लोकतंत्र में सरकार विरोधी नारेबाजी राजद्रोह नहीं: पंजाब और हरियाणा हाईकोर्ट का बड़ा फैसला

लोकतंत्र में सरकार या प्रशासन के खिलाफ नारेबाजी करना अपने आप में राजद्रोह की श्रेणी में नहीं आता। पंजाब और हरियाणा हाईकोर्ट ने एक मामले की सुनवाई के दौरान यह महत्वपूर्ण टिप्पणी की है। इसके साथ ही कोर्ट ने साल 2017 में डेरा सच्चा सौदा प्रमुख गुरमीत राम रहीम को बलात्कार के मामले में सजा सुनाए जाने के बाद भड़की हिंसा के दौरान एक सरकारी बिजली दफ्तर में तोड़फोड़ और आगजनी करने के आरोपियों को बरी करने के फैसले को पूरी तरह सही ठहराया है।

जस्टिस विनोद एस भारद्वाज और जस्टिस सुखविंदर कौर की बेंच ने हरियाणा सरकार की उस अपील को खारिज कर दिया, जिसमें निचली अदालत द्वारा आरोपियों को बरी किए जाने के फैसले को चुनौती दी गई थी। इन आरोपियों पर भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 124ए (राजद्रोह) समेत कई अन्य गंभीर आरोप लगाए गए थे।

नारेबाजी राजद्रोह नहीं, हिंसक प्रदर्शन दंगा हो सकता है

हाईकोर्ट ने अपने फैसले में स्पष्ट किया कि कोई हिंसक प्रदर्शन दंगे की श्रेणी में तो आ सकता है, लेकिन इसे सरकार के प्रति नफरत या अवमानना फैलाने वाली गतिविधि नहीं माना जा सकता। कोर्ट ने कहा कि लोकतांत्रिक व्यवस्था में सरकार या उसके प्रशासनिक अंगों के खिलाफ नारेबाजी करना विरोध दर्ज कराने का एक सामान्य जरिया है, और इसके आधार पर नागरिकों पर राजद्रोह की धाराएं नहीं लगाई जा सकतीं।

फॉरेंसिक रिपोर्ट और गवाहों के बयानों में भारी कमियां

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हाईकोर्ट ने अपने फैसले में अभियोजन पक्ष (पुलिस) की जांच पर गंभीर सवाल उठाए। कोर्ट ने नोट किया कि सरकारी गवाह अदालत में यह साबित करने में नाकाम रहे कि आरोपी घटना के समय मौके पर मौजूद थे। इस पर सरकार के वकील भी कोई ठोस दलील नहीं दे सके।

इसके साथ ही, मामले में वैज्ञानिक और फॉरेंसिक सबूत भी पुलिस के दावों से मेल नहीं खा रहे थे। पुलिस का आरोप था कि भीड़ ने पेट्रोल बम फेंककर उत्तर हरियाणा बिजली वितरण निगम (UHBVN) के दफ्तर में आग लगाई थी। लेकिन मधुबन स्थित फॉरेंसिक साइंस लेबोरेटरी (FSL) की जांच रिपोर्ट में जले हुए सामानों पर पेट्रोल, डीजल, केरोसिन या उनके किसी भी अवशेष के अंश नहीं पाए गए।

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संदेह और अनुमान कानूनी सबूत नहीं

हाईकोर्ट ने राज्य सरकार की उस दलील को पूरी तरह खारिज कर दिया, जिसमें कहा गया था कि निचली अदालत ने गवाहों और सबूतों का सही मूल्यांकन नहीं किया। कोर्ट ने कहा कि आरोपियों को केवल छोटी-मोटी तकनीकी खामियों के आधार पर बरी नहीं किया गया है, बल्कि जांच में गंभीर विरोधाभास, अधूरी पड़ताल, संदिग्ध बरामदगी, पहचान का अभाव और फॉरेंसिक पुष्टि न होने के कारण रिहा किया गया है।

अदालत ने सख्त लहजे में कहा कि किसी भी मामले में आरोपियों का दोष साबित करने की पूरी जिम्मेदारी अभियोजन पक्ष की होती है। कोर्ट ने साफ किया कि केवल संदेह और अनुमानों को कानूनी सबूत के तौर पर स्वीकार नहीं किया जा सकता।

क्या था पूरा मामला?

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यह पूरा मामला 25 अगस्त 2017 का है, जब साध्वी यौन शोषण मामले में डेरा प्रमुख गुरमीत राम रहीम को दोषी ठहराया गया था। इसके तुरंत बाद कैथल के कलायत में हिंसक प्रदर्शन शुरू हो गए थे। पुलिस के अनुसार, लाठियों, गंडासियों (कुल्हाड़ी जैसा हथियार) और पेट्रोल की बोतलों से लैस 14-15 लोगों की हिंसक भीड़ ने कलायत स्थित बिजली दफ्तर पर धावा बोल दिया था। इस भीड़ पर सरकारी संपत्ति को नुकसान पहुंचाने, कंप्यूटर तोड़ने, आगजनी करने और राम रहीम के पक्ष में नारेबाजी करने का आरोप था।

निचली अदालत ने सबूतों के अभाव में सभी आरोपियों को बरी कर दिया था, जिस पर अब हाईकोर्ट ने भी अपनी अंतिम मुहर लगा दी है।

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