कर्ज वापसी का तगादा करना आत्महत्या के लिए उकसाना नहीं: बॉम्बे हाईकोर्ट ने खारिज की छह लोगों के खिलाफ दर्ज एफआईआर

बॉम्बे हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में स्पष्ट किया है कि जानबूझकर रची गई साजिश या उकसावे के बिना, केवल कर्ज वापसी के लिए दबाव बनाने को आत्महत्या के लिए उकसाने का सीधा कारण नहीं माना जा सकता। इसके साथ ही अदालत ने छह लोगों के खिलाफ साल 2022 में दर्ज एफआईआर और मजिस्ट्रेट कोर्ट में चल रही आगे की कार्यवाही को खारिज कर दिया। मामले की सुनवाई के दौरान यह बड़ा तथ्य भी सामने आया कि पुलिस ने जिस व्यक्ति की जहर खाने से मौत का दावा किया था, वास्तव में उनकी मृत्यु दिल का दौरा पड़ने से हुई थी।

हाईकोर्ट की कोल्हापुर सर्किट बेंच के जस्टिस रंजितसिम्हा आर. भोसले ने यह निर्णय छह आरोपियों द्वारा दायर याचिका पर सुनवाई करते हुए सुनाया। इन आरोपियों के खिलाफ भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) की धारा 306 (आत्महत्या के लिए उकसाना) के तहत मामला दर्ज किया गया था।

मेडिकल जांच से खुला पुलिस के दावों का विरोधाभास

पुलिस ने अपनी शिकायत में आरोप लगाया था कि एक सेवानिवृत्त शिक्षक ने कर्ज वसूली के लिए की जा रही प्रताड़ना से तंग आकर जहर खाकर अपनी जान दे दी थी। हालांकि, मेडिकल साक्ष्यों ने पुलिस के इस दावे को पूरी तरह खारिज कर दिया। मृतक की पोस्टमार्टम और केमिकल एनालिसिस रिपोर्ट से यह साफ हुआ कि उनके शरीर में किसी भी तरह का जहरीला पदार्थ नहीं था और उनकी मौत दिल का दौरा पड़ने के कारण हुई थी।

आरोपियों की ओर से पैरवी कर रहे अधिवक्ता रूपेश बोबाडे ने अदालत में तर्क दिया कि आरोपियों और मृतक के बीच उकसाने का कोई सीधा संबंध नहीं था। उन्होंने पुलिस की चार्जशीट पर सवाल उठाते हुए कहा कि पुलिस ने दुर्भावनापूर्ण तरीके से यह दावा किया कि कर्ज वापसी के लगातार दबाव के चलते बने मानसिक तनाव के कारण व्यक्ति को दिल का दौरा पड़ा।

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क्या कानूनन उकसाने की श्रेणी में आता है?

जतनसिंह भोसले ने कानून के दायरे को स्पष्ट करते हुए कहा कि किसी व्यक्ति की सामान्य प्रतिक्रिया, या कभी-कभी गुस्से व आवेश में कही गई कोई तीखी बात उकसाने की श्रेणी में नहीं आती। आईपीसी की धारा 306 के तहत अपराध साबित करने के लिए यह आवश्यक है कि आरोपी ने पूरी सजगता, योजना और इरादे के साथ कोई ऐसा कदम उठाया हो, जिससे पीड़ित आत्महत्या करने पर मजबूर हो जाए।

अदालत ने आगे कहा कि यदि कोई बैंक कर्मचारी अपने काम के तहत या कानूनी दायरे में रहकर कर्जदार से बकाया राशि वसूलने का प्रयास करता है, तो उसे आत्महत्या के लिए उकसाना नहीं ठहराया जा सकता।

आम जीवन की सख्ती और उकसावे में अंतर

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हाईकोर्ट ने इस बात को दैनिक जीवन के उदाहरणों से समझाया। जस्टिस भोसले ने अपने फैसले में कहा कि निजी तौर पर दिए गए किसी मित्रवत कर्ज की वापसी के लिए बार-बार कहना, दफ्तर में अधिकारियों द्वारा दी जाने वाली डांट-फटकार, स्कूल में शिक्षक द्वारा दी जाने वाली चेतावनी या माता-पिता की सख्ती को आईपीसी की धारा 107 के तहत उकसाना नहीं माना जा सकता।

अदालत ने यह भी रेखांकित किया कि इस मामले में कोई सुसाइड नोट भी बरामद नहीं हुआ है। पुलिस के आरोपों को पूरी तरह सामान्य और अस्पष्ट बताते हुए हाईकोर्ट ने निष्कर्ष निकाला कि इस मामले में अभियोजन की कार्रवाई पूरी तरह से गलत और कानूनन टिकने योग्य नहीं थी।

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