LIC कर्मचारियों को भी करनी होगी जनगणना ड्यूटी: इलाहाबाद हाईकोर्ट का बड़ा फैसला, कर्मचारी यूनियन की याचिका खारिज

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण कानूनी फैसले में स्पष्ट कर दिया है कि भारतीय जीवन बीमा निगम (LIC) के कर्मचारियों को राष्ट्रीय जनगणना कार्यों में तैनात किया जा सकता है। अदालत ने बीमा कर्मचारी यूनियन की उस याचिका को सिरे से खारिज कर दिया, जिसमें एलआईसी स्टाफ को जनगणना कार्य (प्रगणक और पर्यवेक्षक के रूप में) सौंपने के फैसले को चुनौती दी गई थी। कोर्ट ने माना कि अधिकारियों द्वारा लिया गया यह निर्णय पूरी तरह वैध है और इसमें कोई कानूनी त्रुटि नहीं है।

यह फैसला न्यायमूर्ति दिनेश पाठक की एकल पीठ ने ‘नॉर्थ सेंट्रल ज़ोन इंश्योरेंस एम्प्लॉइज़’ (North Central Zone Insurance Employees) एसोसिएशन द्वारा दायर रिट याचिका पर सुनवाई करते हुए सुनाया।

कोर्ट की दोटूक: ‘अधिकारियों के फैसले में कोई अवैधता नहीं’

न्यायालय ने अपने फैसले में स्पष्ट किया कि संबंधित जोनल अधिकारियों ने अपनी प्रत्यायोजित (delegated) शक्तियों का पूरी तरह से सही इस्तेमाल किया है।

सुनवाई के दौरान न्यायमूर्ति दिनेश पाठक ने कहा:

“इस अदालत का स्पष्ट मत है कि अधिकृत प्राधिकारी या जोनल अधिकारी ने अपनी शक्तियों का प्रयोग करते हुए एलआईसी कर्मचारियों को जनगणना कार्य सुचारू रूप से चलाने के लिए प्रगणक (Enumerators) और पर्यवेक्षक (Supervisors) के रूप में तैनात करने का जो आदेश दिया है, उसमें कोई त्रुटि या अवैधता नहीं है।”

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इसके साथ ही, अदालत ने याचिका के प्रारूप पर भी सवाल उठाए। कोर्ट ने पाया कि याचिका में कोई स्पष्ट आधार नहीं था। जस्टिस पाठक ने कहा कि रिट याचिका में केवल एलआईसी कर्मचारियों को जनगणना कार्य में लगाने के सामान्य फैसले को रद्द करने की “अस्पष्ट मांग” की गई थी, लेकिन किसी विशिष्ट (specific) आदेश को स्पष्ट चुनौती नहीं दी गई थी।

कानूनी बहस: ‘स्थानीय निकाय’ बनाम ‘व्यावसायिक प्रतिष्ठान’

अदालत में मुख्य बहस जनगणना अधिनियम, 1948 (Census Act, 1948) की व्याख्या और जनगणना के लिए कर्मचारियों की पात्रता को लेकर थी। दोनों पक्षों ने अपनी-अपनी दलीलें पेश कीं:

  • कर्मचारी यूनियन (याचिकाकर्ता) का तर्क: याचिकाकर्ता के वकील ने दलील दी कि जनगणना अधिनियम की धारा 4-A के तहत केवल “स्थानीय निकायों या प्राधिकरणों” (Local Authorities) के कर्मचारियों को ही जनगणना ड्यूटी पर लगाया जा सकता है। उन्होंने तर्क दिया कि ‘जनरल क्लॉजेस एक्ट, 1897’ की धारा 3(31) के अनुसार एलआईसी कर्मचारी ‘स्थानीय निकाय’ के दायरे में नहीं आते हैं, इसलिए उन्हें यह ड्यूटी सौंपना कानूनन गलत है।
  • केंद्र सरकार का पलटवार: केंद्र सरकार के वकील ने इस सीमित व्याख्या का कड़ा विरोध किया। उन्होंने दलील दी कि जनगणना अधिनियम की धारा 4-A को अकेले नहीं पढ़ा जा सकता। इसे अधिनियम की धारा 6(1)(e) और 7(c) के साथ मिलाकर देखा जाना चाहिए, जो स्पष्ट रूप से फैक्ट्रियों, फर्मों और व्यावसायिक प्रतिष्ठानों के कर्मचारियों को जनगणना कार्य में लगाने की अनुमति देती हैं।
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सरकारी वकील ने जोर देकर कहा कि एलआईसी एक ‘व्यावसायिक प्रतिष्ठान’ (Commercial Establishment) है, इसलिए इसके कर्मचारी स्वतः ही इस अधिनियम के दायरे में आते हैं। इसके अतिरिक्त, ‘जनगणना नियम, 1990’ के नियम 3 का हवाला देते हुए कहा गया कि यह सक्षम प्राधिकारियों को उपयुक्त व्यक्तियों को जनगणना अधिकारी नियुक्त करने का व्यापक अधिकार देता है।

सुचारू जनगणना के लिए रास्ता साफ

अंततः, इलाहाबाद हाईकोर्ट ने केंद्र सरकार की दलीलों और अधिनियम की व्यापक व्याख्या को सही माना। कोर्ट ने निष्कर्ष निकाला कि कानूनी प्रावधान सामूहिक रूप से नामित अधिकारियों को यह शक्ति देते हैं कि वे जनगणना के सुचारू संचालन के लिए एलआईसी कर्मियों की सेवाएं ले सकें।

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अदालत ने अपने आदेश में स्पष्ट किया कि जोनल अधिकारी कानून सम्मत रूप से एलआईसी कर्मचारियों को प्रगणक और पर्यवेक्षक के रूप में कार्य करने का निर्देश देने के लिए पूरी तरह सक्षम हैं। इस फैसले के बाद अब एलआईसी कर्मियों की जनगणना में तैनाती का रास्ता साफ हो गया है।

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