आर्बिट्रल अवॉर्ड में सिंपल इंटरेस्ट को कंपाउंड इंटरेस्ट में नहीं बदला जा सकता, यह क्लेरिकल एरर नहीं: सुप्रीम कोर्ट

सुप्रीम कोर्ट ने आर्बिट्रेशन एंड कन्सिलिएशन एक्ट, 1996 की धारा 33 के तहत आर्बिट्रल अवॉर्ड में सुधार की सीमा स्पष्ट करते हुए कहा है कि सिंपल इंटरेस्ट को कंपाउंड इंटरेस्ट में बदलना कोई क्लेरिकल, टाइपोग्राफिकल या गणनात्मक त्रुटि का सुधार नहीं है। अदालत ने कहा कि ऐसा बदलाव अवॉर्ड के मेरिट्स में हस्तक्षेप के समान है और धारा 33 के तहत इसकी अनुमति नहीं दी जा सकती।

जस्टिस पामिडिघंटम श्री नरसिम्हा और जस्टिस आलोक अराधे की पीठ ने गुजरात हाईकोर्ट और कमर्शियल कोर्ट के आदेशों को रद्द करते हुए सोल आर्बिट्रेटर द्वारा पारित मूल अवॉर्ड को बहाल कर दिया। इसके साथ ही अदालत ने स्पष्ट किया कि पेंडेंटे लाइट अवधि के लिए कंपनी केवल 21.675 प्रतिशत वार्षिक सिंपल इंटरेस्ट की हकदार होगी।

क्या था विवाद?

मामला गुजरात वॉटर सप्लाई एंड सीवरेज बोर्ड और सारयू प्लास्टिक्स प्राइवेट लिमिटेड के बीच व्यावसायिक लेनदेन से जुड़ा था। कंपनी को वर्ष 1998 से 2000 के बीच पीवीसी पाइपों की आपूर्ति के लिए कई रेट कॉन्ट्रैक्ट दिए गए थे। बाद में ऑडिट रिपोर्ट में कथित अनियमितताओं और अतिरिक्त भुगतान का मामला सामने आया, जिसके आधार पर बोर्ड ने वर्ष 2003 में कंपनी को ब्लैकलिस्ट कर दिया।

कई वर्षों बाद पक्षकारों ने विवाद को आर्बिट्रेशन के माध्यम से सुलझाने का निर्णय लिया और अप्रैल 2012 में एक आर्बिट्रेशन एग्रीमेंट के तहत के.जे. वाधेर को सोल आर्बिट्रेटर नियुक्त किया गया।

लंबी सुनवाई के बाद 27 अक्टूबर 2015 को आर्बिट्रेटर ने कंपनी के पक्ष में लगभग ₹1.01 करोड़ का अवॉर्ड पारित किया। अवॉर्ड में बकाया भुगतान और मूल्य वृद्धि से संबंधित दावों को आंशिक रूप से स्वीकार करते हुए पेंडेंटे लाइट अवधि के लिए 21.675 प्रतिशत वार्षिक सिंपल इंटरेस्ट तथा अवॉर्ड की तारीख से भुगतान होने तक कंपाउंड इंटरेस्ट प्रदान किया गया।

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कैसे बढ़ गई देनदारी?

अवॉर्ड पारित होने के बाद कंपनी ने धारा 33 के तहत आवेदन दाखिल कर कहा कि पेंडेंटे लाइट अवधि के लिए भी कंपाउंड इंटरेस्ट दिया जाना चाहिए और अवॉर्ड में सिंपल इंटरेस्ट का उल्लेख त्रुटिवश हो गया है।

हालांकि आर्बिट्रेटर ने इस आवेदन पर निर्णय नहीं दिया। बाद में कमर्शियल कोर्ट ने रिव्यू कार्यवाही में कंपनी के पक्ष में आदेश पारित करते हुए सिंपल इंटरेस्ट को कंपाउंड इंटरेस्ट में बदल दिया। इस संशोधन का प्रभाव यह हुआ कि बोर्ड की कुल देनदारी लगभग ₹30.38 करोड़ से बढ़कर करीब ₹144.93 करोड़ हो गई।

गुजरात हाईकोर्ट ने भी कमर्शियल कोर्ट के आदेश को बरकरार रखा, जिसके बाद बोर्ड ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया।

सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा?

