लज्जा भंग करना दुष्कर्म का प्रयास नहीं: पटना हाईकोर्ट ने फोटो स्टूडियो मालिक को किया बरी

पटना हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में कहा है कि किसी महिला की लज्जा भंग करने के इरादे से की गई हरकत को कानूनन दुष्कर्म का प्रयास नहीं माना जा सकता। जस्टिस पूर्णेन्दु सिंह की एकल पीठ ने बांका की एक निचली अदालत द्वारा साल 2013 में दोषी ठहराए गए फोटो स्टूडियो मालिक हिमांशु कुमार पाठक उर्फ मिथिया पाठक को बरी करने का फैसला सुनाया है। हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि आरोपी के खिलाफ लगाए गए आरोप यदि पूरी तरह सच भी मान लिए जाएं, तो भी यह मामला अधिक से अधिक आईपीसी की धारा 354 (महिला की लज्जा भंग करना) के तहत आता है, न कि धारा 376/511 (दुष्कर्म का प्रयास) के दायरे में।

दुष्कर्म के प्रयास के दावों में कानूनी आधार की कमी

हाईकोर्ट ने अपने निर्णय में स्पष्ट किया कि दुष्कर्म के प्रयास का मामला साबित करने के लिए जो कानूनी तत्व आवश्यक हैं, वे इस मामले में मौजूद नहीं हैं। अदालत ने कहा कि मामले के रिकॉर्ड से शारीरिक संबंध बनाने (पेनिट्रेशन) या ऐसा करने की कोशिश को दर्शाने वाले किसी स्पष्ट कदम का कोई सबूत नहीं मिलता है। हालांकि, आरोपी द्वारा महिला को कमरे में बंद करना, उसकी सलवार खींचने की कोशिश करना और छेड़छाड़ करना जैसे कृत्य साबित होते हैं। अदालत के अनुसार, ये कृत्य निश्चित रूप से महिला पर बल प्रयोग और उसकी गरिमा को ठेस पहुंचाने के इरादे को दिखाते हैं, जो धारा 354 के तहत अपराध है, लेकिन इसके आधार पर दुष्कर्म के प्रयास के लिए लागू होने वाली धारा 375 और 376 (सह-पठित धारा 511) के तहत सजा नहीं दी जा सकती।

साल 2008 की घटना और निचली अदालत की सजा

यह मामला 19 जनवरी 2008 का है, जब पीड़िता अपने पिता के साथ अमरपुर स्थित ‘छाया स्टूडियो’ में फोटो खिंचवाने गई थी। अभियोजन पक्ष के अनुसार, स्टूडियो के मालिक हिमांशु पाठक ने कंप्यूटर पर फोटो दिखाने के बहाने पीड़िता के पिता को बाहर भेज दिया और अंदर से दरवाजा बंद कर लिया। इसके बाद आरोपी ने पीड़िता के साथ जबरदस्ती और छेड़छाड़ की। पीड़िता के चिल्लाने पर बाहर खड़े पिता ने दरवाजा तोड़ा, जिसके बाद आरोपी वहां से भाग खड़ा हुआ। इस संबंध में अगले दिन प्राथमिकी दर्ज कराई गई थी।

इस मामले में बांका के अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश ने साल 2013 में हिमांशु पाठक को दुष्कर्म के प्रयास और गलत तरीके से बंधक बनाने का दोषी पाया था। तब अदालत ने उसे तीन साल के सश्रम कारावास और 5,000 रुपये के जुर्माने की सजा सुनाई थी। इसके अलावा बंधक बनाने के आरोप में छह महीने की अतिरिक्त जेल की सजा भी दी गई थी, जिसे हाईकोर्ट ने अब पूरी तरह निरस्त कर दिया है।

जांच और साक्ष्यों में गंभीर खामियां

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सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने अभियोजन पक्ष की जांच प्रक्रिया में कई गंभीर कमियों की ओर इशारा किया। अदालत ने पाया कि जिस मुख्य जांच अधिकारी (आईओ) ने मामले की पूरी तफ्तीश की थी, उसे ट्रायल कोर्ट में गवाही के लिए पेश ही नहीं किया गया। इसके अलावा, मामले में चिकित्सकीय साक्ष्य (मेडिकल सबूत) की पुष्टि करने के लिए किसी भी डॉक्टर या मेडिकल ऑफिसर की गवाही नहीं कराई गई। अभियोजन पक्ष ने कुल पांच गवाहों को अदालत के सामने पेश किया था, जिनमें से एक स्वतंत्र गवाह गवाही के दौरान अपने बयान से मुकर गया था। इन तमाम कानूनी और तकनीकी कमियों को ध्यान में रखते हुए हाईकोर्ट ने आरोपी की अपील स्वीकार करते हुए उसे बरी कर दिया।

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