बिना सील की गई फॉरेंसिक बरामदगी और कमजोर परिस्थितिजन्य साक्ष्य अभियोजन के लिए घातक: सुप्रीम कोर्ट ने मर्डर केस में बरी करने के फैसले को बरकरार रखा

सुप्रीम कोर्ट ने एक मर्डर केस में बड़ा फैसला सुनाते हुए महाराष्ट्र सरकार की अपीलों को खारिज कर दिया है और हत्या व आपराधिक साजिश के आरोपी तीन व्यक्तियों को बरी करने के फैसले को सही ठहराया है। जस्टिस संजय करोल और जस्टिस प्रसन्न बी. वराले की पीठ ने स्पष्ट किया कि बिना सील की गई फॉरेंसिक बरामदगी और कमजोर व टूटी हुई परिस्थितिजन्य साक्ष्यों की श्रृंखला के आधार पर किसी को दोषी नहीं ठहराया जा सकता। हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले के दो सह-आरोपियों को सबूत मिटाने (भारतीय दंड संहिता यानी आईपीसी की धारा 201) के अपराध के लिए मिली एक साल की सजा को बरकरार रखा, क्योंकि उन्हें मृतक का शव ले जाते हुए रंगे हाथों पकड़ा गया था। यह पूरा मामला साल 2007 में एक बैंक कर्मचारी की संदिग्ध मौत से जुड़ा हुआ है।

मामले की पृष्ठभूमि

यह मामला एक बैंक कर्मचारी की हत्या से जुड़ा है, जिसकी शादी साल 2001 में आरोपी नंबर 1 (पत्नी) से हुई थी। वे अपनी बेटी के साथ देवपुर के श्रमसाफल्य कॉलोनी में रहते थे। अभियोजन पक्ष का आरोप था कि उनके पड़ोस में रहने वाले आरोपी नंबर 2 (पड़ोसी) का मृतक की पत्नी के साथ प्रेम प्रसंग चल रहा था। अभियोजन के अनुसार, आरोपी नंबर 1 और आरोपी नंबर 2 ने अपने दो दोस्तों (आरोपी नंबर 3 और आरोपी नंबर 4) के साथ मिलकर पति को रास्ते से हटाने की साजिश रची।

आरोप लगाया गया कि 14 फरवरी 2007 की रात को पत्नी ने अपने पति को नींद की गोलियां और इंजेक्शन दिए, जिसके बाद सिलबट्टे (पीसने वाले पत्थर) से उसका सिर कुचलकर हत्या कर दी। इसके बाद शव को प्लास्टिक की बोरी और बेडशीट में लपेट दिया गया। अगले दिन सुबह लगभग 5:00 बजे, आरोपी नंबर 2 और आरोपी नंबर 3 शव को ठिकाने लगाने के लिए मोटरसाइकिल पर ले जा रहे थे। रास्ते में एक पुलिस कांस्टेबल ने उन्हें रोका और शक होने पर जब पोटली की जांच की गई, तो उसमें से एक इंसानी पैर बाहर निकला हुआ दिखा। पुलिस ने तुरंत दोनों को हिरासत में ले लिया और शव बरामद किया।

इसके बाद पुलिस ने आरोपी पत्नी को भी गिरफ्तार कर लिया और उसकी निशानदेही पर हत्या में इस्तेमाल सिलबट्टा, इंजेक्शन की शीशी और खून से सने कपड़े बरामद करने का दावा किया। ट्रायल कोर्ट ने पत्नी, पड़ोसी और उसके दोस्त को दोषी मानते हुए उम्रकैद की सजा सुनाई थी। हालांकि, बॉम्बे हाईकोर्ट ने परिस्थितियों की कड़ियों में गंभीर कमियां पाते हुए हत्या और साजिश के आरोपों से तीनों को बरी कर दिया, लेकिन पड़ोसी और उसके दोस्त को शव ठिकाने लगाने के प्रयास (धारा 201) के तहत दोषी माना और उन्हें एक साल की सजा सुनाई। इस फैसले के खिलाफ महाराष्ट्र सरकार और मृतक की मां ने सुप्रीम कोर्ट का रुख किया था।

दोनों पक्षों की दलीलें

अपीलकर्ता (महाराष्ट्र राज्य) की ओर से:

वरिष्ठ वकील ने दलील दी कि पत्नी और पड़ोसी के बीच अवैध संबंधों ने हत्या की साजिश के लिए एक मजबूत मोटिव (मंसा) प्रदान किया था। मेडिकल रिपोर्ट से साफ है कि मृतक की मौत सिर में गंभीर चोट लगने और इंजेक्शन के निशानों के कारण हुई, जो कि एक हत्या थी। इसके अलावा, पत्नी के इशारे पर सिलबट्टे की बरामदगी और पड़ोसी व उसके दोस्त का रंगे हाथों शव ले जाते हुए पकड़ा जाना इस बात के पुख्ता सबूत हैं कि उन्होंने ही यह अपराध किया था। केमिकल एनालाइजर (सीए) की रिपोर्ट में भी मोटरसाइकिल के साइलेंसर पर मिला खून मृतक के ब्लड ग्रुप ‘ए’ से मेल खाता है।

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बचाव पक्ष (आरोपी) की ओर से:

बचाव पक्ष के वरिष्ठ वकील ने तर्क दिया कि पूरा मामला केवल परिस्थितिजन्य साक्ष्यों पर आधारित है। रिकॉर्ड पर ऐसा कोई कानूनी सबूत नहीं है जिससे यह साबित हो सके कि दोनों के बीच कोई प्रेम संबंध था। केवल फोन कॉल रिकॉर्ड से प्रेम संबंध साबित नहीं होते। यह भी तर्क दिया गया कि मृतक की मौत किसी दुर्घटना में हुई थी और आरोपियों को मौके से गिरफ्तार नहीं किया गया था। कॉल लॉग से यह भी पता चलता है कि घटना की रात पत्नी के फोन से पड़ोसी को कोई कॉल नहीं की गई थी, और घर की तलाशी का पंचनामा पुलिस द्वारा फर्जी तरीके से कोरे कागजों पर हस्ताक्षर लेकर तैयार किया गया था।

सुप्रीम कोर्ट का कानूनी विश्लेषण

सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले की जांच के लिए ‘शरद बिरधीचंद सारदा बनाम महाराष्ट्र राज्य’ (1984) के ऐतिहासिक फैसले में निर्धारित कानूनी सिद्धांतों का सहारा लिया। कोर्ट ने रेखांकित किया कि परिस्थितियों पर आधारित मामलों में अभियोजन को एक ऐसी अटूट कड़ी साबित करनी होती है जो केवल और केवल आरोपियों के दोषी होने की ओर इशारा करे।

1. मोटिव (मकसद) और ‘लास्ट सीन’ थ्योरी की विफलता

सुप्रीम कोर्ट ने पाया कि गवाहों के बयानों से केवल यह साबित होता है कि पड़ोसी की ओर से एकतरफा झुकाव था, न कि दोनों के बीच आपसी प्रेम संबंध। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि केवल टेलीफोन रिकॉर्ड को अवैध संबंध का पुख्ता सबूत नहीं माना जा सकता। इसके अलावा, मृतक को आखिरी बार पत्नी के साथ घर में जीवित देखने वाले गवाह (सहकर्मी) का व्यवहार भी काफी अप्राकृतिक था, क्योंकि उसके पास मृतक के घर के बाहर स्कूटर पर इंतजार करने की कोई ठोस वजह नहीं थी। पत्नी का यह बचाव काफी हद तक संभावित लगता है कि उसका पति अपनी मर्जी से दोस्तों के साथ पार्टी करने बाहर गया था। चूंकि मौत का सटीक समय साबित नहीं हो सका, इसलिए कोर्ट ने ‘लास्ट सीन’ (आखरी बार साथ देखे जाने) के सिद्धांत को बेहद कमजोर माना।

2. डिजिटल और टेलीफोनिक साक्ष्यों में विरोधाभास

कॉल डिटेल रिकॉर्ड ने अभियोजन की उस कहानी को पूरी तरह खारिज कर दिया जिसमें कहा गया था कि पत्नी ने फोन करके पड़ोसी को अपने घर बुलाया था। रिकॉर्ड के अनुसार, उस रात पत्नी के फोन से पड़ोसी को एक भी आउटगोइंग कॉल नहीं की गई थी। इसके विपरीत, मृतक का फोन घर पर ही बरामद हुआ था, जिससे यह साबित होता है कि वह अपना फोन घर भूल गया था और पड़ोसी के फोन से अपने घर पर आने वाले कॉल शायद मृतक ने ही किए थे।

3. फॉरेंसिक बरामदगी में गंभीर पुलिस लापरवाही

कोर्ट ने जांच अधिकारी द्वारा की गई गंभीर प्रक्रियात्मक खामियों को उजागर किया। घटना के बाद पत्नी के घर और कूड़े के ढेर से बरामद किए गए कथित सबूतों (जैसे सिलबट्टा और कपड़े) को मौके पर सील नहीं किया गया था। अशरफ हुसैन शाह बनाम महाराष्ट्र राज्य (1996), तुलसीराम भानुदास कांबले बनाम महाराष्ट्र राज्य (1999), और सलीम अख्तर उर्फ ​​मोटा बनाम उत्तर प्रदेश राज्य (2003) के फैसलों का हवाला देते हुए सुप्रीम कोर्ट ने टिप्पणी की: भारतीय साक्ष्य अधिनियम, 1872 की धारा 27 के तहत बिना लाह की सील (लाख की सील) लगाए की गई बरामदगी का कानूनन कोई साक्ष्य मूल्य नहीं होता है

