सुप्रीम कोर्ट ने राष्ट्रीय जांच एजेंसी (एनआईए) कानून, 2008 की संवैधानिक वैधता को चुनौती देने वाली याचिका पर केंद्र सरकार को अपना जवाब दाखिल करने के लिए चार हफ्ते का समय दिया है।
जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की बेंच ने मंगलवार को सुनवाई के दौरान यह समय सीमा तय की। केंद्र सरकार की तरफ से पेश अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल ऐश्वर्या भाटी ने इस मामले में जवाबी हलफनामा दायर करने के लिए अदालत से कुछ और समय देने का अनुरोध किया था। कोर्ट ने सरकार के इस अनुरोध को स्वीकार करते हुए स्पष्ट किया कि याचिकाकर्ता सरकार का जवाब मिलने के बाद दो सप्ताह के भीतर अपना प्रत्युत्तर (रीज्वाइंडर) दाखिल कर सकेंगे। इस मामले को अब छह हफ्ते बाद अगली सुनवाई के लिए सूचीबद्ध किया जाएगा।
इससे पहले पिछले साल 21 अप्रैल को सुप्रीम कोर्ट ने याचिका पर प्रारंभिक सुनवाई करते हुए केंद्र सरकार, एनआईए और अन्य संबंधित पक्षों को नोटिस जारी कर उनका रुख पूछा था। उस समय याचिका पर विचार करते हुए अदालत ने टिप्पणी की थी कि इस मामले में उठाए गए संवैधानिक सवाल बेहद संवेदनशील और महत्वपूर्ण हैं। सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता के वकील वरिष्ठ अधिवक्ता सिद्धार्थ दवे ने भी कोर्ट को याद दिलाया कि इस संबंध में पिछले साल अप्रैल में ही नोटिस जारी किए जा चुके हैं।
एनआईए कानून को चुनौती देने के मुख्य आधार
कोर्ट में दायर इस याचिका में साल 2008 के इस केंद्रीय कानून को पूरी तरह से रद्द करने की मांग की गई है। याचिका में दावा किया गया है कि यह अधिनियम संविधान के अनुच्छेद 14 (कानून के समक्ष समानता के अधिकार) का सीधा उल्लंघन करता है। इसके साथ ही याचिकाकर्ता का मुख्य तर्क यह है कि यह कानून बनाना संसद के विधायी अधिकार क्षेत्र से बाहर का विषय है। भारतीय संविधान के अनुसार, ‘पुलिस’ राज्य सूची का विषय है, इसलिए कानून-व्यवस्था और अपराधों की जांच का प्राथमिक जिम्मा राज्यों का है, न कि केंद्र सरकार का।
केंद्र सरकार के स्वतः संज्ञान के अधिकार पर आपत्ति
याचिका में विशेष रूप से एनआईए अधिनियम की धारा 6(5) को चुनौती दी गई है। यह धारा केंद्र सरकार को असाधारण अधिकार देती है। इसके तहत यदि केंद्र सरकार को लगता है कि कोई ऐसा गंभीर अपराध हुआ है जो इस कानून के दायरे में आता है, तो वह संबंधित राज्य सरकार की मंजूरी या सिफारिश के बिना भी सीधे (स्वतः संज्ञान लेते हुए) एनआईए को जांच शुरू करने का आदेश दे सकती है। याचिकाकर्ता का मानना है कि यह प्रावधान राज्यों की स्वायत्तता में सीधा हस्तक्षेप है।
एजेंसी की पृष्ठभूमि और गठन
राष्ट्रीय जांच एजेंसी (एनआईए) की स्थापना 2008 में संसद द्वारा पारित इसी विवादित कानून के तहत की गई थी। इसका गठन 26 नवंबर 2008 को मुंबई में हुए भीषण आतंकवादी हमलों के तत्काल बाद एक विशेष केंद्रीय आतंकवाद विरोधी कानून प्रवर्तन एजेंसी के रूप में किया गया था ताकि देश की सुरक्षा से जुड़े संवेदनशील मामलों की त्वरित और प्रभावी जांच की जा सके।

