मद्रास हाईकोर्ट की मदुरै पीठ ने एक महत्वपूर्ण फैसले में माना कि पत्नी द्वारा अपना मंगलसूत्र (थाली) उतारना, पति के सैन्य वरिष्ठ अधिकारियों से बिना सबूतों के मानहानिकारक शिकायतें करना और बिना किसी सुलह के प्रयास के तीस वर्षों से अधिक समय तक अलग रहना अत्यधिक मानसिक क्रूरता की श्रेणी में आता है। जस्टिस पी. वडामलाई की एकल पीठ ने पत्नी द्वारा दायर की गई दूसरी दीवानी अपील (Civil Miscellaneous Second Appeal) को खारिज करते हुए निचली अदालतों के उस फैसले की पुष्टि की, जिसके तहत हिंदू विवाह अधिनियम, 1955 के तहत पति को तलाक की डिक्री दी गई थी।
मामले की पृष्ठभूमि
दोनों पक्षों का विवाह 30 अगस्त 1977 को हिंदू रीति-रिवाजों के अनुसार संपन्न हुआ था। इस विवाह से उनके दो बच्चे हैं—एक बेटा और एक बेटी, जो अब वयस्क हो चुके हैं। पति की याचिका के अनुसार, शादी की शुरुआत से ही पत्नी उस पर कई महिलाओं के साथ अवैध संबंध रखने का बेबुनियाद शक करती थी और अक्सर सार्वजनिक रूप से उसका अपमान करती थी। जब पति इलाहाबाद में भारतीय सेना में कार्यरत था, तब पत्नी ने 19 सितंबर 1989 को उसके वरिष्ठ अधिकारियों को एक पत्र लिखा, जिसमें उसके चरित्र पर गंभीर और आपत्तिजनक आरोप लगाए गए थे।
इसके बाद दोनों के बीच कानूनी विवाद बढ़ गए। पत्नी ने अपने बेटे के माध्यम से 1997 में पुलिस में शिकायत दर्ज कराई, जिसके बाद चले आपराधिक मामले (C.C.No.388 of 1998) में पति को शारीरिक चोट पहुंचाने का दोषी पाया गया और सात साल की सजा सुनाई गई (जिसे बाद में अपील पर कम कर दिया गया था)। इसके बाद से दोनों अलग रहने लगे। पति ने भी 2009 में पत्नी के खिलाफ कथित तौर पर फर्जी दस्तावेज बनाकर उसकी स्व-अर्जित संपत्ति हड़पने का आपराधिक मामला दर्ज कराया। इसके अलावा दोनों पक्षों के बीच संपत्ति के बंटवारे को लेकर दीवानी मुकदमे भी चल रहे थे।
पति ने आरोप लगाया कि पत्नी ने ईसाई धर्म अपना लिया है, मंगलसूत्र पहनना बंद कर दिया है और उसे लगातार मानसिक प्रताड़ना व छोड़ देने का शिकार बनाया है। इन्हीं आधारों पर पति ने मुख्य अधीनस्थ न्यायालय, तेनकासी में हिंदू विवाह अधिनियम की धारा 13(1)(ia)(ib) और (ii) के तहत तलाक की याचिका (H.M.O.P. No. 157 of 2014) दायर की।
ट्रायल कोर्ट ने 4 दिसंबर 2017 को क्रूरता के आधार पर तलाक की याचिका मंजूर कर ली। प्रथम अपीलीय अदालत (अतिरिक्त जिला एवं सत्र न्यायालय/फास्ट ट्रैक कोर्ट, तेनकासी) ने भी 4 सितंबर 2019 को इस निर्णय की पुष्टि की, जिसके बाद पत्नी ने हाईकोर्ट का रुख किया।
पक्षों की दलीलें
पत्नी (अपीलकर्ता) की ओर से दलीलें: पत्नी के वकील ने तर्क दिया कि क्रूरता के आरोप पूरी तरह निराधार हैं। उन्होंने दलील दी कि सेना के अधिकारियों को पत्र लिखने की मुख्य घटना 1989 में हुई थी और पति के 1991 में सेवानिवृत्त होने के बाद दोनों सिवालारकुलम में एक साथ रहे थे, इसलिए कथित क्रूरता को माफ (condone) किया जा चुका है। हिंदू विवाह अधिनियम की धारा 23(1)(b) का हवाला देते हुए उन्होंने कहा कि लंबे समय के बाद पुरानी घटनाओं को फिर से जीवित कर तलाक का आधार नहीं बनाया जा सकता।
