देश में पैर पसारते जा रहे नशीले पदार्थों के काले कारोबार पर सुप्रीम कोर्ट ने बेहद सख्त रुख अपनाया है। सुप्रीम कोर्ट ने एक अहम फैसले के दौरान स्पष्ट किया कि ड्रग्स का धंधा करने वाले लोगों से बेहद कड़े हाथों से निपटना होगा, क्योंकि ये लोग पीढ़ी-दर-पीढ़ी देश के युवाओं का भविष्य गर्त में धकेल रहे हैं।
जस्टिस विक्रम नाथ, जस्टिस शील नागू और जस्टिस वी मोहना की तीन सदस्यीय पीठ ने स्वापक औषधि और मनःप्रभावी पदार्थ अधिनियम, 1985 (NDPS Act) के तहत दर्ज एक मामले में आरोपी की जमानत याचिका को सिरे से खारिज करते हुए यह टिप्पणी की। इस फैसले के साथ ही सुप्रीम कोर्ट ने मद्रास हाई कोर्ट के उस फैसले को बरकरार रखा है, जिसमें आरोपी की लगातार छठी जमानत याचिका को नामंजूर कर दिया गया था।
क्या है पूरा मामला?
यह कानूनी विवाद जून 2022 से जुड़ा है। अभियोजन पक्ष के अनुसार, 11 जून 2022 को चेन्नई में पुलिस ने तीन संदिग्ध युवकों को एक बैग के साथ देखा था। पुलिस टीम को अपनी ओर आते देख तीनों ने भागने की कोशिश की, लेकिन मुस्तैद सुरक्षाकर्मियों ने उन्हें दबोच लिया।
तलाशी के दौरान उनके बैग से 21 एमडीएमए-एक्स्टसी (MDMA-ecstasy) टैबलेट बरामद हुईं, जिनका कुल वजन लगभग 10.15 ग्राम था। इसके बाद पुलिस ने मुख्य आरोपी और एक अन्य आरोपी की निशानदेही और कबूलनामे के आधार पर उनके तीसरे साथी को भी गिरफ्तार किया, जो मौके से भागने में सफल रहा था।
कोर्ट में बचाव पक्ष की दलीलें और प्रक्रियात्मक कमियां
सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता के कानूनी सलाहकार ने पुलिस जांच और अदालती प्रक्रिया में हो रही देरी को लेकर कई सवाल उठाए:
- अवैध हिरासत का आरोप: बचाव पक्ष ने दलील दी कि 11 जून 2022 को जब्त किए गए प्रतिबंधित पदार्थ को चेन्नई की विशेष अदालत के समक्ष लगभग एक महीने बाद (5 जुलाई 2022) पेश किया गया। इस अवधि के दौरान पुलिस ने बिना किसी अदालती मंजूरी के इस सामग्री को अपनी कस्टडी में रखा था।
- मुकदमे में देरी: वकील ने कोर्ट का ध्यान इस ओर भी खींचा कि मद्रास हाई कोर्ट ने नवंबर 2024 में ही निचली अदालत को छह महीने के भीतर मुकदमा पूरा करने का निर्देश दिया था, लेकिन डेढ़ साल से अधिक समय बीत जाने के बाद भी सुनवाई पूरी नहीं हो सकी है। इसके अलावा, मामले के सह-आरोपियों को पहले ही जमानत दी जा चुकी है।
‘व्यावसायिक मात्रा’ ने बंद किए राहत के रास्ते
दूसरी तरफ, राज्य सरकार की ओर से पेश वकील ने जमानत याचिका का पुरजोर विरोध करते हुए अपराध की गंभीरता को रेखांकित किया। सरकारी अभियोजक ने दलील दी कि जब्त की गई 10.15 ग्राम एमडीएमए की मात्रा एनडीपीएस कानून के तहत “व्यावसायिक मात्रा” (Commercial Quantity) की श्रेणी में आती है।
भारतीय कानून के मुताबिक, व्यावसायिक मात्रा के मामलों में जमानत दिए जाने के नियम और शर्तें बेहद कठोर होती हैं। मद्रास हाई कोर्ट ने भी इसी दलील को आधार बनाकर जमानत खारिज की थी, जिसे अब देश की सबसे बड़ी अदालत ने पूरी तरह सही ठहराया है।

