सुप्रीम कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में स्पष्ट किया है कि अस्थाई दर्जा (Temporary Status) प्राप्त कैजुअल लेबर (Casual Labourers) अपनी सेवानिवृत्ति पर पेंशन लाभ पाने के हकदार हैं, भले ही सेवा में उनका औपचारिक रूप से नियमितीकरण (Formal Regularisation) न किया गया हो। जस्टिस संजय करोल और जस्टिस अगस्टिन जॉर्ज मसीह की पीठ ने पटना हाईकोर्ट के उस आदेश को खारिज कर दिया, जिसके तहत डाक विभाग के तीन पूर्व कर्मचारियों को केवल प्रशासनिक शिथिलता और देरी के आधार पर पेंशन देने से इनकार कर दिया गया था। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि यदि किसी कैजुअल लेबर को अस्थाई दर्जा मिल जाता है और वह इस दर्जे के साथ तीन साल की निरंतर सेवा पूरी कर लेता है, तो उसे अस्थाई ग्रुप ‘डी’ कर्मचारियों के समकक्ष माना जाएगा, जिससे वे पेंशन और अन्य सेवानिवृत्ति लाभों के पात्र बन जाते हैं।
मामले की पृष्ठभूमि
इस मामले के अपीलकर्ता बिहार में डाक विभाग के तहत ‘नाइट गार्ड’ (रात के चौकीदार) के रूप में कई दशकों तक निरंतर सेवा देने वाले पूर्व कैजुअल लेबर या उनके कानूनी प्रतिनिधि हैं।
पहले अपीलकर्ता भीखनी देवी, स्वर्गीय सूरज साह की विधवा हैं। सूरज साह को 12 फरवरी 1972 को मधुबनी जिले के राजनगर डाकघर में कैजुअल लेबर (नाइट गार्ड) के रूप में नियुक्त किया गया था। दूसरे अपीलकर्ता बहुरूपी साहू को 10 अक्टूबर 1971 को और तीसरे अपीलकर्ता पीतांबर झा को 20 जून 1981 को नियुक्त किया गया था। इन तीनों कर्मचारियों ने बिना किसी औपचारिक नियमितीकरण के दशकों तक लगातार काम किया।
वर्ष 1990 में जागृत मजदूर यूनियन (पंजीकृत) और अन्य बनाम महानगर टेलीफोन निगम लिमिटेड व अन्य मामले में सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों के बाद डाक विभाग ने “कैजुअल लेबर (अस्थाई दर्जा और नियमितीकरण की मंजूरी) योजना, 1991” तैयार की थी। इस योजना के तहत इन तीनों श्रमिकों को 20 नवंबर 1992 के विभागीय ज्ञापन के जरिए 29 नवंबर 1989 से पूर्वव्यापी प्रभाव के साथ ‘अस्थाई दर्जा’ दिया गया था।
इसके बाद, 30 नवंबर 1992 के एक विभागीय सर्कुलर में यह तय किया गया कि जिन कैजुअल लेबरों को अस्थाई दर्जा मिल चुका है और जिन्होंने इस दर्जे में तीन साल की निरंतर सेवा पूरी कर ली है, उन्हें अस्थाई ग्रुप ‘डी’ कर्मचारियों के समकक्ष माना जाएगा। वे छुट्टी, अवकाश और नियमितीकरण होने पर पेंशन तथा अन्य टर्मिनल लाभों के लिए अपनी सेवा की गणना के हकदार होंगे। 3 मई 2000 को जारी एक अन्य ज्ञापन में सूरज साह और बहुरूपी साहू को औपचारिक रूप से अस्थाई ग्रुप ‘डी’ कर्मचारियों के समकक्ष मानने का निर्देश दिया गया।
