वाणिज्यिक मुकदमों में जवाबी दावे पर वादी के जवाब पर भी लागू होगी लिखित बयान दाखिल करने की 120 दिनों की समय सीमा: सुप्रीम कोर्ट

सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि वाणिज्यिक विवादों (कमर्शियल डिस्प्यूट्स) में लिखित बयान (रिटन स्टेटमेंट) दाखिल करने की 120 दिनों की सख्त बाहरी सीमा जवाबी दावे (काउंटर-क्लेम) का जवाब देने वाले वादी पर भी समान रूप से लागू होती है। विभिन्न हाईकोर्ट के बीच चल रहे कानूनी मतभेद को सुलझाते हुए, जस्टिस संजय कुमार और जस्टिस के. विनोद चंद्रन की पीठ ने कलकत्ता हाईकोर्ट के आदेश के खिलाफ ए.के. घोष एंड कंपनी द्वारा दायर अपीलों को खारिज कर दिया। पीठ ने कहा कि कमर्शियल कोर्ट्स एक्ट, 2015 के समयबद्ध ढांचे की अनदेखी नहीं की जा सकती है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि वादियों को जवाबी दावों पर अपना लिखित बयान इस वैधानिक समय सीमा के भीतर ही दाखिल करना होगा, और अधिकतम 120 दिनों की बाहरी सीमा से अधिक की देरी होने पर उनका यह अधिकार समाप्त हो जाएगा।

मामले की पृष्ठभूमि

यह विवाद वादी (ए.के. घोष एंड कंपनी और अन्य) द्वारा प्रतिवादियों (बिमन बोस और अन्य) को प्रिंटिंग पेपर की आपूर्ति से शुरू हुआ था। बकाया भुगतान को लेकर उपजे विवाद के बाद, वादियों ने 16 जून, 2021 को एक कानूनी नोटिस जारी कर ब्याज सहित 74,65,527 रुपये के भुगतान की मांग की। प्रतिवादियों ने 28 जून, 2021 को एक पत्र के माध्यम से इस दावे को खारिज कर दिया।

इसके बाद, वादियों ने कलकत्ता हाईकोर्ट में एक रिकवरी सूट (सीएस नंबर 274 ऑफ 2022) दायर किया, जिसे बाद में वाणिज्यिक मुकदमे के रूप में सीएस (कॉम) नंबर 440 ऑफ 2024 के रूप में पुन: नामांकित किया गया। मामले के मुख्य प्रतिवादियों (प्रतिवादी संख्या 1, 2, 3, 5 और 6) ने इस मुकदमे में अपना लिखित बयान दाखिल किया और साथ ही एक जवाबी दावा (काउंटर-क्लेम) भी पेश किया। इन दस्तावेजों की प्रतियां 18 जुलाई, 2023 को वादियों के एडवोकेट-ऑन-रिकॉर्ड को सौंपी गईं।

हालांकि, वादियों ने इस जवाबी दावे पर अपना लिखित बयान दाखिल करने की अनुमति के लिए 15 मार्च, 2024 को आवेदन दिया—जो कि 238 दिनों की देरी के बाद किया गया था। कलकत्ता हाईकोर्ट के सिंगल जज ने 19 अगस्त, 2024 को इस आवेदन को खारिज कर दिया। उन्होंने स्पष्ट किया कि भले ही सिविल प्रक्रिया संहिता (सीपीसी) के आदेश VIII नियम 6A(3) के तहत कोर्ट ने कोई विशिष्ट समय सीमा तय नहीं की थी, लेकिन आदेश VIII नियम 6G सीपीसी के तहत लिखित बयान के सभी नियम जवाबी दावों पर भी लागू होते हैं, जिसके कारण वादी वाणिज्यिक मुकदमों की समय सीमा से बच नहीं सकते।