आपराधिक मुकदमों के संबंध में पत्नी ने दलील दी कि वे झूठे या दुर्भावनापूर्ण नहीं थे, बल्कि कानूनी अधिकार का प्रयोग थे क्योंकि पति ने उसे गंभीर शारीरिक चोटें पहुंचाई थीं, उसका दाहिना अंगूठा काट दिया था और घर के अंदर बच्चों सहित बंद कर आग लगाने की कोशिश की थी। इसके अलावा उन्होंने धर्म परिवर्तन के आरोपों से इनकार किया और तर्क दिया कि लंबे समय तक अलग रहना तलाक का कोई वैधानिक आधार नहीं है, जिसे हाईकोर्ट या अधीनस्थ अदालतें मंजूर कर सकें। इस संबंध में उन्होंने सुप्रीम कोर्ट के सुमन सिंह बनाम संजय सिंह, विष्णु दत्त शर्मा बनाम मंजू शर्मा और अनिल कुमार जैन बनाम माया जैन जैसे फैसलों का हवाला दिया।
पति (प्रतिवादी) की ओर से दलीलें: पति के वकील ने तर्क दिया कि पत्नी लगातार चरित्र पर बेबुनियाद आरोप लगाती रही, जिसे उसने अपनी जिरह (cross-examination) के दौरान खुद स्वीकार भी किया है। उन्होंने दलील दी कि पत्नी ने अपना मंगलसूत्र उतार दिया था, ईसाई धर्म अपना लिया था और वह 1996 से (30 वर्षों से अधिक समय से) अलग रह रही है, जबकि उसने कभी भी हिंदू विवाह अधिनियम की धारा 9 के तहत दाम्पत्य अधिकारों की बहाली (restitution of conjugal rights) या सुलह का कोई प्रयास नहीं किया। उन्होंने कहा कि यह शादी पूरी तरह टूट चुकी है और निचली अदालतों द्वारा क्रूरता के आधार पर दिए गए निष्कर्ष बिल्कुल सही हैं। उन्होंने जॉयदीप मजूमदार बनाम भारती जायसवाल मजूमदार, समर घोष बनाम जया घोष, सी. शिवकुमार बनाम ए. श्रीविद्या और राकेश रमन बनाम कविता जैसे फैसलों पर भरोसा जताया।
अदालत का विश्लेषण और टिप्पणियां
जस्टिस पी. वडामलाई ने साक्ष्यों की समीक्षा करते हुए पाया कि पत्नी ने अपनी जिरह के दौरान स्पष्ट रूप से स्वीकार किया था कि उसने पति के वरिष्ठ सैन्य अधिकारियों को उसके कथित विवाहेतर संबंधों को लेकर शिकायतें भेजी थीं। चूंकि वह इन आरोपों को साबित करने के लिए कोई विश्वसनीय सबूत पेश नहीं कर सकी, इसलिए अदालत ने माना कि उसके इस कृत्य से पति के सम्मान को ठेस पहुंची। अदालत ने सुप्रीम कोर्ट की तीन जजों की पीठ द्वारा जॉयदीप मजूमदार बनाम भारती जायसवाल मजूमदार मामले में दी गई टिप्पणियों को उद्धृत किया:
“जब किसी जीवनसाथी की प्रतिष्ठा को उसके सहकर्मियों, वरिष्ठों और समाज में धूमिल किया जाता है, तो पीड़ित पक्ष से ऐसे आचरण को माफ करने की उम्मीद करना मुश्किल होता है।”
हाईकोर्ट ने इसी फैसले से आगे उद्धृत किया:
“पत्नी का यह स्पष्टीकरण कि उसने ये शिकायतें वैवाहिक संबंधों को बचाने के लिए की थीं, हमारी राय में, अपीलकर्ता की गरिमा और प्रतिष्ठा को ठेस पहुंचाने के उसके लगातार प्रयासों को उचित नहीं ठहराता। ऐसी परिस्थितियों में, पीड़ित पक्ष से वैवाहिक संबंध जारी रखने की उम्मीद नहीं की जा सकती और उसके पास अलग होने की मांग करने का पूरा औचित्य है।”
