घरेलू विवाद में पुलिस किसी नागरिक को हिरासत में नहीं रख सकती; इलाहाबाद हाईकोर्ट ने 24 घंटे की अवैध हिरासत के लिए मुआवजे का निर्देश दिया

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा है कि पुलिस द्वारा किसी नागरिक को अवैध रूप से हिरासत में रखना संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत मिले जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के मौलिक अधिकार का सीधा उल्लंघन है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि घरेलू विवादों में पुलिस की मनमानी को छिपाने के लिए दंड प्रक्रिया संहिता (सीआरपीसी) की धारा 107/116 के तहत सुरक्षात्मक कार्यवाही को हथियार नहीं बनाया जा सकता। जस्टिस जे.जे. मुनीर और जस्टिस संजीव कुमार की पीठ ने निर्णय दिया कि जब तक कोई संज्ञेय अपराध न हुआ हो, तब तक पुलिस को घरेलू झगड़ों में हस्तक्षेप करने का कोई अधिकार नहीं है। याचिकाकर्ता को पुलिस लॉकअप में 24 घंटे तक अवैध रूप से बंद रखने को पूरी तरह से गैर-कानूनी मानते हुए हाईकोर्ट ने उत्तर प्रदेश सरकार को 25,000 रुपये का अंतरिम मुआवजा और 10,000 रुपये मुकदमा खर्च देने का निर्देश दिया। कोर्ट ने राज्य सरकार को यह छूट भी दी कि वह इस राशि को संबंधित दोषी पुलिस अधिकारी के वेतन से वसूल सकती है।

मामले की पृष्ठभूमि

याचिकाकर्ता वाराणसी जिले के एक इलाके का निवासी है और वह प्रयागराज के हंडिया थाना क्षेत्र के अंतर्गत आने वाले अपने पैतृक गांव में अपनी कृषि भूमि की देखरेख करने गया था। 26 नवंबर 2022 को दोपहर लगभग 3:00 बजे जब वह अपने खेतों से लौटा, तब तत्कालीन पुलिस चौकी प्रभारी उसके घर में घुस गए। बिना कोई कारण बताए, उन्होंने याचिकाकर्ता को (जो उस समय केवल लुंगी और कुर्ते में थे) उनके घर से घसीटकर बाहर निकाला और पहले पुलिस चौकी और फिर हंडिया थाने के लॉकअप में ले गए।

याचिकाकर्ता को 26 नवंबर से 27 नवंबर 2022 तक लगभग 24 घंटे थाने के लॉकअप में बंद रखा गया। याचिका में आरोप लगाया गया कि इस दौरान पुलिस अधिकारी ने याचिकाकर्ता की रिहाई के बदले 20,000 रुपये की रिश्वत मांगी। याचिकाकर्ता के छोटे भाई और एक वकील के प्रयासों के बावजूद पुलिस उन्हें छोड़ने को तैयार नहीं हुई। आखिरकार 27 नवंबर 2022 को शाम 4:00 बजे कथित तौर पर रिश्वत देने के बाद ही याचिकाकर्ता को रिहा किया गया।

याचिकाकर्ता के बेटे ने, जो दिल्ली में वकील हैं, इस संबंध में उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री, पुलिस महानिदेशक (डीजीपी) और पुलिस आयुक्त, प्रयागराज को औपचारिक शिकायतें भेजीं। इसके बाद हंडिया के सहायक पुलिस आयुक्त (एसीपी) को जांच के निर्देश दिए गए। हालांकि, एसीपी ने 28 दिसंबर 2022 को अपनी जांच रिपोर्ट में याचिकाकर्ता, उनके बेटे या गांव के उस मुख्य गवाह (जो लॉकअप में याचिकाकर्ता के लिए घर का बना खाना लेकर गए थे) का बयान दर्ज किए बिना ही शिकायतों को खारिज कर दिया।

इसके अलावा, याचिकाकर्ता की रिहाई के दो दिन बाद यानी 29 नवंबर 2022 को उनके खिलाफ सीआरपीसी की धारा 107/116 के तहत कार्यवाही शुरू कर दी गई। याचिकाकर्ता का तर्क था कि यह कार्यवाही पुलिस द्वारा अपनी 24 घंटे की अवैध हिरासत को छिपाने के लिए घबराहट में उठाया गया कदम था।

