सुप्रीम कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में यह साफ किया है कि सरकारी कर्मचारी की वार्षिक गोपनीय रिपोर्ट (ACR) की प्रत्येक प्रविष्टि (एंट्री) को संबंधित कर्मचारी से साझा करना अनिवार्य है, बशर्ते वह उसके प्रमोशन के अवसरों को प्रभावित करती हो। जस्टिस जे. के. माहेश्वरी और जस्टिस अतुल एस. चांदुरकर की पीठ ने सेंट्रल एडमिनिस्ट्रेटिव ट्रिब्यूनल (CAT) और दिल्ली हाई कोर्ट के उन आदेशों को खारिज कर दिया, जिन्होंने अपीलकर्ता डॉ. इंदिरा सरनाथ को राहत देने से इनकार किया था। शीर्ष अदालत ने मुकदमे के लंबित रहने के दौरान अपीलकर्ता के सर्विस रिकॉर्ड को नष्ट करने के लिए रेलवे की कार्रवाई को अनुचित ठहराया। न्यायालय ने सेवानिवृत्त अधिकारी को भारतीय रेलवे चिकित्सा सेवा (IRMS) के उच्च प्रशासनिक ग्रेड (HAG) में वैचारिक पदोन्नति (Notional Promotion) देने और उनके पेंशन लाभों को नए सिरे से निर्धारित करने का निर्देश जारी किया है।
क्या है पूरा मामला?
अपीलकर्ता डॉ. इंदिरा सरनाथ की नियुक्ति भारतीय रेलवे चिकित्सा सेवा (IRMS) में सहायक चिकित्सा अधिकारी के रूप में हुई थी। सेवाकाल के दौरान वे पदोन्नति के लिए पात्र बनीं। 6 दिसंबर 2006 को रेलवे बोर्ड ने सीनियर एडमिनिस्ट्रेटिव ग्रेड (SAG) से चीफ मेडिकल डायरेक्टर (CMD) यानी हायर एडमिनिस्ट्रेटिव ग्रेड (HAG) के पद पर पदोन्नति और पोस्टिंग की दो सूचियां जारी कीं।
डॉ. सरनाथ का नाम इस सूची में नहीं था, जबकि उनसे कनिष्ठ (जूनियर) अधिकारी को पदोन्नत कर दिया गया। उन्होंने इस चयन को सेंट्रल एडमिनिस्ट्रेटिव ट्रिब्यूनल (CAT) में चुनौती दी। 22 मई 2007 को ट्रिब्यूनल ने उनके आवेदन को यह कहते हुए खारिज कर दिया कि 10 अगस्त 2006 को हुई चयन समिति की बैठक में जिन 10 अधिकारियों पर विचार हुआ था, उनमें डॉ. सरनाथ 10वें स्थान पर थीं। समिति ने उनके पिछले 5 वर्षों के रिकॉर्ड का मूल्यांकन कर पाया कि वे आवश्यक बेंचमार्क “वेरी गुड + (VG+)” हासिल करने में विफल रहीं।
इसके बाद, डॉ. सरनाथ ने दिल्ली हाई कोर्ट में रिट याचिका दायर की। 9 जनवरी 2009 को हाई कोर्ट ने भी उनकी याचिका खारिज कर दी। कोर्ट का तर्क था कि उन्होंने रेलवे बोर्ड के उस प्रस्ताव और परिपत्र को चुनौती नहीं दी थी जिसके तहत “VG+” बेंचमार्क तय किया गया था। हाई कोर्ट ने यह भी उल्लेख किया कि अपीलकर्ता को मूल्यांकन में केवल 19.5 अंक मिले थे, जो चयन प्रक्रिया को सही साबित करते हैं। इस फैसले से असहमत होकर डॉ. सरनाथ ने सुप्रीम कोर्ट का रुख किया।
दोनों पक्षों के कानूनी तर्क
अपीलकर्ता के पक्ष में दलीलें:
वरिष्ठ अधिवक्ता श्री जयदीप गुप्ता ने अपीलकर्ता की ओर से निम्नलिखित मुख्य बिंदु रखे:
- गलत बेंचमार्क का उपयोग: चयन समिति ने निर्धारित सेवा नियमों का उल्लंघन करते हुए “VG+” का कड़ा बेंचमार्क लागू किया, जबकि कार्मिक और प्रशिक्षण विभाग (DoPT) ने 8 फरवरी 2002 को ही एक नया कार्यालय ज्ञापन (OM) जारी कर सामान्य बेंचमार्क “वेरी गुड” तय कर दिया था।
