए, एएसआई-एग्जीक्यूटिव के रूप में तदर्थ (एड-हॉक) पदोन्नति के आदेश को पढ़ने से यह निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता कि प्रतिवादी संख्या 1 से 28 के पक्ष में की गई पदोन्नति अंतिम हो गई थी या इससे उनके पास कोई निहित अधिकार आ गया था। इसलिए, इसे ‘पूर्ण कार्य’ नहीं माना जा सकता।”
3. नियमों के “प्रतिस्थापन” (Substitution) का कानूनी प्रभाव
कोर्ट ने 2016 के नियमों में इस्तेमाल किए गए शब्द “प्रतिस्थापित” (substituted) के विधायी प्रभाव पर चर्चा की। ‘गोत्तुमुक्कला वेंकट कृष्णमराजू बनाम भारत संघ व अन्य’ और ‘जिले सिंह बनाम हरियाणा राज्य व अन्य’ मामलों का संदर्भ देते हुए कोर्ट ने स्पष्ट किया कि प्रतिस्थापन का प्रभाव पुराने प्रावधान को हटाना और नए प्रावधान को इस तरह से लागू करना होता है मानो पुराने शब्द हटाकर उनकी जगह नए शब्द लिख दिए गए हों।
पीठ ने निर्णय दिया:
“राज कुमार (उपरोक्त) मामले में यह फैसला दिया गया था कि विचार की तिथि पर लागू कानून रिक्तियों या पदोन्नति के पदों को भरने के लिए लागू होता है। इस अदालत द्वारा घोषित कानून को ध्यान में रखते हुए और वर्तमान मामले की परिस्थितियों पर गौर करते हुए, हम पाते हैं कि ‘प्रतिस्थापित’ शब्द का यदि तार्किक और सुसंगत प्रभाव दिया जाए, तो इसका अर्थ यह है कि पदोन्नति के लिए विचार केवल 2016 के नियमों के तहत ही हुआ था।”
पीठ ने आगे स्पष्ट किया:
“इसलिए, अपीलकर्ता 2010 और 2014 के बीच उपलब्ध रिक्तियों के लिए अपने मामलों पर विचार करने का दावा नहीं कर सकते। अधिक से अधिक, लागू नियमों के तहत विचार 2016 में हुआ था; कुछ का चयन हुआ और कुछ का नहीं। इस प्रकार, अपीलकर्ताओं और प्रतिवादी संख्या 1 से 28 सहित सभी पात्र उम्मीदवारों के मामलों पर तुरंत 2016 के नियमों के अनुसार कड़ाई से विचार करना होगा।”
निर्णय
सुप्रीम कोर्ट ने सिविल अपील को स्वीकार कर लिया और कलकत्ता हाईकोर्ट के फैसले को रद्द कर दिया। पीठ ने अपने निष्कर्षों को संक्षेप में प्रस्तुत करते हुए निम्नलिखित निर्देश जारी किए:
- हाईकोर्ट का विवादित फैसला कानूनन सही नहीं है और इसे रद्द किया जाता है।
- वर्ष 2016 के नियमों ने अंडमान और निकोबार द्वीप समूह संघ राज्य क्षेत्र में एएसआई-एग्जीक्यूटिव के पद पर पदोन्नति के लिए पूर्व स्थिति (100 प्रतिशत वरिष्ठता-सह-योग्यता के आधार पर पदोन्नति) को बहाल कर दिया है।
- प्रक्रिया का पालन करते हुए वर्ष 2016 के सर्कुलर के तहत की गई पदोन्नतियां इस मूल आवेदन (O.A. No. 351/2014) का विषय नहीं हैं।
- एएसआई-एग्जीक्यूटिव की मौजूदा रिक्तियों को आज से दो महीने के भीतर वर्ष 2016 के नियमों के तहत भरा जाना चाहिए।
मामले का विवरण
मामले का शीर्षक: जगदीश प्रसाद और अन्य बनाम पी.एम. मनोज कुमार और अन्य
वाद संख्या: सिविल अपील संख्या 9041/2019
पीठ: जस्टिस पंकज मिथल, जस्टिस एस.वी.एन. भट्टी
निर्णय की तिथि: 27 मई, 2026

