सुप्रीम कोर्ट ने एक ऐतिहासिक फैसले में स्पष्ट किया है कि राज्य सरकारों के पास कौशल के खेलों (गेम्स ऑफ स्किल) पर दांव लगाने और सट्टेबाजी को विनियमित तथा प्रतिबंधित करने की पूरी संवैधानिक शक्ति है। जस्टिस जे.बी. पारदीवाला और जस्टिस आर. महादेवन की खंडपीठ ने तमिलनाडु और कर्नाटक राज्यों द्वारा दायर अपीलों को स्वीकार करते हुए यह निर्णय दिया। सुप्रीम कोर्ट ने मद्रास हाईकोर्ट और कर्नाटक हाईकोर्ट के पिछले आदेशों को खारिज कर दिया, जिसके तहत राज्यों द्वारा लगाए गए ऑनलाइन गेमिंग प्रतिबंधों को असंवैधानिक घोषित किया गया था। कोर्ट ने माना कि जैसे ही किसी खेल में मौद्रिक दांव (स्टेक्स) शामिल हो जाते हैं, चाहे वह खेल कौशल पर आधारित हो या भाग्य पर, वह सट्टेबाजी और जुए के दायरे में आ जाता है, जिससे राज्य उस पर कानून बनाने के लिए सक्षम हो जाता है। यह निर्णय ऑनलाइन जुए के बढ़ते सामाजिक-आर्थिक जोखिमों को संबोधित करता है।
मामले की पृष्ठभूमि
यह विवाद तमिलनाडु और कर्नाटक राज्यों द्वारा ऑनलाइन स्पेस में तेजी से फैल रहे वर्चुअल गेमिंग को नियंत्रित करने के लिए किए गए विधायी प्रयासों से शुरू हुआ था।
तमिलनाडु में, राज्य विधानसभा ने तमिलनाडु गेमिंग एक्ट, 1930 में संशोधन करने के लिए ‘तमिलनाडु गेमिंग एंड पुलिस लॉज़ (संशोधन) एक्ट, 2021’ लागू किया था। इसका उद्देश्य ऑनलाइन सट्टेबाजी और वर्चुअल जुए के अड्डों पर रोक लगाना था। इसके तहत ‘गेमिंग’ की परिभाषा को संशोधित कर साइबरस्पेस में पैसे के लेनदेन के जरिए सट्टेबाजी करने को भी इसके दायरे में लाया गया। कानून की धारा 3-ए के तहत रम्मी और पोकर जैसे खेलों पर साइबरस्पेस में दांव लगाने पर पूर्ण प्रतिबंध लगा दिया गया। महत्वपूर्ण रूप से, धारा 11 को संशोधित कर कौशल के खेलों को मिलने वाली कानूनी सुरक्षा को समाप्त कर दिया गया, यदि वे खेल दांव लगाकर खेले जा रहे हों।
मद्रास हाईकोर्ट ने 3 अगस्त, 2021 को ‘जंगली गेम्स इंडिया प्राइवेट लिमिटेड बनाम तमिलनाडु राज्य’ के मामले में इस संशोधन कानून के भाग II को खारिज कर दिया था। हाईकोर्ट का मानना था कि राज्य सूची की प्रविष्टि (एंट्री) 34 के तहत ‘सट्टेबाजी और जुआ’ को एक साथ पढ़ा जाना चाहिए, जिससे कौशल के खेल इसके दायरे से बाहर हो जाते हैं। इसके बाद, तमिलनाडु ने साल 2022/2023 में नया कानून बनाया, जिसे हाईकोर्ट ने नवंबर 2023 में फिर से आंशिक रूप से खारिज कर दिया था।
दूसरी ओर, कर्नाटक में राज्य सरकार ने कर्नाटक पुलिस (संशोधन) एक्ट, 2021 के जरिए वर्ष 1963 के मूल कानून में संशोधन किया। इसमें भी ऑनलाइन गेमिंग की परिभाषा का विस्तार करते हुए कौशल के खेलों पर पैसा दांव पर लगाने को अपराध के दायरे में लाया गया। इसके तहत वर्चुअल प्लेटफॉर्म्स, साइबरस्पेस और मोबाइल ऐप्स को ‘स्थान’ और ‘गेमिंग के उपकरण’ की परिभाषा में शामिल किया गया था।