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि धारा 33(1)(a) का उद्देश्य केवल ऐसी त्रुटियों को सुधारना है जो गणना, टाइपिंग या लिपिकीय भूल से उत्पन्न हुई हों। यह प्रावधान किसी आर्बिट्रल अवॉर्ड की समीक्षा करने या उसके निष्कर्षों में बदलाव करने का माध्यम नहीं बन सकता।

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अदालत ने कहा कि अवॉर्ड को समग्र रूप से पढ़ने पर स्पष्ट है कि आर्बिट्रेटर ने जानबूझकर पेंडेंटे लाइट अवधि के लिए सिंपल इंटरेस्ट और अवॉर्ड के बाद की अवधि के लिए कंपाउंड इंटरेस्ट निर्धारित किया था। इसलिए यह नहीं कहा जा सकता कि सिंपल इंटरेस्ट का उल्लेख मात्र एक टाइपिंग या क्लेरिकल गलती थी।

पीठ ने कहा कि इंटरेस्ट का स्वरूप — यानी सिंपल होगा या कंपाउंड — मामले के गुण-दोष से जुड़ा एक महत्वपूर्ण निर्धारण है। यह आर्बिट्रेटर के न्यायिक मूल्यांकन का हिस्सा है और इसे बाद में क्लेरिकल करेक्शन के नाम पर बदला नहीं जा सकता।

अदालत ने कहा कि यदि ऐसे बदलावों को धारा 33 के तहत स्वीकार कर लिया जाए तो यह प्रावधान अवॉर्ड की समीक्षा और अपीलीय पुनर्विचार का साधन बन जाएगा, जो कानून की मंशा के विपरीत है।

बोर्ड की अन्य आपत्तियां भी खारिज

बोर्ड ने यह भी तर्क दिया था कि आर्बिट्रेटर का मैंडेट समाप्त हो चुका था और अवॉर्ड प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों का उल्लंघन करते हुए पारित किया गया था।

सुप्रीम कोर्ट ने इन दलीलों को भी अस्वीकार कर दिया। अदालत ने पाया कि बोर्ड लगातार कार्यवाही में भाग लेता रहा और उसने समय रहते आर्बिट्रेटर के अधिकार क्षेत्र या मैंडेट विस्तार पर कोई प्रभावी आपत्ति नहीं उठाई। कोर्ट ने यह भी कहा कि कार्यवाही में हुई देरी के लिए काफी हद तक स्वयं बोर्ड का रवैया जिम्मेदार था।

पीठ ने कहा कि बोर्ड को सुनवाई के पर्याप्त अवसर दिए गए थे और बाद में उन्हें प्राकृतिक न्याय के उल्लंघन के रूप में प्रस्तुत नहीं किया जा सकता।

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फैसला

सुप्रीम कोर्ट ने बोर्ड की अपीलों को आंशिक रूप से स्वीकार करते हुए गुजरात हाईकोर्ट के 11 नवंबर 2022 के फैसले (जिसमें बाद में 16 दिसंबर 2022 को सुधार किया गया था) और कमर्शियल कोर्ट के 25 सितंबर 2018 के आदेश को रद्द कर दिया।

अदालत ने मूल आर्बिट्रल अवॉर्ड को ब्याज संबंधी हिस्से में बहाल करते हुए स्पष्ट किया कि सारयू प्लास्टिक्स प्राइवेट लिमिटेड पेंडेंटे लाइट अवधि के लिए 21.675 प्रतिशत वार्षिक सिंपल इंटरेस्ट की ही हकदार होगी। अदालत ने लागत के संबंध में कोई आदेश पारित नहीं किया।

मामले का विवरण

मामला: गुजरात वॉटर सप्लाई एंड सीवरेज बोर्ड बनाम सारयू प्लास्टिक्स प्राइवेट लिमिटेड
केस नंबर: सिविल अपील संख्या 769-770/2026
पीठ: जस्टिस पामिडिघंटम श्री नरसिम्हा और जस्टिस आलोक अराधे
निर्णय की तिथि: 26 मई 2026

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