दिल्ली-एनसीआर में अवैध निर्माण और असुरक्षित इमारतों पर सुप्रीम कोर्ट सख्त, दिल्ली के लिए विशेषज्ञ समिति गठित और गुरुग्राम अधिकारी तलब

दिल्ली-एनसीआर में धड़ल्ले से बन रहे अवैध और असुरक्षित निर्माणों पर सुप्रीम कोर्ट ने बेहद कड़ा रुख अपनाया है। कोर्ट ने स्थानीय नगर निकायों की कार्यप्रणाली पर तीखी नाराजगी जताते हुए टिप्पणी की है कि अवैध निर्माणों को रोकने के नाम पर प्रशासन की तरफ से सिर्फ खानापूर्ति और दिखावे की कार्रवाई की जा रही है।

गुरुवार को हुई सुनवाई के दौरान जस्टिस ए अमानुल्लाह और जस्टिस आर महादेवन की पीठ ने इस ढीले रवैये पर अधिकारियों को चेतावनी दी कि यदि अदालती निर्देशों का पालन नहीं किया गया, तो वे जिम्मेदार अफसरों के खिलाफ अवमानना की कार्रवाई शुरू करने में बिल्कुल संकोच नहीं करेंगे।

दक्षिण दिल्ली के इलाकों की जांच के लिए बनेगी विशेषज्ञ समिति

सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली के साकेत, लाजपत नगर और मालवीय नगर इलाकों में हुए अवैध निर्माण के वास्तविक पैमाने का पता लगाने के लिए एक उच्च स्तरीय संयुक्त समिति गठित करने का आदेश दिया है। इस समिति में भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (आईआईटी) के दो वरिष्ठ प्रोफेसर, दो ड्राफ्ट्समैन और दिल्ली नगर निगम (एमसीडी) के अधिकारी शामिल होंगे।

अदालत ने सख्त लहजे में निर्देश दिया है कि समिति पूरी ईमानदारी के साथ अपनी निष्पक्ष रिपोर्ट तैयार करे और इस काम में किसी भी प्रकार की कोताही या ढिलाई बर्दाश्त नहीं की जाएगी। पीठ ने संबंधित अधिकारियों को आदेश दिया है कि वे रिपोर्ट के साथ आगामी 4 अगस्त को अगली सुनवाई के दौरान व्यक्तिगत रूप से कोर्ट में हाजिर रहें।

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फायर ऑडिट में फेल गुरुग्राम के व्यावसायिक प्रतिष्ठानों पर एक्शन

दिल्ली के साथ-साथ गुरुग्राम में भी अग्नि सुरक्षा मानकों की गंभीर अनदेखी का मामला सुप्रीम कोर्ट के सामने आया। मीडिया रिपोर्टों का हवाला देते हुए कोर्ट ने चिंता जताई कि गुरुग्राम के 90 फीसदी से अधिक व्यावसायिक प्रतिष्ठान हालिया फायर सेफ्टी ऑडिट में फेल रहे हैं।

इस लापरवाही पर जवाब तलब करते हुए कोर्ट ने गुरुग्राम महानगर विकास प्राधिकरण (जीएमडीए) के उपाध्यक्ष को 4 अगस्त को अदालत में पेश होने का समन जारी किया है। उन्हें अदालत को यह स्पष्ट करना होगा कि अग्नि सुरक्षा से जुड़े इन बड़े खतरों को दूर करने के लिए प्रशासन ने अब तक क्या ठोस कदम उठाए हैं।

सुनवाई के दौरान पीठ ने एमसीडी की ओर से पेश हुए एडिशनल सॉलिसिटर जनरल एस डी संजय के समक्ष भी नाराजगी जाहिर की। कोर्ट ने कहा कि एमसीडी द्वारा वर्ष 2024 में जारी निर्देशों और विशेष रूप से 20 मई 2026 के आदेशों का अनुपालन न करना बेहद चिंताजनक है।

न्याय मित्र की रिपोर्ट में हादसों और प्रशासनिक लापरवाही का खुलासा

कोर्ट ने सुनवाई के दौरान मामले में अदालत की सहायता के लिए नियुक्त किए गए वरिष्ठ वकील और न्याय मित्र (एमिकस क्यूरी) अजीत कुमार सिन्हा की स्टेटस रिपोर्ट को रिकॉर्ड पर लिया। वकील गोविंद जी के सहयोग से तैयार की गई इस रिपोर्ट में अवैध निर्माणों और हाल ही में हुई आगजनी की घटनाओं को लेकर नगर निगमों के ढीले रवैये की पोल खोली गई है।

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रिपोर्ट में बताया गया है कि दिल्ली के सदुलाजाब इलाके में बन रही एक अवैध इमारत को समय रहते रोकने में एमसीडी पूरी तरह नाकाम रही। यही लापरवाही 30 मई को इस बहुमंजिला इमारत के ढहने का कारण बनी, जिसमें दबकर 6 लोगों की मौत हो गई और 14 अन्य गंभीर रूप से घायल हो गए। इसके अलावा रिपोर्ट में यह भी रेखांकित किया गया कि 3 जून को दिल्ली के मालवीय नगर में लगी भीषण आग और 22 जून को लखनऊ में भड़की आग की घटनाएं केवल एक हादसा नहीं, बल्कि प्रशासनिक स्तर पर कई व्यवस्थागत नाकामियों का साझा नतीजा थीं।

देशभर के नगर निकायों को मिले पुराने निर्देशों की याद दिलाई

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यह पूरा मामला सुप्रीम कोर्ट के 25 मार्च के उस पुराने आदेश से जुड़ा है, जिसमें कोर्ट ने प्रतिबंधित क्षेत्रों और तय नियमों के खिलाफ जाकर बनाई जा रही इमारतों पर गहरी चिंता व्यक्त की थी। तब अदालत ने पाया था कि रिहायशी क्षेत्रों के लिए स्वीकृत जमीनों और इमारतों का धड़ल्ले से अवैध व्यावसायिक इस्तेमाल किया जा रहा है।

उसी समय सुप्रीम कोर्ट ने देशभर के सभी नगर निकायों को निर्देश जारी किए थे कि वे अपने-अपने अधिकार क्षेत्रों में गहन जांच अभियान चलाएं और रिहायशी इलाकों में चल रही अवैध गैर-आवासीय गतिविधियों पर तत्काल अंकुश लगाएं।

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