सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला: सरकारी अनुकंपा सहायता के नाम पर आश्रित मां का मोटर दुर्घटना मुआवजा नहीं काटा जा सकता

सुप्रीम कोर्ट ने हरियाणा के एक सड़क हादसे से जुड़े मुआवजे के मामले में एक अहम कानूनी नजीर पेश की है। जस्टिस विक्रम नाथ, जस्टिस संदीप मेहता और जस्टिस विजय बिश्नोई की बेंच ने फैसला सुनाते हुए कहा कि यदि सरकार से मिलने वाली अनुकंपा सहायता का लाभ मृतक के परिवार के कुछ सदस्यों को मिल रहा है, तो भी इसका मतलब यह नहीं है कि उस आश्रित मां का मुआवजा भी काट दिया जाए, जो उस सरकारी योजना के दायरे में ही नहीं आती। अदालत ने इसे बीमा कंपनी का ‘अवैध संवर्धन’ (illegal enrichment) करार दिया।

मामले की पृष्ठभूमि

यह मामला 23 जुलाई 2012 का है, जब हरियाणा पुलिस में तैनात 25 वर्षीय कांस्टेबल सचिन कुमार की एक सड़क दुर्घटना में मौत हो गई थी। उनके परिवार (विधवा, नाबालिग बेटी, मां और पिता) ने मोटर दुर्घटना दावा न्यायाधिकरण (MACT) के समक्ष 40 लाख रुपये के मुआवजे की मांग की थी। न्यायाधिकरण ने 37.30 लाख रुपये का मुआवजा तय किया था, लेकिन हाई कोर्ट ने इसमें कटौती करते हुए इसे 7.70 लाख रुपये कर दिया था। हाई कोर्ट ने ‘रिलायंस जनरल इंश्योरेंस कंपनी लिमिटेड बनाम शशि शर्मा’ मामले में सुप्रीम कोर्ट के पुराने फैसले का हवाला देते हुए कहा था कि सरकारी नियमों के तहत मिलने वाली 29.21 लाख रुपये की वित्तीय सहायता को कुल मुआवजे से घटाया जाना चाहिए।

अदालती बहस और विश्लेषण

सुप्रीम कोर्ट के समक्ष मुख्य सवाल यह था कि क्या सरकार से मिलने वाली सहायता का ‘सेट-ऑफ’ (कटौती) उस आश्रित पर भी लागू किया जा सकता है, जिसे वह सहायता मिल ही नहीं रही है?

अदालत ने पाया कि हरियाणा अनुकंपा सहायता नियम, 2006 के तहत, मृतक की मां को कोई वित्तीय लाभ नहीं मिल सकता था, क्योंकि मृतक अपने पीछे पत्नी और बच्चे छोड़ गए थे। 1964 की पारिवारिक पेंशन योजना के अनुसार, माता-पिता केवल तभी पात्र होते हैं जब मृतक अविवाहित हो या अपने पीछे पत्नी/बच्चे न छोड़े।

न्यायमूर्ति विजय बिश्नोई द्वारा दिए गए फैसले में अदालत ने स्पष्ट किया:

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“मां का दावा नकारना, जो कुल मुआवजे में एक-तिहाई हिस्से की हकदार हैं, बीमा कंपनी को आश्रित अभिभावक की कीमत पर अवैध लाभ पहुंचाने जैसा है।”

अदालत ने ‘शशि शर्मा’ मामले के उस सिद्धांत को बरकरार रखा कि दोहरा लाभ (duality of loss of income) नहीं मिलना चाहिए, लेकिन साथ ही यह भी कहा कि ‘न्यायसंगत मुआवजे’ (just compensation) का अर्थ यह भी है कि किसी हकदार को उसकी वाजिब राशि से वंचित न किया जाए।

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अंतिम फैसला

सुप्रीम कोर्ट ने हाई कोर्ट के उस आदेश को आंशिक रूप से बदलते हुए मृतक की मां को उनके एक-तिहाई हिस्से (11,30,600 रुपये) के भुगतान का आदेश दिया। हाई कोर्ट द्वारा निर्धारित 7,70,400 रुपये की राशि में यह अतिरिक्त राशि जोड़कर अब कुल मुआवजा 19,01,000 रुपये कर दिया गया है। अदालत ने बीमा कंपनी और संबंधित पक्ष को आठ सप्ताह के भीतर यह राशि ब्याज सहित चुकाने का निर्देश दिया है।

मामले का विवरण:

  • केस शीर्षक: सरला देवी और अन्य बनाम रिलायंस जनरल इंश्योरेंस कंपनी लिमिटेड और अन्य।
  • केस संख्या: [2026 INSC 575]
  • बेंच: जस्टिस विक्रम नाथ, जस्टिस संदीप मेहता और जस्टिस विजय बिश्नोई।
  • निर्णय की तिथि: 26 मई, 2026।

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