सुप्रीम कोर्ट ने एक ऐतिहासिक निर्णय में स्पष्ट किया है कि टाउन पंचायतों (नगर पंचायतों) के नामांकित सदस्यों के पास स्थानीय प्राधिकारी निर्वाचन क्षेत्र से राज्य विधान परिषद के चुनाव में मतदान करने का कोई संवैधानिक अधिकार नहीं है। चीफ जस्टिस सूर्य कांत, जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस विपुल एम. पंचोली की तीन सदस्यीय पीठ ने कर्नाटक हाईकोर्ट के उस फैसले को बरकरार रखा जिसने मतदाता सूची में नामांकित सदस्यों को शामिल करने को अवैध घोषित किया था और विधान परिषद के चुनाव परिणाम को रद्द करने के निर्देश दिए थे। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि संविधान के तहत नामांकित नगर निकाय सदस्यों की भूमिका केवल सलाहकार और परामर्शदाता की होती है, और उन्हें ऐसे विधायी चुनावों में मतदान का अधिकार देने से लोकतांत्रिक विकेंद्रीकरण की मूल भावना कमजोर होगी।
विवाद की पृष्ठभूमि
यह विवाद साल 2021 में कर्नाटक विधान परिषद के लिए ’12-चिकमगलूर स्थानीय प्राधिकारी निर्वाचन क्षेत्र’ से हुए चुनाव से शुरू हुआ था। इस निर्वाचन क्षेत्र में जिला पंचायत, तालुका पंचायत, नगर परिषद और टाउन पंचायतों सहित विभिन्न स्थानीय निकायों के प्रतिनिधि शामिल होते हैं। इस निर्वाचन क्षेत्र के अंतर्गत आने वाली चार टाउन पंचायतों—कोप्पा, मुदिगेरे, श्रृंगेरी और नरसिम्हाराजपुरा—में राज्य सरकार ने कर्नाटक नगरपालिका अधिनियम, 1964 (KMA) की धारा 352(1)(b) के तहत तीन-तीन सदस्यों को नामांकित किया था। इस तरह कुल 12 नामांकित पार्षदों के नाम मतदाता सूची में जोड़ दिए गए थे।
दिसंबर 2021 में हुए चुनाव के बाद जब मतों की गिनती हुई, तो मुख्य उम्मीदवार प्राणेश एम.के. को कुल 1188 वोट मिले (जिसमें इन नामांकित सदस्यों के वोट भी शामिल थे)। वहीं उनके प्रतिद्वंद्वी शांतेगौड़ा को 1182 वोट मिले। प्राणेश को केवल 6 वोटों के बेहद मामूली अंतर से विजयी घोषित किया गया। इसके बाद, नामांकित सदस्यों को मतदाता सूची में शामिल करने और उनके मतदान के अधिकार को कर्नाटक हाईकोर्ट में रिट याचिकाओं के जरिए चुनौती दी गई।
हाईकोर्ट के सिंगल जज ने 3 नवंबर, 2022 को नामांकित सदस्यों के नाम शामिल करने को असंवैधानिक मानते हुए उन्हें मतदाता सूची से हटाने का निर्देश दिया था। इस फैसले को 20 अप्रैल, 2023 को हाईकोर्ट की डिवीजन बेंच ने भी सही ठहराया। समानांतर रूप से, चुनाव याचिकाएं भी दायर की गईं, जिनमें तर्क दिया गया कि नामांकित सदस्यों द्वारा डाले गए 12 अवैध वोटों ने चुनाव परिणाम को सीधे तौर पर प्रभावित किया है। 29 जनवरी, 2025 को हाईकोर्ट ने मतपेटियों को खोलने, इन 12 वोटों को अलग करने और उन्हें हटाकर दोबारा मतगणना करने का निर्देश दिया। इसके बाद प्राणेश एम.के. ने सुप्रीम कोर्ट का रुख किया, जिसने दोबारा मतगणना की अनुमति तो दे दी, लेकिन नतीजों को सीलबंद लिफाफे में पेश करने का निर्देश दिया था।
पक्षों की दलीलें
अपीलकर्ता प्राणेश एम.के. की ओर से पेश वरिष्ठ वकीलों ने तर्क दिया कि एक बार जब मतदाता सूची को अंतिम रूप दे दिया जाता है, तो लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1950 की धारा 16 के तहत केवल सीमित आधारों (अयोग्यता) पर ही चुनाव याचिका में इस पर सवाल उठाया जा सकता है। अपनी बात के समर्थन में उन्होंने हरि प्रसाद मूलशंकर त्रिवेदी बनाम वी.बी. राजू और कुंवर नृपेंद्र बहादुर बनाम भारत संघ मामलों के फैसलों का हवाला दिया। उन्होंने यह भी तर्क दिया कि भले ही अयोग्य मतदाताओं ने भाग लिया हो, चुनाव को अपने आप रद्द नहीं किया जाना चाहिए। इसके लिए उन्होंने श्यामदेव प्रसाद सिंह बनाम नवल किशोर यादव, पी. शारदम्मा बनाम मारीथिब्बेगौड़ा, गायत्री देवी बनाम सुमन देवी और रूपलाल मेहता बनाम धन सिंह जैसे मामलों पर भरोसा जताया।
