एफआईआर मजिस्ट्रेट को भेजने में अकारण देरी और चश्मदीदों पर गंभीर संदेह आरोपी को संदेह का लाभ पाने का हकदार बनाते हैं: सुप्रीम कोर्ट

सुप्रीम कोर्ट ने 1977 के एक हत्या के मामले में तीन लोगों की सजा को रद्द कर दिया है। कोर्ट ने निर्णय दिया कि मजिस्ट्रेट को प्रथम सूचना रिपोर्ट (एफआईआर) भेजने में हुई अकारण देरी और कथित चश्मदीदों की मौके पर मौजूदगी को लेकर पैदा हुए गंभीर संदेह के कारण आरोपी संदेह का लाभ (बेनिफिट ऑफ डाउट) पाने के हकदार हैं। जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की खंडपीठ ने इस मामले में जांच की गंभीर खामियों को रेखांकित किया। कोर्ट ने माना कि पूरी रात शव को बिना किसी सुरक्षा के सड़क पर छोड़ देने जैसी लापरवाही ने अभियोजन पक्ष के दावों की नींव को ही कमजोर कर दिया।

मामले की पृष्ठभूमि

यह मामला 27 और 28 जून 1977 की दरमियानी रात का है, जब उत्तर प्रदेश के गोंडा जिले के कर्नलगंज थाना क्षेत्र के लालेमऊ पुरे पंडित गांव में शिकायतकर्ता राघव राम (पीडब्लू-1) के घर में चोरी की कोशिश की गई थी। सुबह पकड़े गए संदिग्ध को कर्नलगंज पुलिस स्टेशन सौंपने के बाद, राघव राम और राम नाथ (पीडब्लू-2) पास के पशु मेले में चले गए। वहां उनकी मुलाकात नंद लाल सिंह (पीडब्लू-4), बाबू राम और बाद में इस घटना के शिकार बने हरिहर शरण से हुई।

अभियोजन पक्ष की कहानी के अनुसार, शाम करीब 4:00 बजे सभी लोग पैदल ही अपने गांव के लिए रवाना हुए। जब वे कंचनपुर गांव की पश्चिमी सीमा के पास पहुंचे, तो घात लगाकर बैठे छह आरोपी लाठी, बल्लम और कांता जैसे हथियारों के साथ सड़क किनारे एक बेल के पेड़ के नीचे से निकले। हमलावरों ने शोर मचाते हुए उन पर हमला कर दिया। अन्य लोग तो भागने में सफल रहे, लेकिन साइकिल होने के कारण हरिहर शरण तेज नहीं भाग सके और उन्हें हमलावरों ने घेर कर बेरहमी से पीटा। हमलावर मौके पर ही दो साइकिलें छोड़कर भाग गए।

घटनास्थल पर ही राघव राम की ओर से लिखवाई गई शिकायत को राम नाथ ने लिखा और उसे उसी शाम करीब 7:00 बजे कर्नलगंज थाने में पेश किया गया, जिसके आधार पर आईपीसी की धाराओं के तहत मामला दर्ज हुआ।

इस मामले में ट्रायल कोर्ट (तीसरे अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश, गोंडा) ने जून 1981 में आरोपियों को दोषी ठहराते हुए उम्रकैद की सजा सुनाई थी। इसके बाद नवंबर 2011 में इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ बेंच ने भी इस सजा को बरकरार रखा था। अपील के लंबित रहने के दौरान ही तीन सह-आरोपियों (राम धनी, राज किशोर और देव प्रसाद) की मृत्यु हो गई, जिसके बाद उनकी अपीलों को बंद कर दिया गया। जीवित बचे तीन दोषियों—हीरा लाल, राज बक्स और सूबेदार ने हाईकोर्ट के फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी थी।