अदालत ने पत्नी के इस तर्क को खारिज कर दिया कि 1989 की शिकायतों को माफ कर दिया गया था। अदालत ने स्पष्ट किया कि सेवानिवृत्ति के बाद भी उनके बीच लगातार उन्हीं आरोपों को लेकर गंभीर झगड़े होते रहे, जो बाद में आपराधिक मामलों तक पहुंच गए। इसलिए, झगड़ों की निरंतरता को देखते हुए पुरानी क्रूरता को माफ किया हुआ नहीं माना जा सकता।
मंगलसूत्र (थाली) के मुद्दे पर, अदालत ने पाया कि पत्नी ने खुद स्वीकार किया था कि उसने मंगलसूत्र उतार दिया था और वह सोने के गहने नहीं पहनती थी। मद्रास हाईकोर्ट की खंडपीठ के सी. शिवकुमार बनाम ए. श्रीविद्या फैसले का हवाला देते हुए, जिसमें वल्लभी बनाम आर. राजासबाही को उद्धृत किया गया था, अदालत ने टिप्पणी की:
“पत्नी के गले में थाली (मंगलसूत्र) एक पवित्र चीज है जो वैवाहिक जीवन की निरंतरता का प्रतीक है और इसे केवल पति की मृत्यु के बाद ही उतारा जाता है। इसलिए, याचिकाकर्ता/पत्नी द्वारा ‘थाली’ उतारने को ऐसा कृत्य कहा जा सकता है जो अत्यधिक मानसिक क्रूरता को दर्शाता है, क्योंकि इससे प्रतिवादी को गहरी मानसिक वेदना और ठेस पहुंची होगी।”
इसके अलावा, अदालत ने माना कि बेटी का नाम और उसका विवाह एक ईसाई परिवार में होना (दस्तावेज Ex.P.1 और Ex.P.2 के अनुसार) पत्नी के ईसाई धर्म अपनाने के दावों का समर्थन करता है, इसलिए इस आरोप को पूरी तरह से नकारा नहीं जा सकता।
दशकों लंबे अलगाव पर अदालत ने स्पष्ट किया कि यद्यपि हाईकोर्ट के पास सुप्रीम कोर्ट की तरह संविधान के अनुच्छेद 142 के तहत केवल शादी के अपूरणीय रूप से टूट जाने (irretrievable breakdown) के आधार पर विवाह विच्छेद करने की असाधारण शक्ति नहीं है, लेकिन लंबे अलगाव को हिंदू विवाह अधिनियम की धारा 13(1)(ia) के तहत मानसिक क्रूरता के एक घटक के रूप में जरूर देखा जा सकता है। सुप्रीम कोर्ट के राकेश रमन बनाम कविता फैसले को उद्धृत करते हुए अदालत ने कहा:
“लंबे समय तक अलग रहना, सहवास का न होना, सार्थक संबंधों का पूरी तरह से खत्म हो जाना और दोनों के बीच मौजूद कड़वाहट को 1955 के अधिनियम की धारा 13(1)(ia) के तहत क्रूरता के रूप में पढ़ा जाना चाहिए।”
अदालत ने पाया कि दोनों पक्ष 1996 से यानी लगभग 30 वर्षों से अधिक समय से अलग रह रहे थे, उनके बीच कई अदालती मामले लंबित थे और पत्नी की ओर से सुलह का कोई प्रयास नहीं किया गया था, जो कि मानसिक क्रूरता के समान है।
अदालत का निर्णय
इन निष्कर्षों के आधार पर हाईकोर्ट ने कानून के सभी महत्वपूर्ण सवालों का फैसला अपीलकर्ता पत्नी के खिलाफ सुनाया। अदालत ने माना कि पति मानसिक क्रूरता के आधार को साबित करने में पूरी तरह सफल रहा है, इसलिए ट्रायल कोर्ट और प्रथम अपीलीय अदालत के निर्णयों में हस्तक्षेप करने का कोई कारण नहीं है। इसी के साथ पत्नी की दूसरी अपील खारिज कर दी गई और तलाक की डिक्री बरकरार रखी गई। मामले में किसी भी पक्ष पर अदालती खर्च नहीं लगाया गया।