अपीलकर्ता ने यह भी दलील दी कि दोबारा मतगणना केवल असाधारण परिस्थितियों में और विशिष्ट आधारों पर ही की होनी चाहिए। संरचनात्मक रूप से उनका तर्क था कि अनुच्छेद 243-R और कर्नाटक नगरपालिका अधिनियम की धारा 352 के तहत नामांकित सदस्यों पर रोक केवल नगर निकाय की बैठकों में मतदान करने तक सीमित है, और इसका विस्तार विधान परिषद के चुनावों पर नहीं किया जा सकता। इसके अतिरिक्त, उनका कहना था कि वोटों को अलग करने से मतदान की गोपनीयता का उल्लंघन होगा।
दूसरी ओर, प्रतिवादियों के वकीलों ने तर्क दिया कि नामांकित सदस्यों के पास कोई संवैधानिक मतदान अधिकार नहीं है और मतदाता सूची में उनका नाम जोड़ना शुरुआत से ही अमान्य (void ab initio) था। उन्होंने दलील दी कि रिट याचिकाएं पूरी तरह से विचारणीय थीं क्योंकि चुनाव पूर्व कोई प्रभावी वैधानिक अपील का विकल्प उपलब्ध नहीं था। उन्होंने एन.पी. पोन्नुस्वामी बनाम रिटर्निंग ऑफिसर, धामपुर शुगर मिल्स लिमिटेड बनाम उत्तर प्रदेश राज्य और राम एंड श्याम कंपनी बनाम हरियाणा राज्य का हवाला दिया।
उनका कहना था कि 1950 के अधिनियम के तहत “प्रत्येक सदस्य” शब्द को संविधान के अनुच्छेद 243-R के साथ मिलाकर सामंजस्यपूर्ण ढंग से पढ़ा जाना चाहिए, जो निर्णय लेने का अधिकार केवल निर्वाचित प्रतिनिधियों को देता है। चूंकि जीत का अंतर केवल 6 वोट था और अवैध वोट 12 थे, इसलिए चुनाव परिणाम स्पष्ट रूप से और गंभीर रूप से प्रभावित हुआ था।
भारत संघ की ओर से पेश एडिशनल सॉलिसिटर जनरल के.एम. नटराज ने मुख्य कानूनी पहलुओं तक ही अपनी बात सीमित रखी। उन्होंने तर्क दिया कि अनुच्छेद 171(3)(a) में केवल “सदस्य” शब्द का इस्तेमाल किया गया है, जिसमें निर्वाचित और नामांकित सदस्यों के बीच कोई अंतर नहीं किया गया है। उन्होंने यह भी कहा कि एक बार मतदाता सूची फाइनल होने के बाद चुनाव उसी आधार पर होना चाहिए।
कोर्ट का विश्लेषण और टिप्पणियां
सुप्रीम कोर्ट ने सबसे पहले रिट याचिकाओं की विचारणीयता को सही ठहराया। कोर्ट ने कहा कि यह चुनौती चुनाव प्रक्रिया को नहीं बल्कि मतदाता सूची के बुनियादी गठन को दी गई थी। चूंकि जिला मजिस्ट्रेट ही मतदाता सूची तैयार करता है और वही अपीलीय प्राधिकारी भी है, इसलिए कोई अन्य वैधानिक उपाय व्यावहारिक नहीं था।
मुख्य कानूनी मुद्दे पर आते हुए कोर्ट ने अपीलकर्ता की उस दलील को खारिज कर दिया जिसमें संविधान के अनुच्छेद 171(3)(a) और 1950 के अधिनियम की धारा 27(2)(b) की केवल शाब्दिक व्याख्या की मांग की गई थी। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि संवैधानिक प्रावधानों की व्याख्या 74वें संविधान संशोधन के आलोक में की जानी चाहिए, जिसने स्थानीय स्वशासन की स्थापना की थी।
कोर्ट ने अपनी टिप्पणी में कहा: “संवैधानिक प्रावधानों को अलग-थलग करके या संवैधानिक ढांचे से अलग विशुद्ध रूप से शाब्दिक दृष्टिकोण अपनाकर नहीं समझा जा सकता है, और प्रत्येक प्रावधान की व्याख्या इस तरह से सामंजस्यपूर्ण रूप से की जानी चाहिए ताकि संविधान को एक सुसंगत इकाई के रूप में प्रभावी बनाया जा सके।”
