सुप्रीम कोर्ट ने चारा घोटाला मामले में बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री लालू प्रसाद यादव को मिली जमानत को चुनौती देने वाली केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो (सीबीआई) की याचिका को मंगलवार को खारिज कर दिया। अदालत ने निचली अदालत के फैसले में हस्तक्षेप करने से इनकार करते हुए झारखंड हाईकोर्ट को निर्देश दिया कि वह लालू यादव की दोषसिद्धि और सजा के खिलाफ दायर मुख्य अपीलों पर जल्द सुनवाई करे और अधिमानतः छह महीने के भीतर इनका निपटारा करे।
जस्टिस एमएम सुंदरेश और जस्टिस पीबी वराले की पीठ ने साल 2020 से लंबित इस मामले का निपटारा करते हुए कहा कि अपील 2018 की है, इसलिए हाईकोर्ट के लिए मुख्य अपीलों पर जल्द से जल्द सुनवाई करना ही उचित होगा। इसके साथ ही शीर्ष अदालत ने इस मामले से जुड़े कानूनी सवालों को भविष्य के लिए खुला रखा है।
अदालत में दोनों पक्षों की दलीलें
सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई के दौरान मुख्य बहस इस बात पर केंद्रित थी कि क्या झारखंड हाईकोर्ट ने लालू यादव को जमानत देने में अपने न्यायिक अधिकार का सही इस्तेमाल किया था। सीबीआई की ओर से पेश अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल (एएसजी) एसवी राजू ने तर्क दिया कि हाईकोर्ट ने सजा को निलंबित करने में तथ्यात्मक गलती की। उन्होंने कहा कि हाईकोर्ट का यह मानना गलत था कि लालू यादव अपनी आधी सजा काट चुके हैं।
राजू ने दलील दी कि चूंकि लालू यादव को मिली सजाएं एक के बाद एक (कॉन्जक्यूटिव) चलनी थीं न कि एक साथ (कनकरेंट), इसलिए जमानत देने के लिए किया गया गणना का तरीका गलत था। जांच एजेंसी ने लालू यादव को इस करोड़ों रुपये के घोटाले का मुख्य साजिशकर्ता और लाभार्थी बताते हुए आरोप लगाया कि उन्होंने अपने पद का दुरुपयोग किया और जाली दस्तावेजों के आधार पर सरकारी धन का गबन किया। इसके साथ ही सीबीआई ने उन पर मुकदमे की सुनवाई में देरी करने का भी आरोप लगाया।
दूसरी तरफ, लालू यादव का पक्ष रख रहे वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल ने सीबीआई के तर्कों का कड़ा विरोध किया। सिब्बल ने कहा कि पहली सजा पूरी होने के बाद ही दूसरी सजा शुरू होने की दलील पूरी तरह गलत है। उन्होंने तर्क दिया कि हाईकोर्ट के न्यायाधीश ने पूरी तरह से तय मानदंडों का पालन किया है और जमानत देना पूरी तरह से न्यायाधीश के विवेक के दायरे में था।
मामले की पृष्ठभूमि और दोषसिद्धि
यह पूरा मामला 1991 से 1994 के बीच देवघर कोषागार से 89 लाख रुपये की अवैध निकासी से जुड़ा है। इस अवधि के दौरान लालू प्रसाद यादव बिहार के मुख्यमंत्री थे।
इस मामले में रांची की विशेष सीबीआई अदालत ने दिसंबर 2017 में लालू यादव को भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) और भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम की विभिन्न धाराओं के तहत दोषी ठहराया था और उन्हें कुल सात साल कैद की सजा सुनाई थी।
इसके बाद, झारखंड हाईकोर्ट ने जुलाई 2019 में लालू यादव की सजा को निलंबित करते हुए उन्हें जमानत दे दी थी। सीबीआई ने इस फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी थी, जिस पर शीर्ष अदालत ने फरवरी 2020 में औपचारिक नोटिस जारी किया था और तब से यह मामला लंबित था।