वादियों ने इस फैसले के खिलाफ कलकत्ता हाईकोर्ट की डिवीजन बेंच में अपील की। 26 फरवरी, 2025 को डिवीजन बेंच ने इस अपील को योग्यता (मेरिट्स) और पोषणीयता (मेंटेनेबिलिटी) दोनों आधारों पर खारिज कर दिया। इसके बाद वादी सुप्रीम कोर्ट पहुंचे, जिसने 23 मई, 2025 को हाईकोर्ट की कार्यवाही पर रोक लगा दी थी।

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पक्षों की दलीलें

वादियों के वरिष्ठ वकील ने तर्क दिया कि आदेश VIII नियम 1 सीपीसी के तहत निर्धारित 120 दिनों की समय सीमा वादी द्वारा जवाबी दावे के दिए जाने वाले जवाब पर पूरी तरह लागू नहीं हो सकती। उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि चूंकि ट्रायल कोर्ट ने आदेश VIII नियम 6A(3) सीपीसी के तहत कोई विशिष्ट समय सीमा तय नहीं की थी, इसलिए वादियों को दंडित नहीं किया जाना चाहिए। उन्होंने दलील दी कि दंडात्मक प्रावधानों की व्याख्या हमेशा उस पक्ष के खिलाफ की जानी चाहिए जो इसका अनुचित लाभ उठाना चाहता है, और यदि वैकल्पिक व्याख्याएं संभव हों, तो उसका लाभ प्रभावित पक्ष को मिलना चाहिए। कमर्शियल कोर्ट्स एक्ट की धारा 13(1A) के तहत अपील की पोषणीयता पर उन्होंने तर्क किया कि धारा 13(2) केवल अपीलों के प्रक्रियात्मक पहलुओं को नियंत्रित करती है और यह वास्तविक अपीलीय अधिकारों को समाप्त नहीं करती है। उन्होंने ‘नसीमा नकी बनाम टोडी टी कंपनी लिमिटेड और अन्य’ मामले का हवाला देते हुए तर्क दिया कि कानून में जिस बात को स्पष्ट रूप से शामिल नहीं किया गया है, उसे लागू न करने की मंशा ही माना जाना चाहिए।

दूसरी ओर, प्रतिवादियों के वरिष्ठ वकील ने दलील दी कि वादी वाणिज्यिक मुकदमों में याचिकाओं को पूरा करने के वैधानिक आदेशों की अनदेखी नहीं कर सकते। उन्होंने स्पष्ट किया कि आदेश VIII नियम 6G सीपीसी में साफ तौर पर लिखा है कि प्रतिवादी के लिखित बयान पर लागू होने वाले नियम ही जवाबी दावे के जवाब में दाखिल होने वाले लिखित बयान पर भी लागू होंगे। इसलिए, आदेश VIII नियम 1 सीपीसी की अनिवार्य समय सीमा वाणिज्यिक जवाबी दावों पर भी लागू होनी चाहिए।

कोर्ट का विश्लेषण और निर्णय के आधार

सुप्रीम कोर्ट ने सीपीसी के आदेश VIII के इतिहास और उसकी रूपरेखा का गहन विश्लेषण किया। कोर्ट ने पाया कि जवाबी दावों को, जिन्हें 1976 के सीपीसी संशोधन के जरिए शामिल किया गया था, मूल दावों के समान ही माना जाता है और वादी द्वारा दिया जाने वाला जवाब वास्तव में एक लिखित बयान ही होता है। आदेश VIII नियम 6G सीपीसी के तहत प्रतिवादियों के लिखित बयान से जुड़े नियम जवाबी दावों पर भी समान रूप से लागू होते हैं।

