दिल्ली के एक उपभोक्ता आयोग ने मनिपाल सिग्ना हेल्थ इंश्योरेंस कंपनी के खिलाफ कड़ा रुख अपनाते हुए उस पर 14.6 लाख रुपये से अधिक का जुर्माना लगाया है। आयोग ने कंपनी द्वारा एक मृतक के बीमा दावे को खारिज किए जाने को पूरी तरह से मनमाना, अमानवीय और अतार्किक करार दिया। मामला एक ऐसे मरीज से जुड़ा है जिसकी अस्पताल में सीपीआर (कार्डियोपल्मोनरी रिससिटेशन) देने के दौरान मौत हो गई थी, और बीमा कंपनी ने दावा खारिज करने के लिए डॉक्टरों से ईसीजी और अन्य कार्डियक टेस्ट की रिपोर्ट मांगी थी।
उत्तरी दिल्ली जिला उपभोक्ता विवाद निवारण आयोग-I के अध्यक्ष दिव्य ज्योति जयपुरियार और सदस्य अश्वनी कुमार मेहता व हरप्रीत कौर चर्या की पीठ ने कनक लता और उनके दो नाबालिग बेटों की याचिका पर यह फैसला सुनाया। आयोग ने बीमा कंपनी मनिपाल सिग्ना को पॉलिसी के लाभ के रूप में 12.10 लाख रुपये का भुगतान 9 प्रतिशत वार्षिक साधारण ब्याज के साथ करने का निर्देश दिया। इसके साथ ही, अमानवीय और असंवेदनशील भाषा का इस्तेमाल करने के लिए कंपनी पर 5 लाख रुपये का अतिरिक्त दंडात्मक जुर्माना भी लगाया गया है।
इलाज के दौरान टेस्ट की मांग चिकित्सकीय रूप से असंभव
यह मामला अप्रैल 2021 में कोविड-19 महामारी के दौरान का है। पंकज श्रीवास्तव ने जून 2019 में इंडियाबुल्स रूरल फाइनेंस से 10.57 लाख रुपये का गृह ऋण (होम लोन) लिया था। इस ऋण के साथ ही 64,448 रुपये का एकमुश्त प्रीमियम देकर मनिपाल सिग्ना से एक ग्रुप इंश्योरेंस पॉलिसी ली गई थी। इस पॉलिसी के तहत गंभीर बीमारी या मृत्यु के लिए 7 लाख रुपये, बच्चों की शिक्षा निधि के लिए 5 लाख रुपये और अंतिम संस्कार के लिए 10,000 रुपये का कवर शामिल था, जिसमें उनकी पत्नी कनक लता को नामांकित किया गया था।
अप्रैल 2021 की शुरुआत में पंकज श्रीवास्तव की तबीयत खराब हुई। उन्हें बुखार और सांस लेने में गंभीर तकलीफ होने के बाद अरुणा आसफ अली सरकारी अस्पताल ले जाया गया। अस्पताल के रिकॉर्ड के अनुसार, जब उन्हें दोबारा अस्पताल लाया गया तो उनकी हालत बेहद नाजुक थी, ऑक्सीजन का स्तर बहुत कम था और नब्ज व रक्तचाप रिकॉर्ड नहीं हो पा रहे थे। डॉक्टरों ने तुरंत सीपीआर और अन्य आपातकालीन प्रयास शुरू किए, लेकिन उन्हें बचाया नहीं जा सका और 4 अप्रैल 2021 की रात 11:15 बजे उन्हें मृत घोषित कर दिया गया। मृत्यु प्रमाण पत्र में मौत का कारण ‘अचानक दिल का दौरा पड़ना’ (सडन कार्डियक अरेस्ट) दर्ज किया गया।
पंकज की मृत्यु के बाद उनकी पत्नी ने बीमा दावे के लिए आवेदन किया, लेकिन मनिपाल सिग्ना ने नवंबर 2021 में इसे खारिज कर दिया। कंपनी का तर्क था कि परिवार ईसीजी रिपोर्ट, ट्रॉपोनिन टेस्ट या पोस्ट-मॉर्टम रिपोर्ट देने में विफल रहा, जिससे यह साबित हो सके कि मौत दिल का दौरा पड़ने (मायोकार्डियल इन्फार्क्शन) से हुई थी। बीमा कंपनी ने दावा किया कि ‘अचानक दिल का दौरा पड़ना’ उनकी पॉलिसी के तहत कवर की गई गंभीर बीमारियों की सूची में शामिल नहीं है।