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पक्षों के तर्क

याचिकाकर्ता की ओर से तर्क दिया गया कि उनकी हिरासत उनके व्यक्तिगत स्वतंत्रता के मौलिक अधिकार का घोर उल्लंघन थी। उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि एसीपी की जांच पूरी तरह से दिखावा थी क्योंकि इसमें महत्वपूर्ण गवाहों के बयानों की अनदेखी की गई। उन्होंने यह भी दलील दी कि धारा 107/116 के तहत कार्यवाही सार्वजनिक शांति बनाए रखने के लिए होती है और इसे उनके और उनके भाई की बहू के बीच के निजी घरेलू विवाद में लागू नहीं किया जा सकता था।

राज्य सरकार की ओर से एटा के अपर जिला मजिस्ट्रेट (न्यायिक) ने एक जवाबी हलफनामा दायर किया। उन्होंने स्वीकार किया कि धारा 111 सीआरपीसी के तहत नोटिस केवल हंडिया थाने द्वारा भेजी गई रिपोर्ट के आधार पर जारी किया गया था। उन्होंने माना कि नोटिस जारी करते समय घरेलू विवाद के पहलू की अनदेखी की गई थी, जिसे उन्होंने “अनजाने में हुई भूल” बताया और कोर्ट से बिना शर्त माफी मांगी। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि याचिकाकर्ता को कभी यह नोटिस तामील नहीं कराया गया और समय बीतने के साथ इसकी कानूनी वैधता समाप्त हो गई।

संबंधित पुलिस अधिकारी ने भी अपना व्यक्तिगत हलफनामा दाखिल किया। उन्होंने याचिकाकर्ता को घर से घसीटने या लॉकअप में बंद रखने की बात से स्पष्ट रूप से इनकार नहीं किया। इसके बजाय, उन्होंने दावा किया कि दोनों पक्ष स्वेच्छा से पुलिस चौकी आए थे और याचिकाकर्ता के भाई की बहू द्वारा की गई घरेलू हिंसा की शिकायत के संबंध में दोनों पक्षों के बीच आपसी सहमति से एक समझौता हुआ था, जिसे उनके वकील ने तैयार किया था।

हाईकोर्ट का विश्लेषण

हाईकोर्ट ने विश्लेषण की शुरुआत में इस बात पर ध्यान दिया कि यह याचिका एक अनूठी स्थिति प्रस्तुत करती है:

“यह एक ऐसी रिट याचिका है, जो एक बहुत ही महत्वपूर्ण वाद-कारण को दर्शाती है, लेकिन इसमें मांगी गई राहत अत्यंत मामूली है।”

हालांकि याचिकाकर्ता ने एसीपी की जांच रिपोर्ट को रद्द करने की अपनी मांग को हटा दिया था और केवल एक वरिष्ठ अधिकारी से नए सिरे से जांच कराने की मांग की थी, लेकिन कोर्ट ने न्याय के हित में अपनी शक्तियों का उपयोग करते हुए उचित राहत देने का निर्णय लिया।

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सुरक्षात्मक कार्यवाहियों का मूल्यांकन करते हुए हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि घरेलू विवाद सीआरपीसी के अध्याय 8 के अंतर्गत नहीं आते। बॉम्बे हाईकोर्ट के फैयाज शमशुद्दीन अत्तार बनाम महाराष्ट्र राज्य और अन्य (2015) के फैसले का हवाला देते हुए कोर्ट ने कहा:

“ये कार्यवाहियां मूल रूप से शांति और सार्वजनिक व्यवस्था को बनाए रखने के लिए तैयार की गई हैं। ऐसी कार्यवाहियों का संबंध सार्वजनिक शांति और व्यवस्था से है, न कि घरेलू शांति या व्यवस्था से।”

कोर्ट ने पुलिस अधिकारी के इस तर्क को सिरे से खारिज कर दिया कि याचिकाकर्ता स्वेच्छा से समझौता पत्र पर हस्ताक्षर करने के लिए पुलिस चौकी आया था। इस बचाव की तीखी आलोचना करते हुए कोर्ट ने टिप्पणी की:

“वह एक पुलिस अधिकारी है, जिससे लोग डरते हैं क्योंकि उसके पास राज्य की दमनकारी शक्ति होती है।”

कोर्ट ने आगे कहा:

“यह असंभव है कि याचिकाकर्ता स्वेच्छा से समझौता करने के लिए पुलिस चौकी या थाने गया होगा।”

