ग्रेटर बेंगलुरु टाउनशिप: बिदादी परियोजना के लिए भूमि अधिग्रहण के खिलाफ दायर याचिका हाईकोर्ट से खारिज

कर्नाटक हाईकोर्ट ने सोमवार को ग्रेटर बेंगलुरु इंटीग्रेटेड टाउनशिप (जीबीआईटी) परियोजना के लिए नौ गांवों की 7,400 एकड़ भूमि अधिग्रहित करने की अधिसूचना को चुनौती देने वाली जनहित याचिका (पीआईएल) को खारिज कर दिया। बिदादी टाउनशिप नाम से चर्चित यह परियोजना मुख्यमंत्री डी.के. शिवकुमार की महत्वाकांक्षी योजना मानी जाती है।

चीफ जस्टिस विभु बाखरू और जस्टिस के.एस. हेमलखा की खंडपीठ ने अधिवक्ता राजेश कंपलापुरा बसवन्ना द्वारा दायर याचिका पर सुनवाई करते हुए यह निर्णय सुनाया। हाईकोर्ट ने मौखिक रूप से टिप्पणी की कि अदालत उस योजना के औचित्य या गुणों पर फैसला नहीं कर सकती जिसके तहत जमीन का अधिग्रहण किया जा रहा है।

याचिकाकर्ता की मांगें और आपत्तियां

अदालत में व्यक्तिगत रूप से अपनी पैरवी कर रहे याचिकाकर्ता बसवन्ना ने कर्नाटक नगर विकास प्राधिकरण (कूडा) अधिनियम के तहत राज्य सरकार द्वारा 13 जून को जारी अंतिम भूमि अधिग्रहण अधिसूचना को रद्द करने और 16 जून से शुरू हुई निविदा (टेंडर) प्रक्रियाओं पर अंतरिम रोक लगाने की मांग की थी। इसके साथ ही याचिका में सरकार को एक विशेषज्ञ समिति गठित करने का निर्देश देने का भी अनुरोध किया गया था, जो यह जांच करे कि क्या इस टाउनशिप परियोजना को सतत विकास नीतियों के अनुरूप किसी अनुपजाऊ क्षेत्र में स्थापित किया जा सकता है।

किसानों के विरोध और कानूनी विसंगतियों का हवाला

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बसवन्ना ने दलील दी कि स्थानीय किसान इस भूमि अधिग्रहण के खिलाफ पिछले 500 से अधिक दिनों से लगातार विरोध प्रदर्शन कर रहे हैं। उन्होंने संविधान के अनुच्छेद 19 का हवाला देते हुए कहा कि किसानों को अपनी पसंद का पेशा चुनने और आजीविका चलाने का अधिकार है। वे खेती जारी रखना चाहते हैं और नहीं चाहते कि उनकी जमीन को किसी रियल एस्टेट प्रोजेक्ट में बदला जाए। याचिकाकर्ता ने आरोप लगाया कि इस परियोजना में कोई सार्वजनिक हित स्पष्ट नहीं है और सरकार ने भूमि अधिग्रहण की प्रारंभिक एवं अंतिम अधिसूचना जारी करने से पहले कोई सामाजिक प्रभाव मूल्यांकन (सोशल इम्पैक्ट असेसमेंट) अध्ययन भी नहीं कराया।

उन्होंने एक और कानूनी पहलू उठाते हुए तर्क दिया कि भूमि अधिग्रहण की अधिसूचना कूडा अधिनियम, 1987 के तहत जारी की गई है, जबकि जमीन गंवाने वालों को मुआवजा केंद्रीय भूमि अधिग्रहण कानून, 2013 (उचित मुआवजा और पारदर्शिता का अधिकार अधिनियम) के तहत दिया जा रहा है। याचिकाकर्ता का कहना था कि यदि मुआवजा केंद्रीय कानून के तहत मिल रहा है, तो इस अधिग्रहण में उस केंद्रीय कानून के अन्य सभी सुरक्षात्मक प्रावधानों का भी पालन किया जाना अनिवार्य है।

हाईकोर्ट ने कानूनी और राजनीतिक दलीलों को नकारा

हाईकोर्ट की खंडपीठ ने याचिकाकर्ता के इस कानूनी तर्क को पूरी तरह अस्वीकार कर दिया। अदालत ने स्पष्ट किया कि केवल मुआवजा तय करने के लिए 2013 के केंद्रीय अधिनियम के मानकों का उपयोग करने का यह अर्थ बिल्कुल नहीं है कि पूरी अधिग्रहण प्रक्रिया में भी उसी कानून का पालन किया जाए, क्योंकि मूल रूप से यह अधिग्रहण उस कानून के तहत नहीं किया गया है। खंडपीठ ने अपने लिखित आदेश में कहा कि वह याचिकाकर्ता की इस दलील को स्वीकार करने में असमर्थ है कि मुआवजा नीति के कारण यह अधिसूचना अवैध हो जाती है।

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सुनवाई के दौरान तब स्थिति गंभीर हो गई जब बसवन्ना ने यह टिप्पणी की कि अगले विधानसभा चुनाव के बाद बनने वाला नया मुख्यमंत्री इस योजना को दरकिनार या रद्द कर सकता है।

इस टिप्पणी पर हाईकोर्ट की पीठ ने तीखा ऐतराज जताया। जजों ने याचिकाकर्ता को चेतावनी दी कि यदि उन्होंने अदालत में राजनीतिक कयास लगाने या राजनीतिक बहस शुरू करने की कोशिश की, तो उन पर भारी जुर्माना लगाया जाएगा। पीठ ने स्पष्ट किया कि अदालत राजनीतिक चर्चा का मंच नहीं है और उसकी जिम्मेदारी केवल यह जांचने तक सीमित है कि याचिका का कोई वैध कानूनी आधार है या नहीं।

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