कमर्शियल कोर्ट्स एक्ट, 2015 के लागू होने तक के विधायी विकास का उल्लेख करते हुए कोर्ट ने कहा कि वाणिज्यिक मामलों में देरी को रोकने के लिए समय सीमाओं को लगातार कड़ा किया गया है। वाणिज्यिक मुकदमों में, आदेश VIII नियम 1 सीपीसी का परंतुक (प्रोविजो) यह अनिवार्य बनाता है कि प्रतिवादी को 30 दिनों के भीतर अपना लिखित बयान दाखिल करना होगा, जिसे पर्याप्त कारण दिखाने, लिखित में कारण दर्ज करने और जुर्माना भरने पर अधिकतम 120 दिनों तक बढ़ाया जा सकता है। 120 दिन बीत जाने के बाद, यह अधिकार पूरी तरह समाप्त हो जाता है, जैसा कि ‘एससीजी कॉन्ट्रैक्ट्स (इंडिया) प्राइवेट लिमिटेड बनाम के.एस. चमनकर इंफ्रास्ट्रक्चर प्राइवेट लिमिटेड और अन्य’ मामले में स्पष्ट किया जा चुका है।

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सुप्रीम कोर्ट ने इस मुद्दे पर विभिन्न हाईकोर्ट के परस्पर विरोधी फैसलों पर भी विचार किया:

  • राजस्थान हाईकोर्ट ने ‘नरोत्तम शर्मा बनाम रामकिशोर व अन्य’ और मद्रास हाईकोर्ट ने ‘सीएससीओ एलएलसी व अन्य बनाम लक्ष्मी सरस्वती स्पिनटेक्स लिमिटेड व अन्य’ मामलों में उदार रुख अपनाते हुए कहा था कि समय सीमा तभी से शुरू होती है जब कोर्ट आदेश VIII नियम 6A(3) सीपीसी के तहत स्पष्ट रूप से समय तय करे। सुप्रीम कोर्ट ने इस तर्क को खारिज करते हुए कहा कि यदि कोर्ट समय सीमा तय करने में असमर्थ रहता है, तो इससे वादियों को “अपनी मर्जी से समय सारिणी तय करने” की छूट मिल जाएगी।
  • बॉम्बे हाईकोर्ट ने ‘दत्ताराम कृष्णनाथ पेडनेकर व अन्य बनाम पांडुरंग के. पेडनेकर व अन्य’ (श्रीमती शालिनी नून्स मस्कारेन्हास बनाम श्री ट्रेवर नून्स मामले के आधार पर) में निर्णय दिया था कि आदेश VIII नियम 6G केवल लिखित बयान की सामग्री को नियंत्रित करता है, न कि उसे दाखिल करने की समय सीमा को।

सुप्रीम कोर्ट ने बॉम्बे हाईकोर्ट के इस दृष्टिकोण को स्पष्ट रूप से खारिज करते हुए कहा:

“इसलिए, हम बॉम्बे हाईकोर्ट के इस विचार से असहमत हैं कि सीपीसी के आदेश VIII नियम 6G में उल्लिखित ‘नियम’ केवल जवाबी दावे के लिखित बयान की सामग्री से संबंधित हैं और लिखित बयान दाखिल करने की समय सीमा से इनका कोई संबंध नहीं है। आदेश VIII नियम 6G की शब्दावली इस प्रावधान में इस तरह के किसी भी प्रतिबंध को शामिल करने की अनुमति नहीं देती है।”

कोर्ट ने ‘सीएससीओ एलएलसी’ मामले में मद्रास हाईकोर्ट के उस दृष्टिकोण को भी खारिज कर दिया जिसमें कहा गया था कि आदेश VIII नियम 10 सीपीसी के परंतुक से आदेश VIII नियम 9 सीपीसी को बाहर रखने से अदालतों को जवाबी दावे के जवाब की समय सीमा बढ़ाने की अनुमति मिलती है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि जवाबी दावे का जवाब कोई “बाद की याचिका” (सबसीक्वेंट प्लीडिंग) नहीं है जिसके लिए कोर्ट की विशेष अनुमति की आवश्यकता हो।

