चिल्ड्रन्स कोर्ट द्वारा धारा 19(1) के तहत निर्णय लिए बिना किशोर पर वयस्क की तरह मुकदमा चलाना पूरी कार्यवाही को अमान्य कर देता है: सुप्रीम कोर्ट

सुप्रीम कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में स्पष्ट किया है कि किशोर न्याय (बच्चों की देखभाल और संरक्षण) अधिनियम, 2015 की धारा 19(1) के तहत चिल्ड्रन्स कोर्ट के लिए यह तय करना अनिवार्य है कि जघन्य अपराध के आरोपी किशोर पर वयस्क की तरह मुकदमा चलाया जाए या बच्चे की तरह। कोर्ट ने कहा कि ट्रायल प्रक्रिया शुरू करने से पहले यह निर्णय लिया जाना कानूनी रूप से अनिवार्य है। सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस अरविंद कुमार और जस्टिस प्रसन्न बी. वराले की पीठ ने निर्णय दिया कि इस प्रकार के सकारण (reasoned) आदेश की अनुपस्थिति कोर्ट के अधिकार क्षेत्र की जड़ पर चोट करती है और पूरे ट्रायल को अमान्य (दूषित) कर देती है। इसके साथ ही, सुप्रीम कोर्ट ने हत्या के आरोप में 14 साल की कड़ी कैद की सजा काट रहे एक अपीलकर्ता की सजा को रद्द कर दिया, जो घटना के समय साढ़े 16 साल का था। अदालत ने उसे तत्काल बरी करने का निर्देश दिया क्योंकि वह पहले ही छह साल से अधिक समय जेल में बिता चुका है।

मामले की पृष्ठभूमि

अभियोजन पक्ष के अनुसार, 21 अक्टूबर 2018 को पुलिस को कैथल के सिविल लाइंस पुलिस स्टेशन से सूचना मिली कि झगड़े में घायल हुए एक युवक की अस्पताल में मौत हो गई है। शिकायतकर्ता ने अपने बयान में कहा था कि वह अपने साथियों और मृतक के साथ मोटरसाइकिल से मेले से लौट रहा था, तभी दो मोटरसाइकिलों पर सवार सात नकाबपोश लोगों ने उन्हें रोक लिया। घटना के समय साढ़े 16 साल के रहे अपीलकर्ता ने कथित तौर पर मृतक के सिर के हिस्से पर लोहे के पाइप से वार किया, जबकि अन्य आरोपियों ने चाकुओं और लाठियों से हमला कर दिया। बाद में अस्पताल में घायल युवक की मौत हो गई।

जांच के बाद, पुलिस ने भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) की विभिन्न धाराओं के तहत चार्जशीट दाखिल की। चूंकि मुख्य आरोपी नाबालिग था, इसलिए उसे कैथल के जुवेनाइल जस्टिस बोर्ड (जेजे बोर्ड) के समक्ष पेश किया गया। जेजे बोर्ड ने अधिनियम की धारा 15 के तहत प्रारंभिक मूल्यांकन किया और 24 जनवरी 2019 को राय दी कि अपीलकर्ता के पास अपराध करने और उसके परिणामों को समझने की शारीरिक और मानसिक क्षमता थी। इसके बाद जेजे बोर्ड ने मामले को एडिशनल सेशंस जज, कैथल (चिल्ड्रन्स कोर्ट के रूप में कार्यरत) को धारा 18(3) के तहत भेज दिया ताकि आरोपी पर वयस्क के रूप में मुकदमा चलाया जा सके।

हालांकि, मामला प्राप्त होने के बाद, चिल्ड्रन्स कोर्ट ने अधिनियम की धारा 19(1) के तहत कोई स्वतंत्र न्यायिक आदेश पारित नहीं किया। इसके बजाय, कोर्ट ने सीधे सेशंस ट्रायल शुरू कर दिया और 13/14 मार्च 2019 को अपीलकर्ता को हत्या का दोषी मानते हुए 14 साल के सश्रम कारावास की सजा सुना दी। पंजाब और हरियाणा हाईकोर्ट ने बाद में अपीलकर्ता की अपील को खारिज करते हुए उसकी सजा को बरकरार रखा था।

