हिमाचल प्रदेश के कसौली में एक आवासीय परियोजना को समय पर पूरा न करने पर पंजाब राज्य उपभोक्ता विवाद निवारण आयोग ने कड़ा रुख अपनाया है। आयोग ने रियल एस्टेट डेवलपर ‘सुषमा लेज़र होम्स प्राइवेट लिमिटेड’ और उसके निदेशकों को दो घर खरीदारों की ओर से जमा कराए गए 80.38 लाख रुपये से अधिक की राशि 12 प्रतिशत वार्षिक ब्याज के साथ वापस करने का आदेश दिया है।
आयोग के अध्यक्ष जस्टिस राज शेखर अत्री और सदस्य प्रीतइंदर सिंह की पीठ ने खरीदारों को हुई मानसिक प्रताड़ना के मुआवजे के रूप में 75,000 रुपये और अदालती खर्च (मुकदमेबाजी खर्च) के लिए 35,000 रुपये का भुगतान करने का भी निर्देश दिया है। यह आदेश खरीदारों की उस शिकायत पर आया है जिसमें उन्होंने प्रोजेक्ट के निर्माण में अत्यधिक देरी का आरोप लगाया था।
सौदा और वित्तीय लेनदेन का विवरण
यह पूरा मामला सुरिंदर कौर और नवदीप सिंह मुल्तानी की शिकायत से जुड़ा है। उन्होंने कसौली स्थित ‘सुषमा एलीमेंटा’ प्रोजेक्ट के टावर-8 में एक फ्लैट बुक किया था। दोनों पक्षों के बीच 17 जून 2022 को 81.71 लाख रुपये की कुल कीमत में फ्लैट का सौदा तय हुआ और इससे संबंधित फ्लैट खरीदार समझौते (बायर एग्रीमेंट) पर हस्ताक्षर किए गए।
शिकायत के अनुसार, खरीदारों ने 29 अगस्त 2022 तक कुल 80.38 लाख रुपये का भुगतान (डाउन पेमेंट) कर दिया था। इसके बाद केवल 1.32 लाख रुपये की रकम बची थी, जिसका भुगतान कब्जा (पजेशन) मिलने के समय किया जाना था। समझौते के तहत डेवलपर को फ्लैट सौंपने तक खरीदारों को हर महीने 20,000 रुपये का सुनिश्चित किराया देना था, लेकिन जुलाई 2024 से डेवलपर ने इस किराए का भुगतान करना बंद कर दिया।
निर्माण में देरी और अदालती कार्यवाही
खरीदारों ने फरवरी 2026 में जब निर्माण स्थल का दौरा किया, तो वहां टावर-8 की केवल नींव का काम ही पूरा हो पाया था। मौके पर न तो कोई संपर्क सड़क बनी थी और न ही वादे के मुताबिक बुनियादी ढांचा तैयार था। बिल्डर द्वारा फ्लैट का निर्माण पूरा न करने, आवश्यक ऑक्यूपेशन या कंपीटीशन सर्टिफिकेट हासिल न करने और कब्जा न देने के कारण शिकायतकर्ताओं ने आयोग का दरवाजा खटखटाया और इसे सेवा में कमी व अनुचित व्यापार व्यवहार का मामला बताया।
आयोग की ओर से नोटिस भेजे जाने के बावजूद डेवलपर और उसके निदेशक अदालत में पेश नहीं हुए और न ही उनकी तरफ से कोई लिखित जवाब या सबूत पेश किया गया। इसके बाद आयोग ने इस मामले में उनके खिलाफ एकपक्षीय (एक्स-पार्टी) कार्यवाही करने का फैसला किया।
आयोग का अंतिम निर्णय और टिप्पणियां
मामले की अंतिम सुनवाई के दौरान खरीदारों के वकील ने प्रोजेक्ट के निर्माण में हो रही अत्यधिक देरी और अनिश्चितता को देखते हुए फ्लैट का कब्जा लेने की अपनी मुख्य मांग को छोड़ दिया। उन्होंने इसके बजाय ब्याज सहित पूरी जमा राशि वापस दिलाने की अपील की, जिसे आयोग ने स्वीकार कर लिया।
आयोग ने 24 जून को दिए अपने आदेश में कहा कि प्रतिवादियों का कार्यवाही से अनुपस्थित रहना यह साफ तौर पर दर्शाता है कि उन्हें शिकायतकर्ताओं के दावों का विरोध करने में कोई दिलचस्पी नहीं है। आयोग ने स्पष्ट किया कि रिकॉर्ड पर ऐसा कोई प्रमाण नहीं है जिससे यह साबित हो सके कि खरीदारों को फ्लैट का कब्जा देने की पेशकश की गई थी।
आयोग का कहना है कि ऐसी स्थिति में खरीदारों को बिल्डर की मनमर्जी के भरोसे अनिश्चितकाल तक इंतजार करने के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता। स्थापित कानूनी सिद्धांतों के अनुसार, कब्जे की तय तारीख बीत जाने के बाद खरीदार ब्याज और मुआवजे के साथ अपनी रकम वापस पाने के हकदार हैं।
आयोग ने डेवलपर और उसके निदेशकों को संयुक्त और व्यक्तिगत रूप से उत्तरदायी ठहराते हुए इस राशि का भुगतान करने का आदेश दिया। इसके साथ ही आयोग ने यह भी स्पष्ट किया है कि बिल्डर अंतिम भुगतान में से खरीदारों को पूर्व में भुगतान किए गए किसी भी सुनिश्चित रिटर्न या मासिक किराए की राशि को काटने के लिए स्वतंत्र होगा।