लंबे समय तक सेवा करने के बावजूद, प्रशासनिक निष्क्रियता के कारण विभाग ने कभी भी इनका औपचारिक रूप से नियमितीकरण नहीं किया। बहुरूपी साहू 30 अप्रैल 2008 को, सूरज साह 31 दिसंबर 2008 को और पीतांबर झा 31 अक्टूबर 2015 को सेवानिवृत्त हो गए। 10 अप्रैल 2015 को सूरज साह की मृत्यु के बाद, उनकी विधवा भीखनी देवी ने पारिवारिक पेंशन के लिए आवेदन किया, जिसे अधिकारियों ने इस आधार पर खारिज कर दिया कि उनके पति का ग्रुप ‘डी’ पद पर ‘औपचारिक नियमितीकरण’ नहीं हुआ था। अन्य दो कर्मचारियों के दावों को भी इसी आधार पर खारिज कर दिया गया।
कर्मचारियों ने सेंट्रल एडमिनिस्ट्रेटिव ट्रिब्यूनल (कैट), पटना का रुख किया, जिसने 2018 में उनके पक्ष में आदेश दिया। हालांकि, भारत सरकार ने इसे पटना हाईकोर्ट में चुनौती दी। हाईकोर्ट ने सरकार की याचिकाओं को स्वीकार करते हुए ट्रिब्यूनल के आदेशों को रद्द कर दिया। हाईकोर्ट का मानना था कि यह दावा अत्यधिक देरी से किया गया है और औपचारिक नियमितीकरण न होने के कारण ये कर्मचारी पेंशन के हकदार नहीं हैं। इसके बाद यह मामला अपील के जरिए सुप्रीम कोर्ट पहुंचा।
पक्षों की दलीलें
अपीलकर्ताओं के वकील ने तर्क दिया कि पेंशन का मामला लगातार उत्पन्न होने वाला वाद-कारण (Recurring Cause of Action) है, इसलिए इसे केवल देरी के आधार पर खारिज नहीं किया जा सकता। उन्होंने इस संबंध में एम.एल. पाटिल बनाम गोवा राज्य (2023) मामले का हवाला दिया। मेरिट पर बहस करते हुए उन्होंने कहा कि केंद्रीय सिविल सेवा (अस्थाई सेवा) नियम, 1965 और 14 अप्रैल 1987 के कार्यालय ज्ञापन के अनुसार, कम से कम 10 साल की सेवा पूरी करने वाले अस्थाई सरकारी कर्मचारी सेवानिवृत्ति पेंशन, ग्रेच्युटी और पारिवारिक पेंशन के पात्र हैं और इसके लिए किसी स्थाई पद पर होना अनिवार्य नहीं है।
अपीलकर्ताओं ने जागृत मजदूर यूनियन मामले का हवाला देते हुए कहा कि तीन साल की सेवा पूरी करने पर उन्हें ग्रुप ‘डी’ के समकक्ष माना गया था। उन्होंने विनोद कुमार बनाम भारत संघ (2024) और जग्गो बनाम भारत संघ (2024) मामलों का हवाला देकर तर्क दिया कि लंबे समय तक आवश्यक कर्तव्यों का पालन करने वाले कर्मचारियों को केवल नामकरण (Nomenclature) के आधार पर नियमित लाभों से वंचित नहीं किया जा सकता। उन्होंने यह भी कहा कि 1992 का सर्कुलर नियमितीकरण को पेंशन की पूर्व-शर्त नहीं बनाता, बल्कि यह केवल गणना की जाने वाली सेवा की मात्रा (अस्थाई दर्जे की सेवा का 50 प्रतिशत) को नियंत्रित करता है।
इसके विपरीत, भारत सरकार की ओर से पेश अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल (एएसजी) ने हाईकोर्ट के फैसले का समर्थन किया। उन्होंने दलील दी कि 1991 की योजना ही विशेष रूप से कर्मचारियों की सेवा शर्तों को नियंत्रित करती है। एएसजी ने योजना के पैराग्राफ 6 और 7 का हवाला देकर तर्क दिया कि अस्थाई दर्जे की सेवा का 50 प्रतिशत हिस्सा सेवानिवृत्ति लाभों के लिए केवल तभी गिना जा सकता है जब कर्मचारी का ग्रुप ‘डी’ पद पर औपचारिक नियमितीकरण हो गया हो, जो कि भर्ती नियमों और रिक्तियों की उपलब्धता पर निर्भर करता है।