पक्षों की दलीलें

सुप्रीम कोर्ट के समक्ष अपीलकर्ता के वकील ने दलील दी कि जब मामला चिल्ड्रन्स कोर्ट को भेजा गया, तो वह कोर्ट अधिनियम की धारा 19(1) के तहत अनिवार्य रूप से आदेश पारित करने के लिए बाध्य थी। वकील ने इस बात पर जोर दिया कि रिकॉर्ड में ऐसा कोई दस्तावेजी प्रमाण नहीं है जिससे यह साबित हो सके कि चिल्ड्रन्स कोर्ट ने यह मूल्यांकन करने के लिए अपने न्यायिक दिमाग का इस्तेमाल किया था कि क्या आरोपी पर वयस्क के रूप में मुकदमा चलाने की वास्तव में आवश्यकता थी।

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इसके जवाब में, राज्य सरकार का प्रतिनिधित्व कर रहे वकील ने तर्क दिया कि जेजे बोर्ड द्वारा धारा 15 के तहत किया गया प्रारंभिक मूल्यांकन ही ट्रायल को आगे बढ़ाने और सजा को वैध बनाए रखने के लिए पर्याप्त था।

सुप्रीम कोर्ट का विश्लेषण

सुप्रीम कोर्ट ने इस मुख्य कानूनी सवाल पर विचार किया कि क्या धारा 19(1) के तहत औपचारिक निर्णय के बिना सुनाई गई सजा को कानूनी रूप से वैध माना जा सकता है। पीठ ने रेखांकित किया कि यह अधिनियम जघन्य अपराधों के आरोपी 16 से 18 वर्ष के बीच के किशोरों के मामलों को संभालने के लिए एक बेहद सुव्यवस्थित और क्रमिक प्रक्रिया निर्धारित करता है।

कानूनी ढांचे का विश्लेषण करते हुए, अदालत ने स्पष्ट किया कि मामले का संज्ञान लेना चिल्ड्रन्स कोर्ट के लिए केवल पहला कदम है। धारा 19(1) के तहत, कोर्ट को स्पष्ट रूप से यह तय करना होता है कि क्या बच्चे पर आपराधिक प्रक्रिया संहिता के तहत वयस्क के रूप में मुकदमा चलाया जाना चाहिए, या फिर उसे खुद बोर्ड के रूप में जांच कर धारा 18 के तहत सुधारात्मक आदेश पारित करने चाहिए।

अदालत ने माना कि भले ही धारा 19(1) में “कर सकता है” (may) शब्द का इस्तेमाल किया गया है, लेकिन इसे “करेगा” (shall) के रूप में ही पढ़ा जाना चाहिए क्योंकि बच्चे पर वयस्क के रूप में मुकदमा चलाने और किशोर के रूप में मुकदमा चलाने के कानूनी परिणाम एक-दूसरे से पूरी तरह भिन्न होते हैं। कानून की व्याख्या के इस सिद्धांत को स्पष्ट करने के लिए पीठ ने सरला गोयल और अन्य बनाम किशन चंद मामले का हवाला देते हुए कहा:

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“कोई कानून अनिवार्य है या केवल निर्देशिका, यह विधायिका की मंशा पर निर्भर करता है, न कि उस भाषा पर जिसमें वह मंशा व्यक्त की गई है। विधायिका का अर्थ और इरादा ही सर्वोपरि होना चाहिए, और इसे न केवल प्रावधान की शब्दावली से, बल्कि उसकी प्रकृति, उसकी रूपरेखा और उसे एक या दूसरे तरीके से समझने पर होने वाले परिणामों पर विचार करके भी सुनिश्चित किया जाना चाहिए।”