चूंकि पुलिस अधिकारी के हलफनामे में याचिकाकर्ता को घसीटने और लॉकअप में बंद रखने के आरोपों का कोई स्पष्ट खंडन नहीं था, इसलिए कोर्ट ने अवैध हिरासत के आरोपों को स्वीकार कर लिया। कोर्ट ने रेखांकित किया कि यदि याचिकाकर्ता के भाई की बहू को घरेलू हिंसा की कोई शिकायत थी, तो उनका उचित कानूनी उपाय घरेलू हिंसा से महिला संरक्षण अधिनियम, 2005 के तहत मजिस्ट्रेट के समक्ष जाना था, और इस मामले में पुलिस की कोई भूमिका नहीं थी।

कोर्ट ने माना कि बाद में शुरू की गई धारा 107/116 सीआरपीसी की कार्यवाही केवल पुलिस की प्रशासनिक मनमानी पर पर्दा डालने के लिए उठाया गया एक कदम था। अनुच्छेद 21 के उल्लंघन पर कोर्ट ने टिप्पणी की:

“हम इस बात से पूरी तरह आश्वस्त हैं कि पुलिस अधिकारी ने याचिकाकर्ता को एक ऐसी शिकायत के आधार पर उसके घर से घसीटकर (जिस पर कार्रवाई करने के लिए वह अधिकृत नहीं था) और फिर उसे अवैध रूप से हिरासत में लेकर पहले बरौत पुलिस चौकी और फिर 26.11.2022 से 27.11.2022 तक हंडिया थाने के लॉकअप में बंद रखकर, इस अत्यंत मूल्यवान मौलिक अधिकार के सबसे बुनियादी सार का घोर उल्लंघन किया है।”

कोर्ट ने दिल्ली हाईकोर्ट के पंकज कुमार शर्मा बनाम राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र दिल्ली सरकार और अन्य (2023) के फैसले और सुप्रीम कोर्ट के ऐतिहासिक निर्णयों डी.के. बसु बनाम पश्चिम बंगाल राज्य (1997) तथा नीलाबती बेहरा बनाम उड़ीसा राज्य (1993) का संदर्भ दिया। इन फैसलों में यह स्पष्ट किया गया है कि अनुच्छेद 21 के तहत मौलिक अधिकारों के उल्लंघन के मामलों में संवैधानिक अदालतों को मौद्रिक मुआवजा देने का पूरा अधिकार है।

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इसके अतिरिक्त, कोर्ट ने अपनी ही खंडपीठ के शिव कुमार वर्मा और अन्य बनाम उत्तर प्रदेश राज्य और अन्य (2021) के निर्णय का हवाला दिया, जिसमें उत्तर प्रदेश सरकार की 23 मार्च 2021 की नीति को मान्यता दी गई थी। इस नीति के तहत अवैध हिरासत के शिकार किसी भी नागरिक को 25,000 रुपये का मुआवजा देने और दोषी अधिकारी से इसकी वसूली करने का प्रावधान है।

याचिका में औपचारिक मांग न होने के बावजूद मुआवजा देने के अपने अधिकार का समर्थन करने के लिए कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के एम. सुधाकर बनाम वी. मनोहरन और अन्य (2011) और उड़ीसा हाईकोर्ट के बेरहामपुर विश्वविद्यालय और अन्य बनाम गणेश चंद्र बेहरा और अन्य (2021) के फैसलों का संदर्भ दिया।

कोर्ट का निर्णय

हाईकोर्ट ने याचिका को स्वीकार करते हुए उत्तर प्रदेश सरकार को निर्देश दिया कि वह याचिकाकर्ता को तीस दिनों के भीतर 25,000 रुपये का अंतरिम मुआवजा प्रदान करे। इसके साथ ही कोर्ट ने 10,000 रुपये का मुकदमा खर्च भी देने का निर्देश दिया।

कोर्ट ने राज्य सरकार को यह पूरी राशि दोषी पुलिस अधिकारी के वेतन या अन्य देयों से वसूल करने की छूट दी। कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि याचिकाकर्ता भविष्य में सक्षम सिविल कोर्ट में हर्जाने के लिए नियमित दीवानी मुकदमा दायर करने के लिए स्वतंत्र है, जहां अंतिम हर्जाने का निर्धारण करते समय इस रिट याचिका में दिए गए अंतरिम मुआवजे को समायोजित किया जाएगा।

मामले का विवरण

मामले का शीर्षक: माताबंबर मिश्रा बनाम उत्तर प्रदेश राज्य और अन्य
वाद संख्या: क्रिमिनल मिसलेनियस रिट याचिका संख्या – 2023 की 3807
पीठ: जस्टिस जे.जे. मुनीर और जस्टिस संजीव कुमार
निर्णय की तिथि: 29 मई, 2026

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