अनुच्छेद 243-R और कर्नाटक नगरपालिका अधिनियम की धारा 352 के तहत नामांकित सदस्यों को बैठकों में मतदान करने से स्पष्ट रूप से रोका गया है क्योंकि उन्हें विशेषज्ञता के लिए नियुक्त किया जाता है, न कि लोकतांत्रिक प्रतिनिधित्व के जनादेश के तहत।
अदालत ने कहा: “इसलिए, निर्वाचित और नामांकित सदस्यों के बीच संवैधानिक अंतर स्पष्ट और जानबूझकर किया गया है, क्योंकि निर्वाचित सदस्य निर्वाचक मंडल के लोकतांत्रिक जनादेश से अपना अधिकार प्राप्त करते हैं और लोगों की इच्छा का प्रतिनिधित्व करते हैं।”
अपीलकर्ता के तर्कों में अंतर्विरोध को उजागर करते हुए कोर्ट ने टिप्पणी की: “यदि संविधान के अनुच्छेद 171(3)(a) की शाब्दिक व्याख्या इस प्रकार की जाए कि उसमें नामांकित सदस्य भी शामिल हों, तो एक अनुचित परिणाम सामने आएगा, यानी, एक नामांकित सदस्य जिसे संविधान द्वारा नगरपालिका की अपनी निर्णय लेने की प्रक्रिया में मतदान करने की अनुमति नहीं है, उसे फिर भी विधान परिषद के सदस्य के चुनाव में मतदान करने की अनुमति मिल जाएगी।”
पीठ ने आगे जोड़ा: “अनुच्छेद 171(3)(a) का उद्देश्य केवल स्थानीय प्राधिकरणों को संस्थाओं के रूप में प्रतिनिधित्व देना नहीं है, बल्कि विधान परिषद में लोकतांत्रिक रूप से निर्वाचित स्थानीय स्वशासी निकायों का प्रतिनिधित्व सुनिश्चित करना है। चूंकि नामांकित सदस्य लोकतांत्रिक रूप से निर्वाचित नहीं होते हैं और नगरपालिका के मामलों में मतदान नहीं कर सकते हैं, इसलिए उन्हें विधान परिषद चुनावों में भाग लेने की अनुमति देने से चुनावी प्रक्रिया की लोकतांत्रिक प्रकृति कमजोर होगी और स्थानीय स्वशासन को मजबूत करने के संवैधानिक उद्देश्य के खिलाफ जाएगी।”
अदालत ने रमेश मेहता बनाम सांवल चंद सिंघवी और शैली ओबेरॉय बनाम दिल्ली उपराज्यपाल मामलों का हवाला देते हुए निष्कर्ष निकाला कि दोनों जगह “सदस्य” शब्द का अर्थ केवल उन निर्वाचित प्रतिनिधियों से है जिन्हें संबंधित स्थानीय निकायों में मतदान का अधिकार प्राप्त है।
मतदान की गोपनीयता और दोबारा गिनती के मुद्दे पर सुप्रीम कोर्ट ने माना कि चूंकि जीत का अंतर 6 वोट था और नामांकित सदस्यों द्वारा डाले गए वोट 12 थे, इसलिए चुनाव परिणाम पर सीधा प्रभाव पड़ा था। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि यद्यपि मतपत्रों की गोपनीयता महत्वपूर्ण है, लेकिन इसका उपयोग किसी संवैधानिक अवैधता को छिपाने या चुनाव की शुचिता को नुकसान पहुंचाने के लिए नहीं किया जा सकता है।
अंतिम निर्णय
सुप्रीम कोर्ट को कर्नाटक हाईकोर्ट के फैसलों में कोई त्रुटि या अधिकार क्षेत्र का उल्लंघन नहीं मिला। कोर्ट ने सभी अपीलों को खारिज करते हुए पुष्टि की कि कर्नाटक नगरपालिका अधिनियम की धारा 352(1)(b) के तहत नियुक्त नामांकित सदस्य विधान परिषद के चुनावों में मतदान करने के पात्र नहीं हैं।
सुप्रीम कोर्ट की रजिस्ट्री को दोबारा मतगणना के परिणाम वाले सीलबंद लिफाफे को तुरंत कर्नाटक हाईकोर्ट के रजिस्ट्रार जनरल को भेजने का निर्देश दिया गया है। संबंधित अधिकारियों को हाईकोर्ट के दोबारा मतगणना के निर्देशों को 30 दिनों के भीतर पूरा करने और अंतिम रिपोर्ट सौंपने का आदेश दिया गया है।
मामले का विवरण
मामले का शीर्षक: प्राणेश एम.के. बनाम शांतेगौड़ा और अन्य
वाद संख्या: सिविल अपील संख्या 9032-9034/2026
पीठ: चीफ जस्टिस सूर्य कांत, जस्टिस जॉयमाल्या बागची, जस्टिस विपुल एम. पंचोली
निर्णय की तिथि: 16 जुलाई, 2026

