लड़कों के स्कूल में महिला टीचर की तैनाती से नहीं कर सकते इनकार, मद्रास हाईकोर्ट का बड़ा फैसला

मद्रास हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए कहा है कि सरकारी सहायता प्राप्त लड़कों के स्कूलों (बॉयज स्कूल्स) में बुनियादी ढांचे या सुविधाओं की कमी का हवाला देकर महिला शिक्षकों की नियुक्ति को खारिज नहीं किया जा सकता। अदालत ने स्पष्ट किया कि राज्य के कानूनों और नियमों में इस तरह की नियुक्तियों पर कोई रोक नहीं है।

जस्टिस बी पुगलेंधी की एकल पीठ ने राज्य के शिक्षा अधिकारियों और विरुधुनगर जिला मुख्य शिक्षा अधिकारी को एक महिला ड्राइंग टीचर के रुके हुए तबादले के आदेश पर नए सिरे से विचार करने का निर्देश दिया है। अदालत ने स्कूल के विरोध को पूरी तरह से कानूनी आधारहीन माना और अधिकारियों की इस बात के लिए आलोचना की कि उन्होंने इस मामले में स्वतंत्र रूप से निर्णय लेने के बजाय स्कूल के दबाव में काम किया।

3 जुलाई को जारी अपने आदेश में हाईकोर्ट ने साफ किया कि तमिलनाडु प्राइवेट स्कूल्स एक्ट या इससे जुड़े नियमों में ऐसा कोई प्रावधान नहीं है जो महिला शिक्षकों को लड़कों के स्कूलों में तैनात होने से रोकता हो। अदालत ने इस बात को भी रेखांकित किया कि संबंधित महिला शिक्षिका पहले ही कोर्ट में यह लिखित अंडरटेकिंग (सहमति पत्र) दे चुकी हैं कि वे महिला होने के नाते स्कूल से किसी भी तरह की विशेष सुविधा या अतिरिक्त बुनियादी ढांचे की मांग नहीं करेंगी।

तबादले को लेकर विवाद की पृष्ठभूमि

यह पूरा विवाद शैक्षणिक वर्ष 2024-2025 के दौरान शुरू हुआ, जब याचिकाकर्ता शिक्षिका को श्री रेणुगा हिंदू हाई स्कूल में ‘सरप्लस’ (अतिरिक्त) घोषित किया गया था। इसके बाद, 28 मई 2025 को अधिकारियों ने उनका तबादला विरुधुनगर जिले के ही एक सरकारी सहायता प्राप्त गैर-अल्पसंख्यक निजी स्कूल, गुरुज्ञान संपंदर हिंदू हायर सेकेंडरी स्कूल में कर दिया, जो कि केवल लड़कों का स्कूल है।

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हालांकि, इस स्कूल ने उन्हें ज्वाइन कराने से साफ इनकार कर दिया। स्कूल प्रशासन का तर्क था कि उनके पास कोई महिला स्टाफ नहीं है और न ही महिला शिक्षक के अनुकूल आवश्यक भौतिक ढांचा उपलब्ध है। शिक्षा विभाग के अधिकारियों ने इस तबादला आदेश को सख्ती से लागू कराने के बजाय, स्कूल के विरोध के आगे घुटने टेक दिए और शिक्षिका को किसी अन्य स्कूल में भेजने का प्रयास किया।

इसके बाद पीड़ित शिक्षिका ने हाईकोर्ट का रुख किया। कानूनी लड़ाई के पहले चरण में शिक्षिका ने कोर्ट को लिखित भरोसा दिया कि वे अतिरिक्त सुविधाओं की मांग नहीं करेंगी। इस पर सुनवाई करते हुए हाईकोर्ट ने 6 नवंबर 2025 को अधिकारियों को उनके तबादले पर पुनर्विचार करने का निर्देश दिया था। लेकिन अधिकारियों ने खुद निर्णय लेने के बजाय फिर से स्कूल प्रबंधन से राय मांगी। स्कूल के दोबारा इनकार करने पर अधिकारियों ने एक बार फिर शिक्षिका को कहीं और भेजने की कोशिश की, जिसके बाद यह मामला दोबारा अदालत पहुंचा।

देरी से होने वाले तबादलों पर कोर्ट की चिंता

हाईकोर्ट ने शिक्षकों के तबादलों को लागू करने में होने वाली अत्यधिक देरी पर भी गहरी चिंता व्यक्त की। कोर्ट ने पाया कि याचिकाकर्ता को शैक्षणिक वर्ष 2024-2025 में ही अतिरिक्त घोषित कर दिया गया था, लेकिन उनका तबादला आदेश सत्र के बिल्कुल अंत में यानी 28 मई 2025 को जारी किया गया, जिसका अधिकारियों के पास कोई स्पष्ट कारण या स्पष्टीकरण नहीं था।

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जस्टिस पुगलेंधी ने गंभीर टिप्पणी करते हुए कहा कि राज्य सरकार हर साल शिक्षकों के वेतन पर कई सौ करोड़ रुपये खर्च करती है। ऐसे में सरकार का यह दायित्व बनता है कि वह इस सार्वजनिक धन का सही उपयोग सुनिश्चित करे और शिक्षकों को वहीं तैनात करे जहां उनकी सेवाओं की सबसे ज्यादा जरूरत है।

अदालत ने अपने फैसले में निष्कर्ष निकाला कि जरूरत न होने के बावजूद सरप्लस शिक्षकों को पुराने स्कूलों में बनाए रखना और जहां पद खाली हैं वहां नियुक्ति न करना, पूरी तबादला प्रणाली के उद्देश्य को विफल करता है। इससे सरकारी खजाने पर बिना किसी उपयोग के अतिरिक्त वित्तीय बोझ पड़ता है।

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