एक महत्वपूर्ण फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि मृतक यात्री के पास से भौतिक यात्रा टिकट न मिलने मात्र से उसका ‘वास्तविक यात्री’ (bona fide passenger) होने का दर्जा समाप्त नहीं हो जाता और न ही इसके आधार पर उसके परिवार को मुआवजा देने से इनकार किया जा सकता है। एक सिविल अपील पर सुनवाई करते हुए जस्टिस संजय करोल और जस्टिस एन. कोटिस्वर सिंह की पीठ ने रेलवे क्लेम ट्रिब्यूनल और मध्य प्रदेश हाईकोर्ट के उस संयुक्त फैसले को खारिज कर दिया, जिसमें एक विधवा के दावे को नामंजूर कर दिया गया था। सुप्रीम कोर्ट ने अपील को स्वीकार करते हुए स्पष्ट किया कि यात्री होने का शुरुआती सबूत हलफनामा दायर करके दिया जा सकता है, और केंद्र सरकार को पीड़ित परिवार को 8,00,000 रुपये का मुआवजा देने का निर्देश दिया।
मामले की पृष्ठभूमि
यह मामला 28 नवंबर 2015 का है, जब चंद्रकांत ठक्कर ट्रेन संख्या 12834 (अहमदाबाद-हावड़ा मेल) से रायपुर से अहमदाबाद की यात्रा कर रहे थे। यात्रा के दौरान, खंडबारा-खातगांव रेल खंड के बीच वह चलती ट्रेन से गिर गए और गंभीर चोटों के कारण मौके पर ही उनकी मृत्यु हो गई।
उनकी पत्नी लता ने रेलवे क्लेम ट्रिब्यूनल एक्ट, 1987 के तहत एक दावा याचिका दायर कर 18% ब्याज के साथ 4,00,000 रुपये के मुआवजे की मांग की। उन्होंने बताया कि उनके पति व्यापार के सिलसिले में अहमदाबाद जा रहे थे और उनका टिकट उनके यात्रा बैग में रखा था, जो हादसे के बाद गायब हो गया और उसका कोई पता नहीं चल सका। हालांकि पुलिस को उनके पास से एक बटुआ मिला था जिसमें उनके बेटे बृजेश का संपर्क विवरण था, लेकिन उस बटुए में टिकट नहीं था।
रेलवे क्लेम ट्रिब्यूनल (RCT), भोपाल पीठ ने इस दावे को खारिज कर दिया था। हालांकि ट्रिब्यूनल ने यह स्वीकार किया कि यह हादसा रेलवे एक्ट, 1989 की धारा 123(c)(2) के तहत एक “अप्रिय घटना” था, लेकिन उसने माना कि बिना टिकट के मृतक के वास्तविक यात्री होने की पुष्टि नहीं की जा सकती। मध्य प्रदेश हाईकोर्ट (जबलपुर मुख्य पीठ) ने भी 3 जनवरी 2024 को ट्रिब्यूनल के इस फैसले पर सहमति जताते हुए अपील खारिज कर दी। हाईकोर्ट ने टिकट बरामद न होने और बोर्डिंग तथा दुर्घटना की तारीखों को लेकर पत्नी के बयानों में मामूली विसंगतियों का हवाला दिया था। इसके बाद याचिकाकर्ता ने सुप्रीम कोर्ट का रुख किया।
पक्षों के तर्क
याचिकाकर्ता की ओर से तर्क दिया गया कि मृतक वास्तव में एक वैध यात्री थे जिन्होंने टिकट खरीदा था, लेकिन दुर्घटना के दौरान उनका बैग खो जाने से टिकट भी गुम हो गया। उन्होंने दलील दी कि उन्होंने विस्तृत हलफनामा दायर कर अपना शुरुआती पक्ष और सबूत प्रस्तुत कर दिया था।
दूसरी ओर, प्रतिवादी (यूनियन ऑफ इंडिया) ने दलील दी कि कानूनन वैध टिकट की बरामदगी के बिना दावेदार यह साबित नहीं कर सकता कि मृतक यात्री था, और ऐसी स्थिति में रेलवे प्रशासन मुआवजा देने के लिए उत्तरदायी नहीं है।
सुप्रीम कोर्ट का विश्लेषण
रेलवे एक्ट, 1989 के कानूनी ढांचे का विश्लेषण करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि अधिनियम की धारा 124A “बिना किसी गलती के दायित्व” (no-fault liability) का प्रावधान करती है और इसका उद्देश्य जन-कल्याण करना है। कोर्ट ने रेखांकित किया कि प्रगतिशील और सामाजिक कल्याणकारी कानूनों की व्याख्या संकीर्ण या शाब्दिक होने के बजाय हमेशा उदार, उद्देश्यपूर्ण और व्यापक होनी चाहिए।
इस संबंध में कोर्ट ने सदरन इलेक्ट्रिसिटी सप्लाई कंपनी ऑफ उड़ीसा लिमिटेड बनाम श्री सीताराम राइस मिल, एक्स2 बनाम स्टेट (एनसीटी ऑफ दिल्ली) और वर्कमेन बनाम अमेरिकन एक्सप्रेस इंटरनेशनल बैंकिंग कॉर्पोरेशन जैसे कई पूर्व निर्णयों का हवाला दिया। कोर्ट ने इस बात को दोहराया कि:
“रोजी-रोटी से जुड़े कानूनों की व्याख्या में शाब्दिक बारीकियों की गुंजाइश नहीं होती। कल्याणकारी कानूनों की उदार व्याख्या की जानी ही चाहिए। जहां कानून किसी विशेष प्रकार के नुकसान से राहत देने के लिए बनाया गया है, वहां अदालत को व्याकरण संबंधी तर्क-वितर्क करके उसमें बाधा नहीं डालनी चाहिए।”
टिकट गुम होने की स्थिति में सबूत पेश करने की जिम्मेदारी के मुख्य मुद्दे पर कोर्ट ने यूनियन ऑफ इंडिया बनाम रीना देवी (जिसका बाद में डोली रानी साहा बनाम यूनियन ऑफ इंडिया और कामूकायी बनाम यूनियन ऑफ इंडिया में समर्थन किया गया था) के ऐतिहासिक फैसले पर भरोसा किया, जिसमें यह तय किया गया था कि:
“घायल या मृतक के पास टिकट न होना इस दावे को खारिज नहीं कर सकता कि वह एक वास्तविक यात्री था। शुरुआती जिम्मेदारी दावेदार पर होगी जिसे प्रासंगिक तथ्यों का हलफनामा देकर पूरा किया जा सकता है, जिसके बाद जिम्मेदारी रेलवे पर स्थानांतरित हो जाएगी और इस मुद्दे का फैसला दिखाए गए तथ्यों या उपस्थित परिस्थितियों के आधार पर किया जा सकता है।”
पीठ ने पाया कि याचिकाकर्ता ने अपना हलफनामा पेश कर अपनी शुरुआती जिम्मेदारी पूरी कर दी थी, जिससे जिम्मेदारी रेलवे पर आ गई थी। रेलवे यह साबित करने में पूरी तरह विफल रहा कि मृतक बिना टिकट यात्रा कर रहा था। कोर्ट ने संभावनाओं की प्रबलता के सिद्धांत के आधार पर दावेदार के पक्ष में निर्णय दिया।
इसके अलावा, कोर्ट ने भारतीय रेलवे कमर्शियल मैनुअल और ऑपरेटिंग मैनुअल का हवाला देते हुए टिप्पणी की कि रेलवे प्रशासन का यह कर्तव्य है कि वह विभिन्न स्तरों पर टिकटों की जांच करे और अनधिकृत या फुटबोर्ड पर यात्रा करने से रोके। कोर्ट ने कहा कि यदि रेलवे इन नियमों का सही ढंग से पालन करता, तो मृतक के टिकट की जांच का रिकॉर्ड मौजूद होता, जिससे पीड़ित परिवार को देश की सबसे बड़ी अदालत तक न्याय के लिए संघर्ष नहीं करना पड़ता।
अदालत ने ट्रेनों में अत्यधिक भीड़भाड़ (overcrowding) की पुरानी समस्या पर भी ध्यान दिलाया और मुंबई, दिल्ली, सूरत व चेन्नई जैसी जगहों पर भीड़ के कारण हुई मौतों की मीडिया रिपोर्टों का संदर्भ दिया। कोर्ट ने टिप्पणी की कि कागजों पर सुरक्षा के उपाय बेहतरीन दिखते हैं, लेकिन जमीन पर उनका क्रियान्वयन उम्मीद के मुताबिक नहीं है। कोर्ट ने सुझाव दिया कि रेलवे को सुरक्षा और श्रमशक्ति बढ़ाने के लिए देश के युवाओं को रोजगार देना चाहिए।
सामाजिक समानता पर एक प्रगतिशील टिप्पणी करते हुए कोर्ट ने मैनुअल में इस्तेमाल होने वाले “द्वितीय श्रेणी का यात्री” (second class passenger) शब्द की आलोचना की और सुझाव दिया कि:
“देश में वर्ग विभाजन के इतिहास को देखते हुए और भारत के संविधान की भावना के विपरीत होने के कारण, वर्ग की परिभाषा कोच से जोड़ी जानी चाहिए न कि यात्री से।”
कोर्ट का निर्णय
सुप्रीम कोर्ट ने माना कि निचले निकायों और हाईकोर्ट ने मुआवजा देने से इनकार करके भूल की है। कोर्ट ने अपील को स्वीकार करते हुए दोनों फैसलों को पूरी तरह से रद्द कर दिया।
कोर्ट ने रेलवे एक्सीडेंट्स एंड अनटुवर्ड इंसिडेंट्स (कंपनसेशन) रूल्स, 1990 के संशोधित प्रावधानों के अनुसार याचिकाकर्ता को 8,00,000 रुपये का मुआवजा देने का आदेश दिया। कोर्ट ने याचिकाकर्ता के वकील को बैंक खाते का विवरण एडिशनल सॉलिसिटर जनरल के कार्यालय को सौंपने का निर्देश दिया, जिसके बाद संबंधित विभाग को चार सप्ताह के भीतर मुआवजे की राशि खाते में भेजनी होगी। ऐसा न करने पर, मुआवजा राशि पर दावा याचिका दायर करने की तिथि (18 मार्च 2016) से भुगतान की तारीख तक 8% प्रति वर्ष की दर से ब्याज देय होगा।
मामले का विवरण
मामले का शीर्षक: लता बनाम यूनियन ऑफ इंडिया एवं अन्य
वाद संख्या: सिविल अपील संख्या… वर्ष 2026 (विशेष अनुमति याचिका (सिविल) संख्या 30726 वर्ष 2025 से उत्पन्न)
पीठ: जस्टिस संजय करोल और जस्टिस एन. कोटिस्वर सिंह
निर्णय की तिथि: 17 जुलाई 2026

