आसाराम यौन उत्पीड़न मामला: सजा के खिलाफ अपील पर राजस्थान हाईकोर्ट ने फैसला सुरक्षित रखा

राजस्थान हाईकोर्ट ने सोमवार को स्वयंभू संत आसाराम की उस अपील पर अपना फैसला सुरक्षित रख लिया है, जिसमें उन्होंने 2013 के एक नाबालिग के यौन उत्पीड़न मामले में मिली उम्रकैद की सजा को चुनौती दी है। सुप्रीम कोर्ट द्वारा तय की गई समय-सीमा के भीतर हुई इस मैराथन सुनवाई का समापन इस लंबी कानूनी लड़ाई में एक अहम मोड़ माना जा रहा है।

जस्टिस अरुण मोंगा और जस्टिस योगेंद्र कुमार पुरोहित की खंडपीठ ने बचाव पक्ष और अभियोजन पक्ष की अंतिम दलीलों को सुनने के बाद कार्यवाही पूरी की। बचाव पक्ष की ओर से दलीलें इस महीने की शुरुआत में ही पूरी कर ली गई थीं, जबकि पीड़िता के वकील पी.सी. सोलंकी ने सोमवार को अपनी जवाबी दलीलें पेश कीं।

सुप्रीम कोर्ट ने दिसंबर 2025 में निर्देश दिया था कि इस मामले से जुड़ी सभी लंबित अपीलों का निपटारा तीन महीने के भीतर किया जाए। इसी निर्देश का पालन करते हुए हाईकोर्ट ने 16 फरवरी से इस मामले की डे-टू-डे (नियमित) सुनवाई शुरू की थी। कोर्ट ने स्पष्ट कर दिया था कि कार्यवाही में देरी को रोकने के लिए किसी भी पक्ष को अनावश्यक स्थगन नहीं दिया जाएगा।

यह पूरा विवाद साल 2013 का है, जब जोधपुर के पास मनाई गांव स्थित आश्रम में एक नाबालिग लड़की के साथ यौन उत्पीड़न के आरोप में आसाराम को गिरफ्तार किया गया था। अप्रैल 2018 में, जोधपुर की विशेष पोक्सो (POCSO) अदालत के तत्कालीन न्यायाधीश मधुसूदन शर्मा ने आसाराम को दोषी करार देते हुए ताउम्र कैद की सजा सुनाई थी।

इसी मुकदमे में सह-आरोपी शिवा और शिल्पी को भी 20-20 साल की जेल हुई थी, जबकि दो अन्य आरोपियों, शरद और प्रकाश को बरी कर दिया गया था। मामले के कुछ सह-आरोपी फिलहाल जमानत पर बाहर हैं, जबकि 85 वर्षीय आसाराम 29 अक्टूबर 2025 से स्वास्थ्य कारणों के आधार पर अंतरिम जमानत पर हैं।

मुख्य अपील के साथ-साथ, आसाराम ने खराब सेहत का हवाला देते हुए अपनी अंतरिम जमानत की अवधि बढ़ाने के लिए एक अलग आवेदन भी दायर किया था। मौजूदा राहत की अवधि समाप्त होने वाली थी, जिसे देखते हुए उनके वकीलों ने 15 अप्रैल को इस पर जल्द सुनवाई की मांग की थी।

हालांकि, हाईकोर्ट ने इस मामले में जल्द सुनवाई से इनकार करते हुए कहा कि जमानत अर्जी पर रजिस्ट्री द्वारा निर्धारित तय कार्यक्रम के अनुसार ही विचार किया जाएगा। अब सभी की निगाहें खंडपीठ के अंतिम फैसले पर टिकी हैं, जिससे यह तय होगा कि निचली अदालत द्वारा सुनाई गई उम्रकैद की सजा बरकरार रहेगी या नहीं।

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