कर्नाटक हाईकोर्ट ने 14 फरवरी, 2022 को ‘ऑल इंडिया गेमिंग फेडरेशन बनाम कर्नाटक राज्य’ मामले में इन संशोधनों को असंवैधानिक बताते हुए रद्द कर दिया था। हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया था कि ‘सट्टेबाजी और जुआ’ को संयुक्त रूप से पढ़ा जाना चाहिए, जिससे कौशल आधारित खेल राज्य के विधायी अधिकार क्षेत्र से बाहर हो जाते हैं।
पक्षों के तर्क
राज्यों (अपीलकर्ताओं) की ओर से दलीलें
तमिलनाडु राज्य का पक्ष रखते हुए वरिष्ठ वकील कपिल सिब्बल ने दलील दी कि बढ़ती डिजिटलाइजेशन और ऑनलाइन गेमिंग की लत के कारण युवा पीढ़ी भारी कर्ज, मानसिक तनाव और आत्महत्या की ओर बढ़ रही है। उन्होंने विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) द्वारा ‘गेमिंग डिसऑर्डर’ को बीमारी के रूप में मान्यता दिए जाने का हवाला दिया। उन्होंने स्पष्ट किया कि राज्य सरकार की विधायी शक्तियां केवल एंट्री 34 (सट्टेबाजी और जुआ) से ही नहीं, बल्कि एंट्री 1 (लोक व्यवस्था) और एंट्री 6 (जन स्वास्थ्य) से भी आती हैं। उन्होंने कहा कि हाईकोर्ट ने पिछले फैसलों जैसे आरएमडीसी और के.आर. लक्ष्मणन मामले की गलत व्याख्या की है।
कर्नाटक की ओर से एडिशनल एडवोकेट जनरल प्रतीक के. चड्ढा ने दलील दी कि कानून कौशल के खेलों पर प्रतिबंध नहीं लगाता, बल्कि केवल उस प्रक्रिया को रोकता है जहां कौशल के नाम पर अनिश्चित परिणामों पर पैसा लगाया जाता है। उन्होंने कहा कि ऑनलाइन स्पेस में खिलाड़ियों के सामने एक अनिश्चितता का पर्दा होता है जहाँ उन्हें यह भी पता नहीं होता कि वे किसी वास्तविक इंसान के साथ खेल रहे हैं या एआई (आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस) बॉट्स के साथ, जो गेमिंग को पूरी तरह से जुए जैसी अराजक गतिविधि में बदल देता है।
गेमिंग कंपनियों (प्रतिवादियों) की ओर से दलीलें
डॉ. अभिषेक मनु सिंघवी, अरविंद पी. दातार, आर्यमा सुंदरम, मुकुल रोहतगी, नीरज किशन कौल और साजन पूवय्या जैसे वरिष्ठ वकीलों ने कंपनियों का पक्ष रखा। उनकी मुख्य दलीलें इस प्रकार थीं:
- संवैधानिक संरक्षण: कौशल आधारित खेल जैसे रम्मी, पोकर और फैंटेसी स्पोर्ट्स संविधान के अनुच्छेद 19(1)(जी) के तहत संरक्षित व्यावसायिक गतिविधियां हैं, जिन्हें गैर-वाणिज्यिक या अनैतिक व्यवसाय नहीं माना जा सकता।
- एंट्री 34 की व्याख्या: एंट्री 34 के तहत ‘सट्टेबाजी और जुआ’ को संयुक्त रूप से पढ़ा जाना चाहिए। सट्टेबाजी का मतलब केवल भाग्य आधारित खेलों (जुए) पर दांव लगाने से है। कौशल के खेलों पर पैसा लगाने से खेल का मूल चरित्र नहीं बदलता।
- न्यायिक उदाहरण: उन्होंने पुराने फैसलों पर भरोसा जताते हुए कहा कि कोर्ट ने हमेशा कौशल के खेलों को जुए के दायरे से बाहर रखा है, चाहे वे दांव लगाकर ही क्यों न खेले जा रहे हों।
- संसद का अधिकार क्षेत्र: इंटरनेट आधारित गेमिंग का विनियमन पूरी तरह से संसद के अधिकार क्षेत्र (यूनियन लिस्ट की एंट्री 31, 42 और 97) में आता है। आईटी मंत्रालय पहले ही इसके लिए नियम बना चुका है।