सरकार का यह भी तर्क था कि तीन साल की अस्थाई सेवा के बाद मिलने वाली समकक्षता केवल जनरल प्रोविडेंट फंड (जीपीएफ) अंशदान और त्योहार अग्रिम (Festival Advance) तक सीमित थी, न कि पेंशन लाभों तक। एएसजी ने कहा कि सीसीएस (अस्थाई सेवा) नियम, 1965 कैजुअल या आकस्मिक निधि से भुगतान पाने वाले कर्मचारियों पर लागू नहीं होते। उन्होंने विभाग पर पड़ने वाले अत्यधिक वित्तीय बोझ की ओर भी इशारा किया।
अदालत का विश्लेषण
सुप्रीम कोर्ट ने कैजुअल लेबर और अस्थाई कर्मचारियों से जुड़े कानूनी ढांचे का विस्तृत विश्लेषण किया। कोर्ट ने जागृत मजदूर यूनियन, विनोद कुमार और जग्गो मामलों का संदर्भ देते हुए इस बात पर बल दिया कि लंबे समय से अपनी सेवाएं दे रहे कैजुअल लेबरों को अनिश्चित स्थिति में नहीं रखा जा सकता।
कोर्ट ने यशवंत हरी कटककर बनाम भारत संघ (1996) मामले में स्थापित सिद्धांत को दोहराते हुए टिप्पणी की कि: “जहाँ किसी कर्मचारी ने लंबे वर्षों तक सेवा की हो और उसे स्थाई दर्जा न देने का कोई न्यायसंगत कारण न हो, तो केवल औपचारिक नियमितीकरण के अभाव में पेंशन लाभों से वंचित करना न्याय का मखौल होगा, और ऐसे कर्मचारी को स्थाई दर्जा प्राप्त मानकर व्यवहार किया जाना चाहिए।”
पेंशन की प्रकृति पर चर्चा करते हुए कोर्ट ने झारखंड राज्य बनाम जितेंद्र कुमार श्रीवास्तव (2013) मामले का संदर्भ दिया और कहा कि: “पेंशन कोई कृपा या दान नहीं है बल्कि लंबे और निरंतर सेवाकाल के आधार पर कर्मचारी द्वारा अर्जित किया गया एक अधिकार है और यह भारत के संविधान के अनुच्छेद 300ए के दायरे में ‘संपत्ति’ की प्रकृति का है।”
कोर्ट ने आगे स्पष्ट किया कि: “एक बार जब पेंशन को संपत्ति की प्रकृति में एक संवैधानिक अधिकार के रूप में स्वीकार कर लिया जाता है, तो इसे कानून के प्राधिकार के बिना नहीं छीना जा सकता। नियोक्ता की निष्क्रियता के कारण किसी वैधानिक अधिकार को निरर्थक नहीं बनाया जा सकता है, और ऐसी निष्क्रियता किसी संवैधानिक अधिकार को पराजित या खारिज नहीं कर सकती है।”
1991 की योजना और 1992 के सर्कुलर की व्याख्या करते हुए कोर्ट ने सरकार के इस संकीर्ण तर्क को खारिज कर दिया कि पेंशन केवल नियमितीकरण के बाद ही मिल सकती है। कोर्ट ने कहा कि योजना का क्लॉज 6 पेंशन का अधिकार पैदा नहीं करता, बल्कि पेंशन का अधिकार स्वतंत्र रूप से योजना और 1992 के सर्कुलर से मिलता है। क्लॉज 6 केवल अतिरिक्त लाभ के रूप में अस्थाई सेवा का आधा हिस्सा जोड़ने का प्रावधान करता है।
अदालत ने डाक विभाग में कर्मचारियों की श्रेणियों (कैजुअल लेबर, अस्थाई दर्जा प्राप्त कैजुअल लेबर, अस्थाई सरकारी कर्मचारी और नियमित सरकारी कर्मचारी) का उल्लेख करते हुए कहा कि भले ही अस्थाई दर्जा प्राप्त कैजुअल लेबर सीधे अस्थाई सरकारी कर्मचारी नहीं बन जाता, लेकिन 1991 की योजना और 1992 का सर्कुलर तीन साल की सेवा के बाद उन्हें मिलने वाले लाभों को ग्रुप ‘डी’ के समकक्ष कर देता है। सर्कुलर में प्रयुक्त शब्द “जैसे कि” (such as) यह दर्शाता है कि उसमें सूचीबद्ध लाभ केवल उदाहरण मात्र हैं, न कि संपूर्ण सूची।
