सिविल विवाद की आड़ में संज्ञेय अपराध की जांच को नहीं रोका जा सकता: हाईकोर्ट

इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ पीठ ने मारपीट के आरोपियों के खिलाफ दर्ज एफआईआर (FIR) को रद्द करने से इनकार कर दिया है। हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि यदि आरोपों से प्रथम दृष्टया किसी संज्ञेय अपराध (Cognizable Offence) का होना प्रकट होता है, तो केवल इस आधार पर कार्यवाही नहीं रोकी जा सकती कि दोनों पक्षों के बीच कोई सिविल विवाद लंबित है।

जस्टिस अब्दुल मोइन और जस्टिस प्रमोद कुमार श्रीवास्तव की खंडपीठ ने कहा कि जांच के शुरुआती चरण में हाईकोर्ट को हस्तक्षेप नहीं करना चाहिए, खासकर तब जब आरोपों की गंभीरता अपराध की ओर इशारा करती हो।

इस मामले में याचिकाकर्ताओं का पक्ष वकील कीर्ति वीर सिंह, अभिषेक सिंह और रवि शंकर सिंह ने रखा। वहीं, प्रतिवादियों की ओर से सरकारी अधिवक्ता (G.A.) के साथ वकील अमन ठाकुर और विनीत त्रिपाठी पेश हुए।

मामले की पृष्ठभूमि

याचिकाकर्ता देवेंद्र कुमार सिंह और पांच अन्य ने सुल्तानपुर जिले के थाना करौंदीकलां में 24 मार्च 2026 को दर्ज एफआईआर संख्या 0042 को चुनौती दी थी। यह एफआईआर भारतीय न्याय संहिता (BNS), 2023 की धाराओं 3(5), 115(2), 352, 351(3) और 109 के तहत दर्ज की गई थी। आरोप था कि 22 मार्च 2026 को याचिकाकर्ताओं ने शिकायतकर्ता के बड़े भाई विद्या सागर और अन्य लोगों के साथ गंभीर मारपीट की, जिससे उन्हें चोटें आईं।

पक्षों की दलीलें

याचिकाकर्ताओं के वकील ने तर्क दिया कि चोटें “सामान्य प्रकृति” की थीं और बीएनएस की धारा 109 लगाना न्यायोचित नहीं है। उन्होंने यह भी कहा कि पक्षों के बीच सिविल विवाद चल रहा है और इस मामले को केवल “आपराधिक रंग” देने के लिए एफआईआर दर्ज कराई गई है। उन्होंने सुप्रीम कोर्ट के अनुकुल सिंह बनाम उत्तर प्रदेश राज्य (2025) मामले का हवाला देते हुए कहा कि पैसे के लेनदेन और दस्तावेजों से जुड़े विवाद पूरी तरह सिविल प्रकृति के होते हैं।

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इसके विपरीत, सरकारी अधिवक्ता और प्रतिवादी संख्या 3 के वकील श्री अमन ठाकुर ने मेडिकल रिपोर्ट पेश की। उन्होंने बताया कि पीड़ित विद्या सागर के सिर में चोट आई थी, जो मामले की गंभीरता को दर्शाती है। उन्होंने दलील दी कि एफआईआर में संज्ञेय अपराध का स्पष्ट उल्लेख है, इसलिए जांच जारी रहनी चाहिए।

हाईकोर्ट का विश्लेषण

हाईकोर्ट ने मेडिकल रिकॉर्ड और एफआईआर का अवलोकन करते हुए पाया कि पीड़ित के सिर में चोट लगने की बात सामने आई है, जो प्रथम दृष्टया संज्ञेय अपराध का संकेत देती है।

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सुप्रीम कोर्ट के सोमजीत मल्लिक बनाम झारखंड राज्य (2024) मामले का उल्लेख करते हुए हाईकोर्ट ने कहा:

“यह कानून का स्थापित सिद्धांत है कि एफआईआर सभी आरोपों का विश्वकोश (Encyclopedia) नहीं होती… संज्ञेय अपराध हुआ है या नहीं, यह देखने के लिए आरोपों की गंभीरता (Gravamen) को देखना चाहिए, न कि उसमें रह गई किसी कमी को।”

पीठ ने जोर दिया कि एफआईआर रद्द करने के चरण में कोर्ट को “मिनी ट्रायल” (छोटा विचारण) नहीं करना चाहिए। सिविल विवाद के तर्क पर कोर्ट ने अक्काम्मा सैम जैकब बनाम कर्नाटक राज्य (2026) मामले का संदर्भ दिया और कहा कि एक सिविल विवाद में भी आपराधिक तत्व शामिल हो सकता है।

हाईकोर्ट ने कहा:

“वर्तमान मामले में, भले ही पक्षों के बीच सिविल विवाद लंबित हो, लेकिन यह याचिकाकर्ताओं को गंभीर मारपीट करने का लाइसेंस नहीं देता है। पुलिस द्वारा भेजी गई चोटों की रिपोर्ट भी इनके गंभीर होने की पुष्टि करती है।”

इसके अलावा, कोर्ट ने गिरफ्तारी से सुरक्षा के संबंध में संजय कुमार गुप्ता बनाम यूपी राज्य (2025) और नीहारिका इंफ्रास्ट्रक्चर (2021) के फैसलों का हवाला देते हुए कहा कि एफआईआर रद्द करने से इनकार करते हुए ‘गिरफ्तारी पर रोक’ जैसा अंतरिम आदेश देना अनुचित है। ऐसे मामलों में आरोपियों को अग्रिम जमानत के लिए सक्षम सत्र न्यायालय जाना चाहिए।

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कोर्ट का निर्णय

हाईकोर्ट ने निष्कर्ष निकाला कि एफआईआर के अवलोकन से संज्ञेय अपराध बनता दिखाई दे रहा है, अतः इसमें हस्तक्षेप का कोई आधार नहीं है।

पीठ ने आदेश दिया, “उपरोक्त चर्चा को ध्यान में रखते हुए, हस्तक्षेप का कोई मामला नहीं बनता है। तदनुसार, रिट याचिका खारिज की जाती है।”

केस विवरण

  • केस शीर्षक: देवेंद्र कुमार सिंह एवं 5 अन्य बनाम उत्तर प्रदेश राज्य व 2 अन्य
  • केस संख्या: क्रिमिनल मिसलेनियस रिट पिटीशन संख्या 3034/2026
  • पीठ: जस्टिस अब्दुल मोइन और जस्टिस प्रमोद कुमार श्रीवास्तव
  • दिनांक: 15 अप्रैल, 2026

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