छूट का वादा मुकरने पर रिलायंस रिटेल को झटका, ग्राहक को 5,501 रुपये चुकाने का आदेश

जयपुर के एक उपभोक्ता को विज्ञापित छूट का लाभ न देना रिलायंस रिटेल को भारी पड़ गया है। राजस्थान राज्य उपभोक्ता विवाद निवारण आयोग ने कंपनी की इस लापरवाही को ‘अनुचित व्यापार व्यवहार’ मानते हुए पीड़ित ग्राहक को 5,501.80 रुपये का भुगतान करने का आदेश दिया है।

यह आदेश आयोग के न्यायिक सदस्य मुकेश और सदस्य रामनिवास सारस्वत की पीठ ने रिलायंस रिटेल लिमिटेड की ओर से दायर एक अपील पर सुनवाई के बाद 29 जून को जारी किया। दरअसल, रिलायंस रिटेल ने जयपुर द्वितीय जिला उपभोक्ता विवाद निवारण आयोग के 18 मार्च 2025 के फैसले के खिलाफ अपील की थी। राज्य आयोग ने जिला मंच के इस निष्कर्ष को तो सही माना कि कंपनी ने अनुचित व्यापार व्यवहार किया है, लेकिन मानसिक प्रताड़ना के एवज में लगाए गए 10,000 रुपये के जुर्माने को मामला देखते हुए बहुत अधिक माना और इसे घटाकर 500 रुपये कर दिया।

इस संशोधित आदेश के अनुसार, रिलायंस रिटेल को ग्राहक से वसूले गए अतिरिक्त 1.80 रुपये लौटाने होंगे, साथ ही मानसिक प्रताड़ना के लिए 500 रुपये का मुआवजा और कानूनी खर्च के रूप में 5,000 रुपये का भुगतान करना होगा।

क्या था पूरा विवाद

इस विवाद की शुरुआत साल 2021 की शुरुआत में रिलायंस रिटेल द्वारा चलाए गए एक न्यू ईयर प्रमोशनल कैंपेन से हुई थी, जो 3 जनवरी से 10 फरवरी 2021 तक चला था। इसी दौरान, 7 जनवरी 2021 को जयपुर के निवासी वीरेंद्र सिंह ने रिलायंस रिटेल के एक आउटलेट से 276.50 रुपये का घरेलू सामान खरीदा। बिल की जांच करने पर सिंह ने पाया कि स्टोर में सभी उत्पादों पर 6 प्रतिशत की छूट का विज्ञापन होने के बावजूद, पतंजलि बिस्कुट के पैकेट पर उनसे पूरी एमआरपी (30 रुपये) वसूली गई थी।

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यदि विज्ञापित 6 प्रतिशत की छूट लागू की जाती, तो बिस्कुट की कीमत घटकर 28.20 रुपये हो जाती। सिंह ने जब स्टोर प्रबंधन से 1.80 रुपये की अतिरिक्त वसूली वापस करने की मांग की, तो स्टोर ने इससे साफ इनकार कर दिया। इसके बाद सिंह ने उपभोक्ता फोरम में न्याय की गुहार लगाई।

कंपनी के दावों को आयोग ने किया खारिज

रिलायंस रिटेल ने शिकायत का विरोध करते हुए तर्क दिया था कि पतंजलि बिस्कुट इस प्रमोशनल स्कीम के दायरे में नहीं आते थे। कंपनी का यह भी कहना था कि चूंकि ग्राहक ने खरीदारी के समय स्टोर के कर्मचारियों से कोई शिकायत दर्ज नहीं कराई थी, इसलिए सेवा में कमी या अनुचित व्यापार व्यवहार का कोई सवाल ही नहीं उठता। इसके अलावा, कंपनी ने अपील में दलील दी थी कि महज 1.80 रुपये की रकम पर 10,000 रुपये का जुर्माना लगाना पूरी तरह अनुचित है।

राज्य आयोग ने कंपनी के इन तर्कों को स्वीकार नहीं किया। आयोग ने इस बात को रेखांकित किया कि रिलायंस रिटेल ने अपने शुरुआती लिखित बयान में 6 प्रतिशत की प्रमोशनल छूट की बात से इनकार नहीं किया था। साथ ही, कंपनी ऐसा कोई भी विज्ञापन या दस्तावेज पेश नहीं कर सकी जिससे यह साबित हो कि पतंजलि के उत्पादों को इस योजना से बाहर रखा गया था। इसके विपरीत, उपभोक्ता द्वारा पेश की गई तस्वीरों और प्रचार सामग्री से यह स्पष्ट रूप से साबित हुआ कि छूट का विज्ञापन सक्रिय था, जिससे प्रेरित होकर ग्राहक ने खरीदारी की थी।

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छोटे नुकसान पर भी उपभोक्ता अधिकारों का संरक्षण

आयोग ने स्पष्ट किया कि ओवरचार्ज की गई रकम चाहे कितनी भी छोटी क्यों न हो, ग्राहकों को भ्रामक विज्ञापन दिखाना और किए गए वादे के अनुसार छूट न देना उपभोक्ता संरक्षण कानूनों के तहत एक गंभीर उल्लंघन है।

इसके साथ ही, आयोग ने इस पुराने कानूनी सिद्धांत को भी दोहराया कि खुदरा कंपनियां ग्राहकों से उन कैरी बैग्स के लिए पैसे नहीं वसूल सकती हैं जिन पर कंपनी का लोगो छपा होता है, क्योंकि ऐसे थैले कंपनी के लिए विज्ञापन का जरिया होते हैं।

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