इसके अलावा, अदालत ने सीसीएस (अस्थाई सेवा) नियम, 1965 के नियम 10(1-B) का परीक्षण किया, जिसमें स्पष्ट है कि कम से कम 10 साल की अस्थाई सेवा देने वाले कर्मचारी पेंशन, ग्रेच्युटी और पारिवारिक पेंशन के पात्र हैं। कोर्ट ने सरकार के इस तर्क को भी खारिज कर दिया कि अपीलकर्ता आकस्मिक निधि से भुगतान पाने वाले कर्मचारी थे, क्योंकि उन्हें विभाग द्वारा नियमित वेतनमान, वेतन वृद्धि और जीपीएफ की सुविधाएं दी जा रही थीं।
वित्तीय बोझ के संबंध में सरकार के तर्क को खारिज करते हुए कोर्ट ने स्पष्ट किया कि: “पेंशन नियोक्ता की वित्तीय सुविधा पर निर्भर कोई अनुग्रह राशि नहीं है, बल्कि लंबे वर्षों की सेवा के माध्यम से अर्जित किया गया एक आस्थगित वेतन है।”
अंततः, कोर्ट ने मुख्य कानूनी प्रश्न का उत्तर देते हुए स्पष्ट किया कि: “एक अस्थाई दर्जा प्राप्त कैजुअल लेबर नियमितीकरण की अनुपस्थिति में भी सेवानिवृत्ति पर पेंशन लाभों का हकदार होगा।”
देरी और लचेस (Delay and Laches) के संबंध में कोर्ट ने माना कि पेंशन का दावा निरंतर चलने वाला वाद-कारण है, लेकिन सीमा के सिद्धांतों को संतुलित करने के लिए कोर्ट ने निर्देश दिया कि चूंकि अपीलकर्ताओं ने ट्रिब्यूनल के समक्ष आवेदन करने से पहले विभाग के सामने कोई दावा पेश नहीं किया था, इसलिए उनके बकाया (Arrears) को ट्रिब्यूनल में आवेदन दायर करने की तारीख से ठीक तीन साल दो महीने पहले की अवधि तक ही सीमित रखा जाएगा।
न्यायालय का निर्णय
सुप्रीम कोर्ट ने निर्णय दिया कि पटना हाईकोर्ट ने 1991 की योजना और 1992 के सर्कुलर की त्रुटिपूर्ण व्याख्या की थी। इसके साथ ही शीर्ष अदालत ने हाईकोर्ट के फैसले को रद्द करते हुए अपीलों को स्वीकार कर लिया।
कोर्ट ने घोषित किया कि स्वर्गीय सूरज साह (प्रतिनिधित्व भीखनी देवी द्वारा), बहुरूपी साहू और पीतांबर झा ने तीन साल की अस्थाई सेवा पूरी करने के बाद आवश्यक 10 वर्षों की न्यूनतम सेवा पूरी कर ली थी, जिससे वे पेंशन के पात्र बन गए हैं।
कोर्ट ने निम्नलिखित निर्देश जारी किए:
- भीखनी देवी अपने दिवंगत पति सूरज साह को देय पेंशन और नियमानुसार पारिवारिक पेंशन पाने की हकदार हैं।
- बहुरूपी साहू पेंशन और उससे जुड़े सेवानिवृत्ति लाभों के हकदार हैं।
- भीखनी देवी और बहुरूपी साहू के बकाया भुगतान (Arrears) को ट्रिब्यूनल के समक्ष उनके संबंधित आवेदन दायर करने की तारीख से तीन साल दो महीने पहले की अवधि तक ही सीमित रखा जाएगा।
- पीतांबर झा अपनी सेवानिवृत्ति की तिथि यानी 31 अक्टूबर 2015 से पेंशन और संबंधित लाभ पाने के हकदार हैं।
- विभाग को इस निर्णय की तिथि से तीन महीने के भीतर इन सभी लाभों की गणना करके भुगतान जारी करना होगा। देरी होने की स्थिति में, भुगतान की तिथि तक 6 प्रतिशत वार्षिक की दर से ब्याज देना होगा।
मामले का विवरण
मामले का शीर्षक: भीखनी देवी एवं अन्य बनाम भारत संघ एवं अन्य
वाद संख्या: सिविल अपील संख्या 2026 की (एसएलपी (सी) संख्या 28802-28804 ऑफ 2019 से उत्पन्न)
पीठ: जस्टिस संजय करोल और जस्टिस अगस्टिन जॉर्ज मसीह
निर्णय की तिथि: 1 जून, 2026