सीलिंग न होने के कारण इन बरामदगियों की सत्यता पर गहरा संदेह पैदा होता है, जिससे केमिकल एनालाइजर की रिपोर्ट भी अविश्वसनीय हो जाती है। इसके अलावा, अभियोजन का दावा था कि मृतक को बिस्तर पर बेरहमी से मारा गया था, लेकिन घर के गद्दों, चादरों या तकियों पर खून का एक भी कतरा नहीं मिला, जो अभियोजन की कहानी को भौतिक रूप से झूठा साबित करता है।

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4. आपराधिक साजिश साबित करने में विफलता

आपराधिक साजिश (धारा 120B) के आरोप पर कोर्ट ने स्टेट (एनसीटी दिल्ली) बनाम नवजोत संधू (2005) और माघवेन्द्र प्रताप सिंह उर्फ पंकज सिंह बनाम छत्तीसगढ़ राज्य (2024) के फैसलों का जिक्र करते हुए कहा: आपराधिक साजिश के अपराध को साबित करने के लिए, साजिशकर्ताओं के बीच साझा उद्देश्य के लिए आपसी सहमति या विचारों का मिलन (मीटिंग ऑफ माइंड्स) दिखाना अनिवार्य है।

चूंकि मोटिव साबित नहीं हो सका, ‘लास्ट सीन’ थ्योरी फेल हो गई और फॉरेंसिक सबूत भी सीलिंग न होने के कारण खारिज हो गए, इसलिए साजिश साबित करने वाली परिस्थितिजन्य साक्ष्यों की कड़ी पूरी तरह टूट गई। सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट रूप से टिप्पणी की: संदेह को कानूनी सबूत का स्थान लेने की अनुमति नहीं दी जानी चाहिए।

5. धारा 201 के तहत सबूत मिटाने की सजा बरकरार

भले ही हत्या और साजिश के आरोप साबित नहीं हो सके, लेकिन पड़ोसी और उसके दोस्त के खिलाफ सबूत मिटाने के पर्याप्त सबूत मौजूद थे। उन्हें सुबह 5:00 बजे एक संदिग्ध पोटली के साथ पकड़ा गया था, जिसमें से मृतक का पैर बाहर दिख रहा था। साथ ही, मोटरसाइकिल के साइलेंसर पर मिला खून मृतक के ब्लड ग्रुप से मैच हुआ था। इससे स्पष्ट रूप से साबित होता है कि उन्होंने जानबूझकर शव को छुपाने और असली अपराधियों को बचाने का प्रयास किया था। इसलिए, हाईकोर्ट द्वारा उन्हें दी गई एक साल की सजा पूरी तरह कानूनी है।

सुप्रीम कोर्ट का निर्णय

सुप्रीम कोर्ट ने बॉम्बे हाईकोर्ट के फैसले में किसी भी तरह की त्रुटि न पाते हुए उसे पूरी तरह सही ठहराया। कोर्ट ने मृतक की पत्नी, पड़ोसी और उसके दोस्त को हत्या (धारा 302/34) और आपराधिक साजिश (धारा 120B) के आरोपों से बरी करने के फैसले को बरकरार रखा। इसके साथ ही, पड़ोसी और उसके दोस्त को धारा 201/34 के तहत दी गई एक साल की सजा की भी पुष्टि की। चूंकि दोनों अपनी यह सजा पहले ही काट चुके हैं, इसलिए उनकी रिहाई के आदेश में किसी हस्तक्षेप की आवश्यकता नहीं है। इस प्रकार, महाराष्ट्र सरकार द्वारा दायर सभी अपीलें खारिज कर दी गईं।

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मामले का विवरण

मामले का शीर्षक: महाराष्ट्र राज्य बनाम मोनिका किरण सूर्यवंशी एवं अन्य
वाद संख्या: क्रिमिनल अपील संख्या 2282-2284 वर्ष 2011 (साथ में क्रिमिनल अपील संख्या 2286-2288 वर्ष 2011)
पीठ: जस्टिस संजय करोल, जस्टिस प्रसन्न बी. वराले
निर्णय की तिथि: 13 जुलाई, 2026

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