डिस्चार्ज के 12 घंटे के भीतर मरीज को फिर आईसीयू भेजना पड़ा, मुंबई के अस्पताल पर मेडिकल लापरवाही का जुर्माना बरकरार

दमोह के एक 77 वर्षीय बुजुर्ग मरीज को बाईपास सर्जरी के बाद समय से पहले अस्पताल से छुट्टी देने और उसके बाद हुई लापरवाही के मामले में मध्य प्रदेश राज्य उपभोक्ता आयोग ने मुंबई के मशहूर एशियन हार्ट इंस्टीट्यूट एंड रिसर्च सेंटर के खिलाफ जिला उपभोक्ता फोरम के फैसले को सही ठहराया है। आयोग ने अस्पताल पर लगे 3.10 लाख रुपये के जुर्माने और हर्जाने के आदेश को बरकरार रखा है।

राज्य उपभोक्ता आयोग की अध्यक्ष न्यायमूर्ति (सेवानिवृत्त) सुनीता यादव और सदस्य डॉ. मलिक की पीठ ने इस मामले में अस्पताल और पीड़ित मरीज डॉ. विनय सिंह यादव, दोनों की अपीलों को खारिज कर दिया। दमोह जिला उपभोक्ता विवाद निवारण आयोग ने 24 जुलाई 2023 को अस्पताल को सेवा में कमी का दोषी पाते हुए मुआवजा देने का आदेश दिया था। जहां एक ओर मरीज ने मुआवजे की राशि बढ़ाने की मांग की थी, वहीं अस्पताल ने जिला फोरम के फैसले को चुनौती देते हुए याचिका दायर की थी।

डिस्चार्ज के कुछ ही घंटों बाद आईसीयू में दोबारा भर्ती

मध्य प्रदेश के दमोह के रहने वाले डॉ. विनय सिंह यादव की जबलपुर में एंजियोग्राफी हुई थी, जिसमें उनकी दिल की तीनों मुख्य धमनियों में ब्लॉकेज पाया गया था। इसके बाद उन्होंने 27 जुलाई 2019 को मुंबई के एशियन हार्ट इंस्टीट्यूट में बाईपास सर्जरी कराई। करीब दो सप्ताह तक अस्पताल में रहने के बाद उन्हें 7 अगस्त 2019 को डिस्चार्ज कर दिया गया।

लेकिन अस्पताल से छुट्टी मिलने के महज 12 घंटे के भीतर उनकी तबीयत गंभीर रूप से बिगड़ गई। उन्हें सांस लेने में तेज तकलीफ होने लगी और शरीर में ऑक्सीजन का स्तर घटकर 50 प्रतिशत से भी नीचे चला गया। इस आपातकालीन स्थिति में उन्हें आनन-फानन में 8 अगस्त 2019 को दोबारा उसी अस्पताल के आईसीयू में भर्ती कराना पड़ा।

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अस्पताल पर मनमाना बिल वसूलने और लापरवाही के आरोप

डॉ. यादव ने उपभोक्ता फोरम में शिकायत दर्ज कराते हुए आरोप लगाया कि उनकी नाजुक हालत होने के बावजूद अस्पताल प्रबंधन ने उन्हें समय से पहले छुट्टी दे दी। उन्होंने अस्पताल पर अत्यधिक बिल वसूलने का भी आरोप लगाया। डॉ. यादव के अनुसार, उन्हें पहले सर्जरी का पूरा पैकेज करीब 9 लाख रुपये का बताया गया था, लेकिन पहली बार भर्ती रहने के दौरान उनसे 14.85 लाख रुपये वसूले गए। इसके बाद आपातकालीन स्थिति में दोबारा भर्ती होने पर अस्पताल ने 1.46 लाख रुपये का अतिरिक्त बिल थमा दिया।

मरीज ने यह भी आरोप लगाया कि ऑपरेशन के बाद उनके दाहिने हाथ में तेज दर्द और सूजन थी, लेकिन डॉक्टरों ने बार-बार शिकायत करने के बावजूद इस पर ध्यान नहीं दिया। बाद में जब उन्होंने वीनस डॉपलर जांच कराई, तो पता चला कि हाथ की रक्त वाहिकाएं क्षतिग्रस्त हो चुकी थीं।

अस्पताल की दलीलें और मेडिकल रिकॉर्ड्स में विरोधाभास

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दूसरी तरफ, एशियन हार्ट इंस्टीट्यूट ने इन आरोपों को खारिज करते हुए तर्क दिया कि मरीज पहले से ही मधुमेह (डायबिटीज), उच्च रक्तचाप (हाइपरटेंशन), कमजोर किडनी और धूम्रपान की आदत जैसी बीमारियों से पीड़ित थे, जिससे वे बेहद संवेदनशील श्रेणी में थे। अस्पताल का कहना था कि इसी वजह से उन्हें 7 दिनों के सामान्य पैकेज के बजाय 14 दिनों तक भर्ती रखना पड़ा, जिससे कुल खर्च बढ़ गया। अस्पताल ने दोबारा भर्ती करने का कारण मरीज को ब्रोंकोस्पास्म (सांस की नली में ऐंठन) और फेफड़ों के पुराने रोग (सीओपीडी) से जुड़ा संक्रमण बताया।

हालांकि, राज्य उपभोक्ता आयोग ने जब अस्पताल के ही मेडिकल दस्तावेजों की जांच की, तो अस्पताल के दावे कमजोर साबित हुए। आयोग ने पाया कि पहले डिस्चार्ज समरी में मरीज के श्वसन तंत्र को पूरी तरह सामान्य बताया गया था और उसमें फेफड़ों में किसी भी तरह के संक्रमण का कोई उल्लेख नहीं था। साथ ही, डिस्चार्ज के समय लिखी गई 21 दवाओं में एक भी एंटीबायोटिक शामिल नहीं थी।

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दूसरी डिस्चार्ज समरी में भी मरीज को पहले से सीओपीडी या फेफड़ों की बीमारी होने का कोई इतिहास दर्ज नहीं था। अस्पताल के दावों के विपरीत, दोबारा भर्ती होने पर की गई जांच में भी उनका श्वसन तंत्र सामान्य पाया गया और एचआरसीटी (HRCT) चेस्ट स्कैन में किसी संक्रमण की जगह पल्मोनरी इंटरस्टिशियल एडिमा (फेफड़ों में पानी भरना या सूजन) की पुष्टि हुई थी।

आयोग का अंतिम निर्णय

राज्य उपभोक्ता आयोग ने अपने फैसले में स्पष्ट किया कि अस्पताल के पास अपने दावों को साबित करने के लिए कोई ठोस मेडिकल साक्ष्य उपलब्ध नहीं हैं। आयोग ने जिला फोरम के फैसले से सहमति जताते हुए कहा कि गंभीर हालत को देखते हुए मरीज को अस्पताल में कुछ और समय तक डॉक्टरों की निगरानी में रखा जाना चाहिए था। हालांकि, आयोग ने मुआवजे की राशि बढ़ाने की डॉ. यादव की अपील को खारिज करते हुए जिला फोरम द्वारा तय किए गए 3.10 लाख रुपये के मुआवजे को पर्याप्त माना।

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