सुप्रीम कोर्ट का विश्लेषण
सुप्रीम कोर्ट ने राज्य सूची की एंट्री 34, पुराने न्यायिक उदाहरणों और लोक व्यवस्था (पब्लिक ऑर्डर) के सिद्धांतों का विस्तृत विश्लेषण किया।
एंट्री 34 का दायरा और हाईकोर्टों का रुख
सुप्रीम कोर्ट ने दोनों हाईकोर्टों के उस तर्क को सिरे से खारिज कर दिया जिसमें एंट्री 34 को केवल “जुए के खेलों पर सट्टेबाजी” तक सीमित कर दिया गया था। कोर्ट ने हाईकोर्ट के इस दृष्टिकोण को एक “संवैधानिक विसंगति, संविधान के साथ छेड़छाड़ या वास्तव में संवैधानिक पाठ को फिर से लिखना है जिसके लिए अदालतें अधिकृत नहीं हैं” करार दिया।
सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि आम बोलचाल में सट्टेबाजी और जुआ दोनों में एक ही मूल तत्व शामिल होता है—अनिश्चित परिणाम पर पैसा लगाना। पीठ ने टिप्पणी की:
“सट्टेबाजी और जुआ’ की अभिव्यक्ति को इस तरह विभाजित नहीं किया जा सकता कि केवल दांव लगाने का पहलू ही सट्टेबाजी माना जाए, जबकि जोखिम या संभावना का तत्व जुआ बन जाए।”
कोर्ट ने निष्कर्ष निकाला कि कौशल का खेल बिना दांव के खेले जाने पर वैध है, लेकिन दांव लगते ही इसकी सामाजिक प्रकृति बदल जाती है और यह सट्टेबाजी के दायरे में आ जाता है।
पुराने न्यायिक निर्णयों की व्याख्या
कंपनियों द्वारा पुराने मामलों पर जताई गई निर्भरता को कोर्ट ने गलत माना:
- आरएमडीसी (RMDC) मामले: कोर्ट ने स्पष्ट किया कि आरएमडीसी-I मामले में हैमिल्टन की हिदाया का एक उद्धरण स्वीकृत किया गया था, जिसमें लिखा है: “शतरंज, पासा या कोई अन्य खेल खेलना एक घृणित कार्य है; क्योंकि यदि कुछ भी दांव पर लगाया जाता है तो वह जुआ है, जो कुरान में स्पष्ट रूप से निषिद्ध है, और यदि दूसरी ओर, कुछ भी दांव पर न लगाया जाए तो वह व्यर्थ और निरर्थक है।” चूंकि शतरंज कौशल का खेल है, इसलिए यह उद्धरण साबित करता है कि दांव पर लगाया गया पैसा कौशल के खेल को भी जुआ बना देता है।
- के.आर. लक्ष्मणन मामला: कोर्ट ने स्पष्ट किया कि घुड़दौड़ पर सट्टेबाजी को दी गई छूट संबंधित राज्य सरकारों द्वारा स्वैच्छिक रूप से बनाए गए नियमों पर आधारित थी। इसके अतिरिक्त, घुड़दौड़ का दायरा एक बंद क्लब के भीतर तक सीमित था, जबकि ऑनलाइन गेमिंग का दायरा असीमित, अनियंत्रित और सीमाहीन है।
मनमाना व्यवहार और अनुच्छेद 14
कोर्ट ने निर्णय दिया कि राज्य के कानून किसी भी प्रकार से मनमाने नहीं हैं। राज्यों द्वारा ऑनलाइन दांव लगाने वाले खेलों को प्रतिबंधित करने का वर्गीकरण ठोस अध्ययनों और रिपोर्टों पर आधारित है, जिसका सीधा संबंध जनहानि को रोकने से है।
आनुपातिकता और मौलिक अधिकार
कोर्ट ने निर्णय दिया कि एक बार जब किसी गतिविधि को सट्टेबाजी और जुए के रूप में वर्गीकृत कर दिया जाता है, तो वह ‘रेज़ एक्स्ट्रा कॉमर्शियम’ (व्यापार के दायरे से बाहर) हो जाती है। ऐसे व्यवसायों को अनुच्छेद 14 या 19(1)(जी) के तहत कोई मौलिक अधिकार प्राप्त नहीं होता। पी.एन. कृष्ण लाल बनाम केरल राज्य मामले का हवाला देते हुए कोर्ट ने दोहराया:
“इसलिए, कोई भी सभ्य समाज इसे स्वीकार नहीं करेगा कि किसी नागरिक को ऐसी गतिविधियों में व्यापार या व्यवसाय करने का मौलिक अधिकार है जो प्रकृति में आपराधिक, अनैतिक, आपत्तिजनक और आम जनता के स्वास्थ्य, सुरक्षा और कल्याण के लिए हानिकारक हैं।”
चूंकि जुए के व्यवसाय का कोई मौलिक अधिकार नहीं है, इसलिए प्रतिबंधों की आनुपातिकता (प्रोपर्शनेलिटी) का परीक्षण इन पर लागू नहीं होता और राज्य इस पर पूर्ण प्रतिबंध लगा सकते हैं।
लोक व्यवस्था (पब्लिक ऑर्डर) और जन स्वास्थ्य
सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि राज्यों के पास लोक व्यवस्था (एंट्री 1) और जन स्वास्थ्य (एंट्री 6) के तहत भी इस कानून को बनाने की पूरी विधायी क्षमता है। तकनीकी क्रांति के इस युग में प्रत्येक मोबाइल फोन अब “एक वर्चुअल कॉमन गैंबलिंग हाउस और गेमिंग का उपकरण” बन चुका है।
इस आसान पहुंच ने आर्थिक तबाही और युवाओं में मानसिक विकृतियों को जन्म दिया है, जिससे समाज की शांति भंग हो रही है। कोर्ट ने गंभीर टिप्पणी करते हुए कहा:
“लत के मामले में, मौद्रिक नुकसान के मामले में और परिणामी व्यापक आत्महत्याओं के मामले में, ऑनलाइन मनी गेमिंग का जनता पर निश्चित प्रभाव पड़ता है। जब ऐसा मामला है, तो यह स्वीकार करना होगा कि ऑनलाइन मनी गेमिंग सट्टेबाजी और जुए को अधिक सामान्य और सुलभ बनाकर जनता की शांति को अशांत कर रहा है। इसलिए, सार्वजनिक शांति भंग होती है और परिणामस्वरूप, राज्यों के पास लोक व्यवस्था का आह्वान करने और इस बुराई को रोकने और सार्वजनिक शांति बहाल करने की क्षमता होगी।”
कोर्ट ने कहा कि राज्य सरकारें अपने नागरिकों के अभिभावक (पेरेंस पैट्रिया) के रूप में ऐसे विनाशकारी संकटों से समाज को बचाने के लिए पूरी तरह सक्षम हैं।
कोर्ट का निर्णय
सुप्रीम कोर्ट ने तमिलनाडु और कर्नाटक राज्यों द्वारा दायर सभी अपीलों को स्वीकार कर लिया। हाईकोर्टों के आदेशों को निरस्त करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने निम्नलिखित कानूनी प्रावधानों को पूर्णतः संवैधानिक और वैध घोषित किया:
- तमिलनाडु गेमिंग एंड पुलिस लॉज़ (संशोधन) एक्ट, 2021 का भाग II।
- तमिलनाडु ऑनलाइन जुआ निषेध और ऑनलाइन गेमिंग विनियमन अधिनियम, 2022/2023 के प्रावधान।
- कर्नाटक पुलिस (संशोधन) अधिनियम, 2021 की धाराएं 2, 3, 6, 8 और 9।
सुनवाई के दौरान कोर्ट ने पक्षों पर कोई जुर्माना या खर्च नहीं लगाया।
मामले का विवरण
मामले का शीर्षक: स्टेट ऑफ तमिलनाडु और अन्य बनाम जंगली गेम्स इंडिया प्राइवेट लिमिटेड और अन्य
वाद संख्या: सिविल अपील संख्या 6124-6131/2023, सिविल अपील संख्या 8275-8279/2026, Civil Appeal Nos. 6132-6143 of 2023, और सिविल अपील संख्या 6144/2023
पीठ: जस्टिस जे.बी. पारदीवाला और जस्टिस आर. महादेवन
निर्णय की तिथि: 27 मई 2026

