नागरिकता विवाद: कर्नाटक हाईकोर्ट ने पश्चिम बंगाल सरकार को लगाई फटकार, अंतिम सुनवाई के लिए 23 जुलाई की तारीख तय

कर्नाटक हाईकोर्ट ने संदिग्ध बांग्लादेशी नागरिक बताकर बेंगलुरु में हिरासत में लिए गए एक स्कूल बस ड्राइवर की नागरिकता से जुड़े मामले में टालमटोल रवैया अपनाने पर पश्चिम बंगाल सरकार को कड़ी फटकार लगाई है। जस्टिस सूरज गोविंदराज ने साफ किया कि इस मामले में आगे कोई समय नहीं दिया जाएगा। कोर्ट ने सभी पक्षों को आगामी 23 जुलाई की सुनवाई से पहले अपने अंतिम दस्तावेज सौंपने का निर्देश दिया है।

दरअसल, सोमवार को सुनवाई के दौरान पश्चिम बंगाल सरकार के वकील ने नागरिकता से जुड़े दस्तावेजों की दोबारा जांच का हवाला देते हुए दो हफ्ते का समय और मांगा था, जिसे हाईकोर्ट ने पूरी तरह खारिज कर दिया। जस्टिस गोविंदराज ने तीखी नाराजगी जताते हुए कहा कि बार-बार समय मांगना सही नहीं है और इससे अदालत के साथ-साथ सभी पक्षों का वक्त बर्बाद हो रहा है।

पश्चिम बंगाल सरकार की ओर से पेश वकील महेंद्र गौड़ा सी.आर. ने दलील दी कि राज्य में नए अधिकारियों की नियुक्ति हुई है, जो कोर्ट में दाखिल फाइलों की समीक्षा करना चाहते हैं। हालांकि, उन्होंने स्पष्ट किया कि राज्य सरकार पहले से दाखिल की गई अपनी रिपोर्ट के उलट कोई नया हलफनामा दाखिल करने नहीं जा रही है।

पहले मिल चुकी है नागरिकता की आधिकारिक मंजूरी

याचिकाकर्ता रफ़ीकुल बिस्वास (32 वर्ष) मूल रूप से पश्चिम बंगाल के नादिया जिले के रहने वाले हैं और उनका दावा है कि वह जन्म से भारतीय नागरिक हैं। उनके वकील क्लिफ्टन डी. रोजारियो ने अदालत को बताया कि पश्चिम बंगाल की दो सरकारी एजेंसियां पहले ही बिस्वास के भारतीय नागरिक होने की पुष्टि कर चुकी हैं।

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अक्टूबर 2025 में कृष्णनगर पुलिस जिला के पुलिस अधीक्षक (एसपी) और स्थानीय ब्लॉक डेवलपमेंट ऑफिसर (बीडीओ) ने इस मामले की गहन जांच की थी और बिस्वास को आधिकारिक तौर पर भारतीय नागरिक घोषित किया था। यह जांच रिपोर्ट पहले से ही अदालती रिकॉर्ड का हिस्सा है।

गहन चुनावी समीक्षा और वोटर आईडी का प्रमाण

बिस्वास के वकील ने कोर्ट के सामने एक और महत्वपूर्ण तथ्य रखते हुए बताया कि बिस्वास और उनके परिवार का नाम हाल ही में चुनाव आयोग की अत्यंत सतर्कता वाली ‘स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन’ (एसआईआर) प्रक्रिया के तहत जांचा गया है, जिसके बाद उन्हें नया वोटर आईडी कार्ड भी जारी किया गया है।

फॉरेनर्स रीजनल रजिस्ट्रेशन ऑफिस (एफआरआरओ) की तरफ से पेश हुए डिप्टी सॉलिसिटर जनरल शांति भूषण ने भी इस दलील का समर्थन किया। उन्होंने मौखिक रूप से स्वीकार किया कि यदि किसी व्यक्ति को चुनाव आयोग की इतनी गहन समीक्षा प्रक्रिया से गुजरने के बाद वोटर आईडी जारी कर दिया गया है, तो फिर नागरिकता को लेकर कोई विवाद शेष नहीं रह जाता।

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हिरासत और खराब स्वास्थ्य का घटनाक्रम

बेंगलुरु में स्कूल बस चलाने और कबाड़ का व्यवसाय करने वाले रफ़ीकुल बिस्वास को पिछले साल सितंबर में स्थानीय पुलिस ने बांग्लादेशी नागरिक होने के संदेह में हिरासत में लिया था। पुलिस ने एक जन्म प्रमाण पत्र और फोटोयुक्त पहचान पत्र पेश कर दावा किया था कि वह अवैध रूप से देश में रह रहे हैं। इसके तुरंत बाद, बिस्वास ने एफआरआरओ के हिरासत आदेश को रद्द कराने और तुरंत रिहाई की मांग को लेकर हाईकोर्ट में याचिका दायर की थी।

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हिरासत में लिए जाने के कुछ ही दिनों बाद बिस्वास को दिल का दौरा पड़ा था, जिसके कारण उन्हें अस्पताल में भर्ती कराना पड़ा। इसके बाद 19 दिसंबर को दोबारा दिल का दौरा पड़ने पर उन्हें खराब स्वास्थ्य के आधार पर हिरासत से रिहा कर दिया गया था।

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