बॉम्बे डाइंग मामले में राहत के खिलाफ सेबी की याचिका पर सुप्रीम कोर्ट का नोटिस, ट्रिब्यूनल के फैसले पर रोक लगाने से इनकार

सुप्रीम कोर्ट ने बॉम्बे डाइंग एंड मैन्युफैक्चरिंग कंपनी लिमिटेड और उसके प्रमोटरों को क्लीन चिट देने वाले प्रतिभूति अपीलीय न्यायाधिकरण (SAT) के फैसले पर रोक लगाने से सोमवार को इनकार कर दिया। हालांकि, कोर्ट ने इस मामले में बाजार नियामक सेबी (SEBI) की अपील पर सुनवाई करने की सहमति जताते हुए संबंधित पक्षों को नोटिस जारी किया है। इसके साथ ही अदालत ने स्पष्ट किया कि ट्रिब्यूनल के इस खंडित फैसले को भविष्य के किसी भी मामले में कानूनी नजीर के तौर पर इस्तेमाल नहीं किया जा सकेगा।

जस्टिस बीवी नागरत्ना और जस्टिस आर महादेवन की पीठ ने सेबी की याचिका पर सुनवाई करते हुए वाडिया ग्रुप के कानूनी सलाहकारों को जवाब दाखिल करने के लिए कहा है। बेंच ने अपने आदेश में विशेष रूप से कहा कि चूंकि सैट का यह फैसला 2:1 के बहुमत से आया एक खंडित फैसला था, इसलिए इसे ट्रिब्यूनल के समक्ष आने वाले इसी तरह के अन्य मामलों में मिसाल नहीं माना जाना चाहिए।

नियामक विवाद की पृष्ठभूमि

यह पूरा विवाद सैट के 16 जनवरी के उस फैसले से जुड़ा है, जिसमें उसने सेबी के अक्टूबर 2022 के आदेश को पलट दिया था। सेबी ने अपने तत्कालीन आदेश में बॉम्बे डाइंग, उसके कई मौजूदा व पूर्व प्रमोटरों और निदेशकों पर प्रतिभूति बाजार में कारोबार करने और किसी भी लिस्टेड कंपनी में महत्वपूर्ण प्रबंधकीय पद संभालने पर रोक लगा दी थी।

सेबी ने यह कार्रवाई जून 2021 में जारी किए गए कारण बताओ नोटिस के बाद की थी। नियामक का आरोप था कि वाडिया ग्रुप की दो कंपनियों—बॉम्बे डाइंग और स्कैल सर्विसेज लिमिटेड (SCAL Services)—के बीच मुंबई में फ्लैटों की थोक बिक्री के लिए किए गए 11 समझौता ज्ञापनों (MoUs) का एकमात्र उद्देश्य बॉम्बे डाइंग के राजस्व को फर्जी तरीके से बढ़ाना था। हालांकि, सैट की बहुमत वाली पीठ ने पाया कि सेबी यह साबित करने में पूरी तरह विफल रहा कि ये समझौते धोखाधड़ी वाले थे या वित्तीय स्थिति को गलत तरीके से पेश करने के लिए किए गए थे।

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संदेह के घेरे में आए लेन-देन का ब्योरा

सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई के दौरान सेबी की ओर से पेश वरिष्ठ वकील अरविंद दातार ने विवादित लेन-देन की विस्तृत जानकारी दी। उन्होंने बताया कि शुरुआत में बॉम्बे डाइंग के पास स्कैल सर्विसेज में 49 प्रतिशत हिस्सेदारी थी। 29 मार्च 2012 को बॉम्बे डाइंग ने अपनी हिस्सेदारी घटाकर 19 प्रतिशत से भी कम कर दी, जिसके बाद नियमों के तहत स्कैल उसकी सहयोगी कंपनी नहीं रह गई।

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दातार ने दलील दी कि यह 30 प्रतिशत हिस्सेदारी किसी स्वतंत्र तीसरे पक्ष को बेचने के बजाय वाडिया ग्रुप की ही एक अन्य इकाई को ट्रांसफर कर दी गई थी। इस ट्रांसफर के ठीक अगले ही दिन पहला समझौता हुआ और अगले दो वर्षों में कुल 3,000 करोड़ रुपये से अधिक के 11 समझौतों को अंजाम दिया गया।

सेबी की जांच के मुताबिक, बॉम्बे डाइंग ने इन समझौतों से प्राप्त रकम को अपने खातों में बिक्री के रूप में दर्ज किया, जबकि स्कैल सर्विसेज ने अपनी किताबों में इसकी कोई खरीद दर्ज नहीं की और केवल एक एजेंसी कमीशन ही दिखाया।

अदालत में दोनों पक्षों की दलीलें

सेबी के वकील ने कोर्ट से फैसले पर रोक लगाने की मांग करते हुए तर्क दिया कि सैट के इस फैसले से सहयोगी कंपनियों की परिभाषा, ‘सिंगल इकोनॉमिक एंटिटी’ के सिद्धांत और कॉर्पोरेट पर्दे को हटाने जैसे महत्वपूर्ण कानूनी सवाल खड़े होते हैं।

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दूसरी तरफ, वाडिया ग्रुप के चेयरमैन नुसली वाडिया और बॉम्बे डाइंग के वकीलों ने सेबी की इस मांग का कड़ा विरोध किया। कंपनी की ओर से पेश वरिष्ठ वकील अभिषेक मनु सिंघवी और डेरियस खंबाता ने कहा कि उनके मुवक्किलों ने सभी कानूनी और नियामक दिशानिर्देशों का पूरी तरह पालन किया है।

बचाव पक्ष के वकीलों ने दलील दी कि सैट ने मामले के तथ्यों के आधार पर कंपनी और उसके प्रमोटरों को पूरी तरह क्लीन चिट दी है। उन्होंने इस बात पर भी जोर किया कि सेबी ने ट्रिब्यूनल के उन कई निष्कर्षों को चुनौती नहीं दी है जो इन लेन-देनों की वैधता को सही ठहराते हैं।

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