तकनीकी कमियों के आधार पर दावा खारिज नहीं कर सकतीं कंपनियां
उपभोक्ता आयोग ने बीमा कंपनी के इन तर्कों को पूरी तरह से खारिज कर दिया। आयोग ने स्पष्ट किया कि जब डॉक्टर किसी मरीज की जान बचाने के लिए आपातकालीन सीपीआर दे रहे हों, तो उस समय उनसे ईसीजी या अन्य जटिल टेस्ट करने की उम्मीद करना चिकित्सा विज्ञान और सामान्य मानवीय समझ के विपरीत है। आयोग ने यह भी साफ किया कि हर प्राकृतिक मौत के मामले में पोस्ट-मॉर्टम कराना अनिवार्य नहीं है, और इसकी अनुपस्थिति को दावा खारिज करने का आधार नहीं बनाया जा सकता।
पीठ ने इस बात को रेखांकित किया कि बीमा कंपनी ऐसे तकनीकी अंतरों को साबित करने के लिए कोई विशेषज्ञ चिकित्सा राय पेश नहीं कर सकी। इसके अलावा, पॉलिसी बेचते समय उपभोक्ताओं को इन सूक्ष्म तकनीकी अंतरों के बारे में कभी नहीं समझाया गया था। सुप्रीम कोर्ट के कई पुराने फैसलों का हवाला देते हुए आयोग ने स्पष्ट किया कि बीमा अनुबंधों की व्याख्या हमेशा पॉलिसीधारकों के पक्ष में की जानी चाहिए और इन्हें अत्यधिक तकनीकी आधारों पर खारिज नहीं किया जा सकता।
असंवेदनशील भाषा और वसूली प्रक्रियाओं पर कड़ी कार्रवाई
आयोग ने मनिपाल सिग्ना द्वारा जारी खारिज करने वाले पत्र में इस्तेमाल की गई भाषा पर भी कड़ा एतराज जताया। बीमा कंपनी ने पत्र में लिखा था कि “बीमित व्यक्ति पंकज श्रीवास्तव को मृत्यु की आदत थी।” इस टिप्पणी को आयोग ने व्याकरणिक रूप से बेहद अजीब, पूरी तरह अतार्किक और एक शोकाकुल विधवा के प्रति बेहद असंवेदनशील माना। आयोग ने कहा कि यह भाषा दर्शाती है कि कंपनी ने बिना सोचे-विचारे काम किया है, जिससे बीमा क्षेत्र पर जनता का भरोसा कमजोर होता है। इस रवैये के लिए मनिपाल सिग्ना पर 5 लाख रुपये का जुर्माना लगाया गया, जिसे 45 दिनों के भीतर उपभोक्ता कल्याण कोष में जमा करने का आदेश दिया गया है।
आयोग ने मनिपाल सिग्ना को 12.10 लाख रुपये के पॉलिसी लाभ के साथ-साथ कनक लता को हुई मानसिक प्रताड़ना के लिए 1 लाख रुपये और मुकदमा खर्च के रूप में 25,000 रुपये का भुगतान करने का निर्देश दिया। यह राशि 18 नवंबर 2021 से 9 प्रतिशत साधारण वार्षिक ब्याज के साथ दी जाएगी।
इसके अलावा, लोन देने वाली कंपनी इंडियाबुल्स रूरल फाइनेंस को भी आयोग ने अनुचित व्यापारिक प्रथाओं का दोषी पाया। बीमा दावा लंबित रहने के दौरान ही पीड़ित परिवार के खिलाफ कर्ज वसूली की कार्रवाई शुरू करने के लिए इंडियाबुल्स पर 1 लाख रुपये का मुआवजा और 25,000 रुपये का मुकदमा खर्च लगाया गया है। आयोग ने निर्देश दिया कि बीमा कंपनी पहले होम लोन की बकाया राशि का भुगतान सीधे लोन प्रदाता को करेगी और बची हुई राशि शिकायतकर्ताओं को जारी की जाएगी।