कमर्शियल कोर्ट्स एक्ट के विधायी उद्देश्य (वाणिज्यिक विवादों का तेजी से निपटारा सुनिश्चित करना) को रेखांकित करते हुए कोर्ट ने माना कि यह सख्त समय सीमा वादियों पर भी समान रूप से लागू होनी चाहिए। कोर्ट ने निष्कर्ष निकाला:

“कमर्शियल कोर्ट्स एक्ट (सीसी एक्ट) के दायरे में आने वाले वाणिज्यिक मुकदमे में वादी सीपीसी के आदेश VIII नियम 1 के परंतुक (प्रोविजो) के आदेश से बंधा है, जैसा कि एक वाणिज्यिक मुकदमे पर लागू होता है। वादी को प्रतिवादी द्वारा किए गए जवाबी दावे पर अपना लिखित बयान आमतौर पर समन की तामील या जवाबी दावा प्राप्त होने की तारीख से 30 दिनों के भीतर दाखिल करना होगा। यदि वादी इस समय सीमा के भीतर ऐसा लिखित बयान दाखिल करने में विफल रहता है, लेकिन देरी के लिए पर्याप्त कारण बताता है, तो कोर्ट लिखित रूप में दर्ज किए जाने वाले कारणों और उचित लागत के भुगतान पर ऐसा करने के लिए समय बढ़ा सकता है, लेकिन यह अवधि वादी पर समन की तामील होने या वादी द्वारा जवाबी दावा प्राप्त होने की तारीख से 120 दिनों से अधिक नहीं हो सकती है।”

अपील की पोषणीयता

अपील की पोषणीयता के प्रश्न पर, सुप्रीम कोर्ट ने कमर्शियल कोर्ट्स एक्ट की धारा 13 का विश्लेषण किया। ‘बीजीएस एसजीएस सोमा जेवी बनाम एनएचपीसी लिमिटेड’ मामले का हवाला देते हुए कोर्ट ने दोहराया कि अपील पूरी तरह से वैधानिक प्रावधानों के दायरे में होनी चाहिए। ‘कांडला एक्सपोर्ट कॉरपोरेशन व अन्य बनाम ओसीआई कॉरपोरेशन व अन्य’ मामले का उल्लेख करते हुए कोर्ट ने स्पष्ट किया कि धारा 13(1A) केवल उन्हीं आदेशों के खिलाफ अपील की अनुमति देती है जो सीपीसी के आदेश XLIII या मध्यस्थता और सुलह अधिनियम, 1996 की धारा 37 के तहत विशेष रूप से सूचीबद्ध हैं। चूंकि आदेश VIII सीपीसी के तहत देरी से दाखिल किए गए लिखित बयान को स्वीकार न करने का आदेश सीपीसी के आदेश XLIII के तहत सूचीबद्ध नहीं है, इसलिए डिवीजन बेंच ने बिल्कुल सही माना था कि वादियों की अपील पोषणीय नहीं थी।

कोर्ट का अंतिम निर्णय

सुप्रीम कोर्ट ने अपीलों को खारिज कर दिया और 23 मई, 2025 के अंतरिम रोक के आदेश को वापस ले लिया। कोर्ट ने माना कि हाईकोर्ट के सिंगल जज और डिवीजन बेंच दोनों का फैसला पूरी तरह सही था, जिन्होंने अधिकतम 120 दिनों की अवधि बीत जाने के बाद वादियों को जवाबी दावे पर लिखित बयान दाखिल करने की अनुमति देने से इनकार कर दिया था। कोर्ट ने दोनों पक्षों को अपना-अपना मुकदमा खर्च खुद वहन करने का निर्देश दिया।

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मामले का विवरण

मामले का शीर्षक: ए.के. घोष एंड कंपनी और अन्य बनाम बिमन बोस और अन्य
वाद संख्या: सिविल अपील संख्या 2026, एसएलपी सी संख्या 15817 और 15818 ऑफ 2025
पीठ: जस्टिस संजय कुमार, जस्टिस के. विनोद चंद्रन
निर्णय की तिथि: 13 जुलाई, 2026

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