पीठ ने आगे समझाया कि किशोर न्याय मॉडल नियम, 2016 के नियम 13 के तहत, चिल्ड्रन्स कोर्ट के लिए अपने निर्णय के कारणों को दर्ज करना अनिवार्य है। यदि वयस्क के रूप में मुकदमा चलाया जाता है, तो नाबालिग को सेशंस ट्रायल और गंभीर जेल की सजा का सामना करना पड़ता है तथा सजा के बाद मिलने वाली अयोग्यताएं भी बनी रहती हैं। इसके विपरीत, यदि बच्चे के रूप में मुकदमा चलाया जाता है, तो प्रक्रिया समन मामले की तरह होती है और अधिकतम सुधारात्मक सजा स्पेशल होम में तीन साल की होती है, जिसमें कोई बाद की अयोग्यता भी नहीं होती।

अदालत ने अजीत गुर्जर बनाम मध्य प्रदेश राज्य मामले का जिक्र करते हुए दोहराया कि धारा 19(1) के तहत जांच करना कोई महज औपचारिक प्रक्रिया नहीं है। कोर्ट ने बरुण चंद्र ठाकुर बनाम मास्टर भोलू मामले का भी उल्लेख किया, जिसमें स्पष्ट किया गया था कि वयस्क के रूप में मुकदमा चलाने के परिणाम बच्चे के पूरे जीवन पर स्थायी और गंभीर प्रभाव डालते हैं। इसके बाद, थिरुमूर्ति बनाम राज्य मामले के सिद्धांत को लागू करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि इन अनिवार्य कानूनी प्रावधानों के उल्लंघन में चलाया गया ट्रायल पूरी कार्यवाही को पूरी तरह दूषित और अमान्य कर देता है।

अदालत का निर्णय

सुप्रीम कोर्ट ने निष्कर्ष निकाला कि धारा 19(1) के तहत सकारण औपचारिक निर्णय के बिना चिल्ड्रन्स कोर्ट द्वारा चलाया गया ट्रायल पूरी तरह अमान्य था।

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अदालत ने स्वीकार किया कि हालांकि कुछ पुराने मामलों में त्रुटियों को सुधारने के लिए मामलों को वापस निचली अदालत भेजा गया था, लेकिन वर्तमान अपीलकर्ता अब 24 वर्ष का हो चुका है और छह साल से अधिक समय जेल में बिता चुका है। थिरुमूर्ति मामले पर भरोसा करते हुए, कोर्ट ने टिप्पणी की कि अब वर्ष 2018 में हुए अपराध के समय अपीलकर्ता की मानसिक और शारीरिक क्षमता का पूर्वव्यापी (retrospective) मूल्यांकन करना व्यावहारिक रूप से संभव नहीं है।

तदनुसार, सुप्रीम कोर्ट ने अपील स्वीकार कर ली, चिल्ड्रन्स कोर्ट और पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट दोनों के फैसलों को रद्द कर दिया और अपीलकर्ता को बरी कर दिया।

मामले को समाप्त करने से पहले, सुप्रीम कोर्ट ने देश के सभी चिल्ड्रन्स कोर्ट के लिए एक देशव्यापी निर्देश जारी किया:

“…किशोर न्याय बोर्ड द्वारा अधिनियम की धारा 18(3) के तहत ट्रांसफर या कमिटल के बाद रिकॉर्ड प्राप्त होने पर, चिल्ड्रन्स कोर्ट का पहला कर्तव्य है कि वह मामले का संज्ञान लेने के बाद, मामले में आगे बढ़ने से पहले ‘कानून का उल्लंघन करने वाले किशोर’ के उचित मूल्यांकन पर अधिनियम की धारा 19(1) के तहत एक सकारण आदेश पारित करे।”

मामले का विवरण

मामले का शीर्षक: एस बनाम हरियाणा राज्य
वाद संख्या: क्रिमिनल अपील संख्या 2026 (एसएलपी (क्रिमिनल) संख्या 8113/2024 से उत्पन्न)
पीठ: जस्टिस अरविंद कुमार, जस्टिस प्रसन्न बी. वराले
निर्णय की तिथि: 13 जुलाई, 2026

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