- ACR छिपाना न्यायसंगत नहीं: रेलवे बोर्ड ने अपीलकर्ता को उनके ACR ग्रेडिंग की जानकारी नहीं दी, जिससे वे अपनी कम की गई ग्रेडिंग के खिलाफ अपनी बात रखने के अधिकार से वंचित रह गईं। देव दत्त बनाम भारत संघ और सुखदेव सिंह बनाम भारत संघ के निर्णयों का हवाला देकर उन्होंने तर्क दिया कि सभी ACR प्रविष्टियां कर्मचारी को बताना कानूनी रूप से जरूरी है।
- मुकदमे के बीच रिकॉर्ड नष्ट करना: अप्रैल 2009 में याचिका दायर होने और जुलाई 2009 में कोर्ट का नोटिस जारी होने के बावजूद, रेलवे ने साल 2013 में अपीलकर्ता के सर्विस रिकॉर्ड को नष्ट कर दिया। इसके लिए प्रतिवादियों के खिलाफ प्रतिकूल निष्कर्ष (Adverse Inference) निकाला जाना चाहिए।
- आंशिक अंक का नियम नहीं: रेलवे की 1996 की प्रमोशन पॉलिसी में मूल्यांकन के लिए आधा या आंशिक अंक (जैसे दिए गए 19.5 अंक) देने का कोई नियम नहीं था।
प्रतिवादी (भारत संघ) के पक्ष में दलीलें:
अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल श्री विक्रमजीत बनर्जी ने विभाग का पक्ष लेते हुए कहा:
- रेलवे की स्वायत्तता: ‘भारत सरकार (कार्य आवंटन) नियम, 1961’ के तहत रेलवे को अपनी सेवा शर्तें खुद तय करने का विशेष अधिकार है। प्रभात रंजन सिंह बनाम आर.के. कुशवाहा मामले के आधार पर रेलवे DoPT के नियमों से सीधे तौर पर बाध्य नहीं है।
- बेंचमार्क सही था: HAG ग्रेड के पद के लिए “VG+” का कड़ा बेंचमार्क ही लागू था, जिसके तहत उम्मीदवार को 5 वर्षों में कम से कम दो “उत्कृष्ट” (Outstanding) और तीन “बहुत अच्छा” (Very Good) ग्रेड चाहिए थे, जो अपीलकर्ता के पास नहीं थे।
- नया नियम पूर्वव्यापी नहीं: साल 2008 के देव दत्त फैसले से पहले केवल “औसत” या “औसत से नीचे” की ग्रेडिंग ही बताई जाती थी। सभी प्रविष्टियों को साझा करने का DoPT का नियम 14 मई 2009 को आया, जिसे रेलवे ने 18 अगस्त 2009 को अपनाया। इसे पुराने मामलों पर लागू नहीं किया जा सकता (भारत संघ बनाम चमन राणा का संदर्भ)।
- रिकॉर्ड नष्ट होने से नुकसान नहीं: विभाग ने स्वीकार किया कि रिटायरमेंट के 5 साल बाद 2013 में गलती से रिकॉर्ड नष्ट हो गए, लेकिन अपीलकर्ता का ‘करियर कार्ड’ सुरक्षित था, जिसमें अंतिम ग्रेडिंग दर्ज थी, इसलिए कोई नुकसान नहीं हुआ।
सुप्रीम कोर्ट का कानूनी विश्लेषण और टिप्पणियां
न्यायालय ने इस मामले में तीन मुख्य कानूनी पहलुओं पर गहन विचार किया:
1. पदोन्नति बेंचमार्क की वैधता पर
सुप्रीम कोर्ट ने प्रतिवादी के इस तर्क को स्वीकार किया कि रेल मंत्रालय के पास अपनी नीतियों को तय करने की स्वायत्तता है। प्रभात रंजन सिंह मामले का हवाला देते हुए कोर्ट ने स्पष्ट किया कि DoPT के परिपत्र रेलवे पर स्वतः बाध्यकारी नहीं होते हैं जब तक कि रेलवे उन्हें विशेष रूप से न अपनाए। इसलिए, रेलवे का 3 जून 2002 का परिपत्र (जिसमें HAG पद के लिए “VG+” बेंचमार्क तय था) पूरी तरह वैध था।
2. ACR प्रविष्टियों को छिपाने के मुद्दे पर
अदालत ने रेलवे की इस दलील को पूरी तरह खारिज कर दिया कि ACR संप्रेषण का नियम केवल भविष्य के मामलों पर लागू होता है। चमन राणा मामले के तथ्यों को अलग बताते हुए (जहां 17-20 वर्षों की अत्यधिक देरी के बाद राहत मांगी गई थी), न्यायालय ने तीन न्यायाधीशों की पीठ के ऐतिहासिक फैसले अभिजीत घोष दस्तीदार बनाम भारत संघ का हवाला दिया, जिसमें देव दत्त के सिद्धांत को पूर्वव्यापी प्रभाव से लागू कर राहत दी गई थी।
