बेटे-बहू को घर से निकालने का आदेश गौहाटी हाईकोर्ट ने किया रद्द, कहा- ट्रिब्यूनल के लिए प्राकृतिक न्याय के नियमों का पालन जरूरी

गौहाटी हाईकोर्ट ने एक बुजुर्ग के बेटे और बहू को उनके घर से बेदखल करने के मेंटेनेंस ट्रिब्यूनल के आदेश को रद्द कर दिया है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि ट्रिब्यूनल जैसे अर्ध-न्यायिक निकायों को किसी भी मामले में फैसला लेने से पहले प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों और तय वैधानिक प्रक्रियाओं का पालन करना अनिवार्य है। जस्टिस मृदुल कुमार कलिता ने ट्रिब्यूनल द्वारा प्रक्रियात्मक खामियों और आरोपी जोड़े को सबूत पेश करने का मौका न देने की बात पाते हुए मामले को नए सिरे से सुनवाई के लिए वापस ट्रिब्यूनल के पास भेज दिया है।

बीते 14 जुलाई को आए इस फैसले में हाईकोर्ट ने स्थानीय मेंटेनेंस ट्रिब्यूनल के 29 जनवरी के उस निर्देश को खारिज कर दिया, जिसके तहत बेटे और बहू को 30 दिनों के भीतर बुजुर्ग पिता का घर खाली करने के लिए कहा गया था। अदालत ने पाया कि ट्रिब्यूनल ने आरोपी जोड़े को अपना पक्ष रखने या सबूत पेश करने का कोई मौका दिए बिना ही यह एकतरफा आदेश पारित कर दिया था।

पारिवारिक विवाद और प्रताड़ना के आरोप

इस कानूनी विवाद की शुरुआत तब हुई जब पीड़ित बुजुर्ग ने ‘माता-पिता और वरिष्ठ नागरिकों का भरण-पोषण तथा कल्याण अधिनियम, 2007’ के तहत ट्रिब्यूनल में शिकायत दर्ज कराई। पिता का आरोप था कि उनके बेटे और बहू उन्हें लगातार डराते-धमकाते हैं, प्रताड़ित करते हैं और उनका व्यवहार बेहद शत्रुतापूर्ण है। पिता का दावा था कि इस व्यवहार से तंग आकर उन्हें अपना ही घर छोड़कर होटलों और किराए के मकानों में रहने के लिए मजबूर होना पड़ा, जिससे उनके मान-सम्मान, मानसिक शांति और सुरक्षा पर गंभीर असर पड़ा।

इस बेदखली के आवेदन से पहले पिता ने भरण-पोषण के लिए भी ट्रिब्यूनल में गुहार लगाई थी। हालांकि, ट्रिब्यूनल ने शुरुआत में इसे इस आधार पर खारिज कर दिया था कि बुजुर्ग के पास अपना भरण-पोषण करने के लिए पर्याप्त वित्तीय साधन मौजूद हैं। इसके बाद पिता ने हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया, जिसने जुलाई 2025 में ट्रिब्यूनल के उस फैसले को खारिज करते हुए उन्हें 2007 के कानून की धारा 5 के तहत नए सिरे से आवेदन करने की अनुमति दी थी। इसी के बाद उन्होंने बेदखली की नई अर्जी दाखिल की थी।

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ट्रिब्यूनल के रिकॉर्ड्स में मिली गंभीर खामियां

हाईकोर्ट की सुनवाई के दौरान बेटे और बहू का पक्ष रख रहे सीनियर एडवोकेट ए के भूइयां ने दलील दी कि ट्रिब्यूनल ने बिना किसी उचित सुनवाई के ही यह आदेश जारी कर दिया, जबकि लिखित आदेश में सुनवाई की बात कही गई थी। इसके साथ ही उन्होंने ट्रिब्यूनल द्वारा ‘असम राज्य माता-पिता और वरिष्ठ नागरिकों का भरण-पोषण तथा कल्याण नियम, 2012’ का उल्लंघन करने का भी आरोप लगाया।

मामले की जांच के लिए हाईकोर्ट ने 8 अप्रैल को ट्रिब्यूनल से केस के सारे दस्तावेज मंगवाए थे। ट्रिब्यूनल द्वारा भेजे गए दस्तावेजों की फोटोकॉपी की समीक्षा करने पर हाईकोर्ट ने पाया कि ट्रिब्यूनल ने रिकॉर्ड का रखरखाव बेहद लापरवाही से किया था। केस की फाइलों में न तो कोई इंडेक्स (सूची) थी और न ही कोई क्रमिक ऑर्डर शीट (दैनिक कार्यवाही पत्रक)। जस्टिस कलिता ने पाया कि 29 जनवरी के अंतिम फैसले के अलावा ट्रिब्यूनल ने रोजाना की कार्यवाही से जुड़ा कोई भी विवरण दर्ज नहीं किया था।

अर्ध-न्यायिक निकायों की जिम्मेदारी और अधिकार क्षेत्र

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जस्टिस कलिता ने स्पष्ट किया कि यदि ट्रिब्यूनल इस निष्कर्ष पर पहुंचता है कि बच्चों या रिश्तेदारों की मौजूदगी के कारण बुजुर्ग अपने ही घर में शांति से नहीं रह पा रहे हैं और इससे उनकी सुरक्षा व सम्मान को खतरा है, तो ट्रिब्यूनल को उन्हें बेदखल करने का पूरा अधिकार है।

हालांकि, कोर्ट ने साफ कहा कि चूंकि मेंटेनेंस ट्रिब्यूनल एक अर्ध-न्यायिक निकाय के तौर पर काम करता है, इसलिए उसके लिए 2007 के अधिनियम और असम के नियमों के तहत निर्धारित कानूनी प्रक्रियाओं का कड़ाई से पालन करना अनिवार्य है। कोर्ट ने रेखांकित किया कि अदालती या अर्ध-न्यायिक कार्यवाही में दैनिक ऑर्डर शीट बनाए रखना पारदर्शिता, सार्वजनिक विश्वास, जवाबदेही और न्यायिक अनुशासन सुनिश्चित करने के लिए बेहद जरूरी है। इसके अभाव में ऊपरी अदालतों के लिए भी मामले की वास्तविक स्थिति को समझना मुश्किल हो जाता है। इसी आधार पर हाईकोर्ट ने पुराना आदेश रद्द कर ट्रिब्यूनल को निर्देश दिया कि वह प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों के तहत दोनों पक्षों को सुनकर नए सिरे से फैसला करे।

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