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दोनों पक्षों की दलीलें

आरोपियों के वकील ने कोर्ट में तर्क दिया कि यह घटना दिन के उजाले में नहीं बल्कि देर रात हुई थी। उन्होंने दावा किया कि पुलिस जांच पूरी होने के बाद एफआईआर को बाद की तारीख में दर्ज किया गया था। बचाव पक्ष ने इस बात पर जोर दिया कि मृतक का शव पूरी रात घटनास्थल पर ही पड़ा रहा, जो कि उनके करीबी रिश्तेदारों के अस्वाभाविक व्यवहार और पुलिस प्रक्रियाओं के बिल्कुल विपरीत है, क्योंकि पुलिस स्टेशन वहां से महज साढ़े तीन मील की दूरी पर था।

इसके साथ ही, बचाव पक्ष ने दोनों परिवारों के बीच पुरानी चुनावी और राजनीतिक रंजिश को झूठा फंसाए जाने का मुख्य कारण बताया। मेडिकल साक्ष्यों का हवाला देते हुए उन्होंने कहा कि पोस्टमार्टम रिपोर्ट के अनुसार मौत 30 जून को होने से ढाई दिन पहले तक हो सकती थी, जो चश्मदीदों के बयानों से मेल नहीं खाती। इसके अतिरिक्त, सूबेदार की ओर से घटना के समय नाबालिग होने का भी तर्क दिया गया।

दूसरी ओर, उत्तर प्रदेश राज्य के वकील अमित सक्सेना ने ट्रायल कोर्ट और हाईकोर्ट के फैसलों का बचाव किया। उन्होंने दलील दी कि तीनों चश्मदीदों के बयान पूरी तरह सुसंगत और स्वाभाविक हैं। राज्य सरकार का कहना था कि मृतक के शरीर पर मिले 17 घाव हथियारों के इस्तेमाल की पुष्टि करते हैं और मौके से बरामद साइकिलें आरोपियों की घटनास्थल पर मौजूदगी को साबित करती हैं।

सुप्रीम कोर्ट का कानूनी विश्लेषण और टिप्पणियाँ

सुप्रीम कोर्ट ने साक्ष्यों की समीक्षा करते हुए कई गंभीर विसंगतियों को चिन्हित किया, जिन्होंने अभियोजन पक्ष के दावों को पूरी तरह खारिज कर दिया।

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सबसे पहले, अदालत ने पाया कि 28 जून 1977 की पूरी रात शव सड़क किनारे लावारिस पड़ा रहा। कोर्ट ने इस पर हैरानी जताई कि नजदीकी पुलिस स्टेशन होने के बावजूद न तो पुलिस ने और न ही परिवार के सदस्यों ने शव को सुरक्षित स्थान पर ले जाने का कोई प्रयास किया। इसके अलावा, पोस्टमार्टम कराने में लगभग 48 घंटे की अकारण देरी की गई। वहीं, एफआईआर दर्ज कराने के संबंध में भी विरोधाभास दिखा; जहां शिकायतकर्ता का दावा था कि वह सिर्फ राम नाथ के साथ थाने गया था, वहीं जनरल डायरी में मृतक के ससुर और साले के भी साथ होने की बात दर्ज थी।

सबसे महत्वपूर्ण पहलू यह था कि 28 जून को दर्ज दिखाई गई एफआईआर मजिस्ट्रेट के पास 30 जून को पहुंची। इस विषय पर सुप्रीम कोर्ट ने पूर्व के दो महत्वपूर्ण निर्णयों का उल्लेख किया:

  • पाला सिंह बनाम पंजाब राज्य (1972): कोर्ट ने इस मामले में स्पष्ट किया था कि क्रिमिनल प्रोसीजर कोड (CrPC) की धारा 157 के तहत मजिस्ट्रेट को तत्काल रिपोर्ट भेजने का प्रावधान इसलिए है ताकि न्यायपालिका जांच से अवगत रहे और पुलिस जांच में किसी भी तरह के बदलाव या हेरफेर की गुंजाइश न रहे।
  • जाफरुद्दीन बनाम केरल राज्य (2022): इस मामले में कोर्ट ने फिर दोहराया था कि एफआईआर की त्वरित डिलीवरी यह सुनिश्चित करने के लिए एक आवश्यक सुरक्षा उपाय है कि आपसी विचार-विमर्श और सलाह के बाद कोई मनगढ़ंत या बढ़ा-चढ़ाकर पेश की गई कहानी न गढ़ी जा सके।

मौजूदा मामले में इन सिद्धांतों को लागू करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने टिप्पणी की कि एफआईआर भेजने में देरी का यह मामला अकेला नहीं है बल्कि इसके साथ कई अन्य संदिग्ध परिस्थितियां भी जुड़ी हुई हैं। कोर्ट ने कहा:

“ये परिस्थितियां अपने आप में यह स्थापित करने के लिए पर्याप्त रूप से निर्णायक हैं कि 28 जून, 1977 को घटना होने का अभियोजन पक्ष का संस्करण बाद में गढ़ी गई कहानी थी ताकि अभियोजन के मामले को विश्वसनीयता दी जा सके और उस मनगढ़ंत कहानी का समर्थन किया जा सके कि राघव राम (पीडब्लू-1), राम नाथ (पीडब्लू-2) और नंद लाल सिंह (पीडब्लू-4) वास्तव में इस घटना के चश्मदीद थे।”

अदालत ने माना कि यह पूरी तरह संभव है कि हमला रात के अंधेरे में हुआ हो जब वहां कोई चश्मदीद मौजूद नहीं था। अगली सुबह शव मिलने के बाद ही आरोपियों को फंसाने के लिए यह कहानी बनाई गई। सुप्रीम कोर्ट ने कहा:

“एक बार जब कथित चश्मदीदों की उपस्थिति और घटना की शुरुआत और समय के संबंध में अभियोजन पक्ष के संस्करण की सत्यता पर उचित संदेह पैदा हो जाता है, तो अभियोजन मामले का पूरा आधार ही समाप्त हो जाता है।”

बरामद साइकिलों के संबंध में भी कोर्ट ने अभियोजन के दावों को कमजोर मानते हुए खारिज कर दिया क्योंकि साइकिलों का आरोपियों से कोई सीधा संबंध साबित नहीं किया जा सका था।

सुप्रीम कोर्ट का निर्णय

इन निष्कर्षों के आधार पर सुप्रीम कोर्ट ने माना कि अभियोजन पक्ष आरोपियों के खिलाफ लगे आरोपों को बिना किसी संदेह के साबित करने में पूरी तरह विफल रहा। बेंच ने जून 1981 के ट्रायल कोर्ट और नवंबर 2011 के हाईकोर्ट के फैसलों को रद्द कर दिया।

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जीवित बचे तीनों आरोपियों—हीरा लाल, राज बक्स और सूबेदार को सभी आरोपों से बरी कर दिया गया। राज बक्स और सूबेदार जो पहले से जमानत पर थे, उन्हें बेल बॉन्ड से मुक्त कर दिया गया, जबकि हीरा लाल पहले ही रिहाई योजना के तहत रिहा हो चुके थे। बरी किए जाने के बाद कोर्ट ने सूबेदार की नाबालिग होने की याचिका पर विचार करना आवश्यक नहीं समझा।

मामले का विवरण

मामले का शीर्षक: देव प्रसाद और अन्य बनाम उत्तर प्रदेश राज्य (और संबंधित मामले)
वाद संख्या: क्रिमिनल अपील संख्या 239 वर्ष 2013 (क्रिमिनल अपील संख्या 237, 238 और 236 वर्ष 2013 के साथ)
पीठ: जस्टिस विक्रम नाथ, जस्टिस संदीप मेहता
निर्णय की तिथि: 15 जुलाई, 2026

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