प्रमोशन में आरक्षण पाकर आगे बढ़ने वाले अनुसूचित जाति (एससी) और अनुसूचित जनजाति (एसटी) वर्ग के रेल कर्मचारियों के लिए आंध्र प्रदेश हाईकोर्ट से बड़ी खबर आई है। हाईकोर्ट ने इन कर्मचारियों को मिलने वाली परिणामी वरिष्ठता (कॉन्सीक्वेंशियल सीनियरिटी) के अधिकार को पूरी तरह से वैध माना है। इसके साथ ही कोर्ट ने कहा है कि समाज के वंचित वर्गों को मुख्यधारा में लाने और उन्हें बराबरी का हक देने के लिए ऐसे कदम बेहद जरूरी हैं।
जस्टिस बट्टू देवानंद और जस्टिस सुभेंदु सामंत की खंडपीठ ने 17 जुलाई को यह फैसला सुनाया। इस फैसले के जरिए हाईकोर्ट ने केंद्रीय प्रशासनिक न्यायाधिकरण (कैट) की हैदराबाद पीठ के 21 अक्टूबर 2024 के उस आदेश को रद्द कर दिया है, जिसमें दक्षिण मध्य रेलवे को लोको पायलट कैडर की वरिष्ठता सूची दोबारा तैयार करने और एससी/एसटी कर्मचारियों की परिणामी वरिष्ठता को खत्म करने का निर्देश दिया गया था।
संवैधानिक प्रावधान और वास्तविक समानता
सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि डॉ. बी.आर. आंबेडकर और हमारे संविधान निर्माताओं की सोच सिर्फ कागजी या औपचारिक समानता तक सीमित नहीं थी। संविधान का असली दर्शन समाज में ऐतिहासिक रूप से पिछड़े और शोषित वर्गों को मुख्यधारा में लाकर वास्तविक व व्यावहारिक समानता स्थापित करना है।
खंडपीठ ने कहा कि जब सुप्रीम कोर्ट द्वारा ‘एम. नागराज’ और ‘जरनैल सिंह’ मामलों में तय किए गए सभी संवैधानिक सुरक्षा उपाय पूरे कर लिए जाते हैं, तो प्रमोशन में परिणामी वरिष्ठता देना पूरी तरह से कानूनी रूप से सही और वैध है।
रेलवे ने पूरे किए थे सभी नियम
हाईकोर्ट ने दक्षिण मध्य रेलवे के आधिकारिक रिकॉर्ड की बारीकी से जांच करने के बाद कैट के उस दावे को सिरे से खारिज कर दिया, जिसमें कहा गया था कि रेलवे ने बिना संवैधानिक सुरक्षा नियमों को पूरा किए परिणामी वरिष्ठता का लाभ दिया था। अदालत ने पाया कि रेलवे प्रशासन ने प्रमोशन में आरक्षण देने से पहले सभी जरूरी आंकड़े जुटाए थे, संबंधित कैडर में एससी-एसटी कर्मचारियों के प्रतिनिधित्व का सही आकलन किया था और पोस्ट-बेस्ड रोस्टर प्रणाली का पूरी तरह से पालन किया था।
85वें संविधान संशोधन का प्रभाव
फैसले में रेखांकित किया गया कि संसद ने 85वें संविधान संशोधन के जरिए अनुच्छेद 16(4ए) में “परिणामी वरिष्ठता के साथ” शब्द जोड़कर इस कानूनी स्थिति को पूरी तरह स्पष्ट कर दिया था। इस संशोधन के बाद सुप्रीम कोर्ट द्वारा ‘वीरपाल सिंह चौहान’ और ‘अजीत सिंह’ मामलों में दिए गए ‘कैच-अप नियम’ का कानूनी आधार खत्म हो गया है, जिसके तहत सामान्य वर्ग के कर्मचारी बाद में प्रमोट होकर दोबारा सीनियर हो जाते थे।
क्या था पूरा विवाद
यह पूरा कानूनी विवाद दक्षिण मध्य रेलवे के लोको पायलटों के प्रमोशन से जुड़ा है। इसमें याचिकाकर्ता एससी/एसटी वर्ग के कर्मचारी थे जो लोको पायलट (मेल) के पद पर कार्यरत थे, जबकि प्रतिवादी सामान्य वर्ग के कर्मचारी थे जो लोको पायलट (पैसेंजर) के रूप में काम कर रहे थे।
रिकॉर्ड के अनुसार, 10 मार्च 2007 को जारी असिस्टेंट लोको पायलट की वरिष्ठता सूची में सामान्य वर्ग के कर्मचारी सीनियर थे। लेकिन इसके बाद आरक्षण नीति के तहत एससी/एसटी वर्ग के कर्मचारियों को पहले लोको पायलट (गुड्स) और फिर लोको पायलट (पैसेंजर) के पद पर त्वरित प्रमोशन (एक्सेलेरेटेड प्रमोशन) मिला। परिणामी वरिष्ठता मिलने के कारण वे सामान्य वर्ग के कर्मचारियों से सीनियर हो गए और आखिरकार लोको पायलट (मेल) के पद पर प्रमोट होने में सफल रहे। सामान्य वर्ग के कर्मचारियों ने इसे कैट में चुनौती दी थी, जहां 2024 में न्यायाधिकरण ने उनके पक्ष में फैसला सुनाया था।
योग्यता और सामान्य सीटों पर अधिकार
हाईकोर्ट ने अपने फैसले में यह भी स्पष्ट किया कि लोको पायलट (मेल) के पद पर खाली 23 सामान्य सीटों के लिए नए सिरे से आरक्षण लागू करने की कोई आवश्यकता नहीं थी। चूंकि यह पद असिस्टेंट लोको पायलट से शुरू होकर लोको पायलट (मेल) तक जाने वाली एक सतत पदोन्नति श्रृंखला का हिस्सा है, और याचिकाकर्ता पहले ही फीडर कैडर में कानूनी रूप से अपनी वरिष्ठता स्थापित कर चुके थे, इसलिए वे वरिष्ठता और योग्यता के आधार पर इन सामान्य सीटों पर विचार किए जाने के हकदार थे।
अदालत ने दोबारा दोहराया कि आरक्षित वर्ग के किसी भी योग्य उम्मीदवार को महज उसकी जाति के कारण सामान्य श्रेणी की सीट पर दावेदारी करने से नहीं रोका जा सकता। इसके साथ ही, मेरिट के आधार पर चुने गए आरक्षित वर्ग के उम्मीदवारों को आरक्षित कोटे की सीटों में नहीं गिना जा सकता।