न्यायालय ने कहा:
“देव दत्त मामले में यह स्पष्ट किया गया है कि किसी प्रविष्टि का नाम मायने नहीं रखता, बल्कि उसका वास्तविक प्रभाव यह तय करता है कि वह प्रतिकूल है या नहीं। यदि कोई ‘अच्छी’ ग्रेडिंग भी किसी कर्मचारी को पदोन्नति के अयोग्य बनाती है या उसकी संभावनाओं पर बुरा असर डालती है, तो वह कर्मचारी के लिए संतोषजनक नहीं हो सकती। इसलिए, लोक सेवक की ACR की हर प्रविष्टि उसे सूचित की जानी चाहिए।”
पीठ ने निष्कर्ष निकाला कि भले ही डॉ. सरनाथ को पांचों वर्षों में “बहुत अच्छा” ग्रेडिंग मिली थी, लेकिन “VG+” बेंचमार्क (जिसमें दो उत्कृष्ट ग्रेड जरूरी थे) के तहत इस ग्रेडिंग के कारण वे अयोग्य हो गईं। अतः उन्हें यह रिपोर्ट जानने और इसके खिलाफ अपील करने का पूरा अधिकार था।
3. सर्विस रिकॉर्ड को नष्ट करना और आंशिक अंक का आवंटन
न्यायालय ने न्यायिक प्रक्रिया जारी रहने के दौरान डॉ. सरनाथ के सर्विस रिकॉर्ड को नष्ट किए जाने की रेलवे की कार्रवाई पर कड़ी नाराजगी जताई:
“प्रतिवादी स्वीकार करते हैं कि इस मामले में अदालती कार्यवाही लंबित होने के बावजूद अनजाने में मूल रिकॉर्ड नष्ट कर दिए गए थे।”
न्यायालय ने यह भी पाया कि रेलवे की नीति में 19.5 जैसे आंशिक अंक देने का कोई प्रावधान नहीं था। “बहुत अच्छा” ग्रेडिंग के लिए प्रति वर्ष 4 अंक की दर से डॉ. सरनाथ को पूरे 20 अंक मिलने चाहिए थे।
इन तीनों कारकों को जोड़ते हुए पीठ ने टिप्पणी की:
“इन सभी कारकों को जब एक साथ देखा जाता है, तो यह स्पष्ट है कि ACR की जानकारी न मिलने, सर्विस रिकॉर्ड के नष्ट होने और अंकों को आंशिक रूप से आवंटित किए जाने के कारण अपीलकर्ता के हितों को गंभीर नुकसान पहुंचा है। भले ही उनका मूल्यांकन प्रचलित नीति के तहत हुआ हो, लेकिन रिकॉर्ड पर मौजूद साक्ष्य यह दर्शाते हैं कि उनके साथ इस मामले में निष्पक्ष व्यवहार नहीं किया गया।”
अंतिम फैसला
सुप्रीम कोर्ट ने सिविल अपील को स्वीकार करते हुए सेंट्रल एडमिनिस्ट्रेटिव ट्रिब्यूनल (CAT) और दिल्ली हाई कोर्ट के पुराने आदेशों को निरस्त कर दिया।
अदालत ने घोषित किया कि डॉ. इंदिरा सरनाथ HAG ग्रेड (वेतनमान 22,400 – 24,500 रुपये) में वैचारिक पदोन्नति (Notional Promotion) और इसके परिणामतः मिलने वाले संशोधित पेंशन लाभों की पूर्ण अधिकारी हैं। हालांकि, मूल सर्विस रिकॉर्ड उपलब्ध न होने के कारण अदालत ने उन्हें पदोन्नति अवधि का पिछला बकाया वेतन (Back Wages) देने से इनकार कर दिया, लेकिन पेंशन को नए सिरे से निर्धारित करने का स्पष्ट आदेश दिया। प्रतिवादियों को निर्देश दिया गया है कि वे इस फैसले की तारीख से दो महीने के भीतर संशोधित पेंशन के बकाये का भुगतान सुनिश्चित करें। दोनों पक्ष अपना-अपना अदालती खर्च स्वयं वहन करेंगे।
केस का विवरण
- मामले का शीर्षक: डॉ. इंदिरा सरनाथ बनाम भारत संघ और अन्य
- केस संख्या: सिविल अपील संख्या 2536 / 2011 (2026 INSC 553)
- न्यायपीठ: जस्टिस जे. के. माहेश्वरी और जस्टिस अतुल एस. चांदुरकर
- फैसले की तिथि: 26 मई 2026

